Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

लोहिया की रोशनी में समाजवाद के सपने और संघर्ष

‘‘यह निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद की मशाल से देश-काल, राजनीति और समाजनीति को आलोकित करने वाले डॉक्टर लोहिया ने जो राह दिखाई है, उसी पर चलकर भारतीय लोकतंत्र अपनी सार्थकता पा सकता है। इसी तरह अपने आप में यह बहुत ही भरोसा दिलाने वाली बात है कि डॉ. राममनोहर लोहिया के गृह प्रदेश यूपी के ही धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के मजबूत हाथों में समाजवादी पार्टी की मशाल है और उनकी आंखों में समाजवादी समाज बनाने का सपना है…’’

‘‘यह निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद की मशाल से देश-काल, राजनीति और समाजनीति को आलोकित करने वाले डॉक्टर लोहिया ने जो राह दिखाई है, उसी पर चलकर भारतीय लोकतंत्र अपनी सार्थकता पा सकता है। इसी तरह अपने आप में यह बहुत ही भरोसा दिलाने वाली बात है कि डॉ. राममनोहर लोहिया के गृह प्रदेश यूपी के ही धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के मजबूत हाथों में समाजवादी पार्टी की मशाल है और उनकी आंखों में समाजवादी समाज बनाने का सपना है…’’

भारतीय राजनीति में समाजवाद की पीठिका तैयार करने वाले डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने आज से 49 साल पहले 1962 में अपनी सात क्रांतियों की व्याख्या करते हुए जो बात 20वीं सदी के बारे में कही थी, वह आज 21वीं सदी में भी उतनी ही निर्मम सच्चाई है, बल्कि कह सकते हैं कि उस सच्चाई की तल्खी आज और भी ज्यादा बढ़ गई है। लोहिया ने कहा था- एक तो यह दुनिया का शायद सबसे बेरहम युग है, बिल्कुल निर्दयी और दूसरे, अन्याय के खिलाफ जितना यह युग लड़ रहा है, उतना शायद पहले वाला और कोई नहीं लड़ा। एक तरफ निर्दयता में यह सदी बहुत बढ़ी हुई है तो दूसरी तरफ न्याय की इच्छा में भी…।

केवल इसी संदर्भ को देखें और आज के हालात में लागू करें तो पाएंगे कि एक तरफ देश में खेल-मनोरंजन की शक्ल में आईपीएल के नाम पर अरबों रुपए का सालाना क्रिकेट कारोबार हो रहा है तो दूसरी ओर महाराष्ट्र के विदर्भ से लेकर उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड तक सूखे और भ्रष्टाचार की मार झेल रहे घाटे की खेती करने वाले कर्ज से लदे हजारों किसान आत्महत्या करते चले जा रहे हैं। आज देश के स्तर पर सोचें तो सवाल खड़ा होता है कि क्रिकेट बड़ा है या किसान? और, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के स्तर पर सोचें तो सवाल खड़ा होता है कि बुंदेलखंड को बर्बाद करके पूरे प्रदेश के किसानों का पसीना निचोडक़र लखनऊ के सीने पर अरबों रुपए के स्मारक और मूर्तियां खड़ी करने का मतलब क्या है? शासन-सत्ता की निर्दयता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि दलितों के नाम पर उत्तर प्रदेश की बागडोर जिसके हाथ में हो, वह दौलत का पुजारी बन जाए और उसके ही राज में सबसे ज्यादा दलित उत्पीडऩ का दौर चले। 

तो यह है आज की सरकारों से निकला निर्दयी समय और जैसा कि डॉक्टर लोहिया ने कहा था, इसी निर्दयी समय के खिलाफ स्वाभाविक रूप से देश-प्रदेश वासियों में न्याय पाने की इच्छा घनीभूत होती दिखाई दे रही है। दरअसल, लोहिया की रोशनी में समाजवाद के सपनों और संघर्ष की बात करें तो पहली चीज तो यही है कि समाजवाद राज-समाज के लिए प्राथमिकताएं निर्धारित करने की दृष्टि देता है। इसीलिए समाजवादी लोग किसान और खेती, गांव और गरीब, कामगार और रोजगार, छात्र और नौजवान की बात करते हैं- इनके हक की बात करते हैं, इनके सवाल उठाते हैं और सवालों को लेकर संघर्ष भी करते हैं। संसद से सडक़ तक सवाल उठाने और संघर्ष करने की यह विरासत डॉक्टर लोहिया सौंप गए हैं। लेकिन समाजवाद  कोई जड़ किस्म की ठहरी हुई विचारधारा नहीं है कि बस लकीर का फकीर बने बैठे रहें। लोहिया का समाजवाद अपने बुनियादी संकल्पों के साथ ऐसी गतिशील विचारधारा का नाम है, जो हर दौर में प्रासंगिक है और आज तो इसकी और भी ज्यादा जरूरत है।

गौरतलब है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनियाभर में स्थानीयताओं का भी महत्व बहुत बढ़ गया है। अगर आप अपनी जड़ों से जुड़े नहीं रहेंगे और कट जाएंगे तो भूमंडलीकरण की तेज प्रतिस्पद्र्धा वाली आंधी उड़ा ले जाएगी।उत्तर प्रदेश की स्थानीय विशेषताएं क्या हैं? प्रमुख विशेषता तो खेती-किसानी ही है और इससे जुड़े कुछ कुटीर उद्योग, मिलें और दूसरे कारोबार-व्यापार हैं। आज इन सबकी हालत खराब है। गन्ना किसान समस्याओं के जाल में उलझा दिए गए हैं और चीनी मिलें बीमार बनाकर औने-पौने दामों में बेच दी गई हैं। समय पर किसानों को खाद-बीज नहीं मिलते और इनकी काला बाजारी हो जाती है। सिंचाई के साधनों-संसाधनों का बुरा हाल है। नहरों में पानी भले ही न आए, लेकिन उनकी सफाई और मरम्मत के नाम पर नहरों में भ्रष्टाचार जरूर बह रहा है। उत्तर प्रदेश की दूसरी प्रमुख स्थानीयता है प्राकृतिक संपदा यानी नदी-पहाड़-जंगल। ये चीजें भी मौजूदा दौर में सरकारी लूट और लालच का शिकार होकर नष्ट हो रही हैं।

डॉक्टर लोहिया समाजवाद को दो शब्दों में व्यक्त करते हुए कहते हैं- समाजवाद का मतलब है समता और सम्पन्नता। समता कायम करने के लिए वे यथासंभव गैर-बराबरी दूर करने की बात करते हैं और गैर-बराबरी के जितने प्रकार हो सकते हैं, उनकी वजह और व्याख्या करके उन्होंने समझाया है। इसी संदर्भ में वे अगड़ों-पिछड़ों का सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि जो पिछड़े और वंचित हैं, उन्हें विशेष अवसर देकर आगे लाया जाना चाहिए। कहने की जरूरत नहीं कि गैर-बराबरी दूर करने की इसी अवधारणा के तहत आरक्षण का औचित्य और सार्थकता है। समता और सम्पन्नता असल में समाजवादी सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। देश-प्रदेश को विकास की पटरी से उतार कर, खस्ताहाल और विपन्न बनाकर जैसे समता की दिशा में नहीं बढ़ा जा सकता, ठीक उसी तरह गैर-बराबरी दूर करते हुए समता के मार्ग पर न चलने से सम्पन्नता भी नहीं लाई जा सकती। लोहिया के विचारों और स्थापनाओं से ही यह समझा जा सकता है कि अगर अमीरी और गरीबी की खाई उत्तरोत्तर गहरी और चौड़ी होती जाएगी, जैसी कि होती जा रही है तो इसका प्रकारांतर से असर महंगाई, भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी के बढ़ते जाने में दिखाई देता है और यही हम आज देख रहे हैं।

डॉ. राममनोहर लोहिया से ही हम यह जान-समझ पाते हैं कि कैसे समाजवाद और लोकतंत्र एक-दूसरे के पूरक हैं और समाजवाद के बिना लोकतंत्र महज एक नारा बनकर रह जाता है और अपनी सार्थकता खो देता है। चूंकि समाजवाद सभी प्रकार की विषमताओं को समझने और उन्हें दूर करने की दृष्टि देता है, इसलिए समाजवादी लोग समाज को जोडऩे में यकीन रखते हैं और हर उस चीज और प्रवृत्ति का खुला व सक्रिय विरोध करते हैं, जो समाज को बांटने और आदमी-आदमी को लड़ाने का काम करती हैं। इसीलिए सच्चा समाजवादी न कभी सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन दे सकता है और न उसे बर्दाश्त कर सकता है। डॉक्टर लोहिया जब सपना और संघर्ष की बात करते हैं तो इसका सीधा मतलब होता है कि रचना और आंदोलन साथ-साथ चलने चाहिए।

असल में रचना से ही आंदोलन को सार्थकता मिलती है और आंदोलन भी रचना के लिए, निर्माण के लिए होते हैं- समाज रचना के लिए यानी बेहतर राज-समाज के निर्माण के लिए। अगर बेहतर राज-समाज के निर्माण के लिए आंदोलन हो तो इसके उदाहरण के रूप में लोहिया द्वारा चित्रकूट में शुरू किए गए रामायण मेले को ले सकते हैं और अगर समाज को अपनी राजनीति के लिए तोडऩा हो तो आडवाणी की रामरथ यात्रा को याद कर सकते हैं। आखिर चाकू से आप रचनात्मक काम लेते हैं तो वह बहुत उपयोगी औजार है, वरना वह जानलेवा खतरनाक हथियार भी बन सकता है। इसी तरह डॉक्टर लोहिया ने भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा के आड़े आनेवाली और जनता के शोषण का चालाक हथियार बन चुकी अंगे्रजी का विरोध किया था तो इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था कि ज्ञान-विज्ञान की एक भाषा के रूप में अंगे्रजी को न अपनाया जाए, बल्कि उनका आशय इतना ही था कि आम जनता को ठगने और उसकी आंखों में धूल झोंकने के लिए अंगे्रजी में राज-काज न चलाया जाए।

यह निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद की मशाल से देश-काल, राजनीति और समाजनीति को आलोकित करने वाले डॉक्टर लोहिया ने जो राह दिखाई है, उसी पर चलकर भारतीय लोकतंत्र अपनी सार्थकता पा सकता है। इसी तरह अपने आप में यह बहुत ही भरोसा दिलाने वाली बात है कि डॉ. राममनोहर लोहिया के गृह प्रदेश यूपी के ही धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के मजबूत हाथों में समाजवादी पार्टी की मशाल है और उनकी आंखों में समाजवादी समाज बनाने का सपना है।

लेखक प्रो. निशीथ राय लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित प्रखर हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के संस्थापक चेयरमैन हैं. उनका यह लेख डीएनए में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...