जेपी की धरती भाजपा के भ्रष्टाचार विरोधी ब्रिगेड के नेता एलके आडवाणी को रास नहीं आयी। मिटाने चले थे भ्रष्टाचार पर उनके चेलों ने अखबारों में कवरेज पाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लिया। यही नहीं चोरी की बिजली भी जलायी। उस टेंट में चोरी की बिजली जलायी गई जहां पर आडवाणी जी का कार्यक्रम था। आप कह सकते है कि पहले दिन से ही आडवाणी की रथयात्रा आडवाणी के लिए अशुभ संकेत लेकर आयी थी। बिहार की धरती रास नहीं आयी और अब भाजपा को लग रहा है कि सोमनाथ से ही यात्रा करना आडवाणी के लिए शुभ था। हालांकि आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी इस यात्रा में अशुभता के लक्षण तो उसदिन ही नजर आए जिस दिन नरेंद्र मोदी ने आंखे दिखायी और राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में भाग लेने के बजाए किसी और बैठक में चले गए।
पंजाब में एक कहावत है, पिंड बसया नहीं मंगते पहले आ गए। यही कुछ हाल इस समय भाजपा के नेताओं का है। चुनाव तो 2014 में होने है। लेकिन यह पार्टी दूसरों की मेहनत खाने में माहिर है। टीम अन्ना और सुब्रमण्यम स्वामी के प्रयासों से घिरी कांग्रेस की सरकार की मलाई खाने के लिए भाजपा ने तुरंत तैयारी शुरू कर दी। एकाएक एलके आडवाणी को लगा कि तुरंत रथयात्रा शुरू कर दे और अन्ना की जगह ले ले। साथ ही उनके समर्थकों ने उन्हें दुबारा अंदर खाते पीएम इन वेटिंग कहना शुरू कर दिया। 2009 से पहले 2007 से ही उन्हें पीएम इन वेटिंग शब्द से संबोधित उनके समर्थक करते थे और आडवाणी ये शब्द सुनने के बाद मुस्कराते भर थे। लेकिन 2009 में अपने हश्र को देखने के बावजूद अपनी पुरानी गलतियों को दुहराने में आडवाणी लग गए।
आडवाणी जी की यात्रा के पहले दिन ही अशुभ संकेत दिखे। जिस हाईटेक बस में वे सवार हुए, उसमें पटना से पहले छपरा से आते हुए किसी गैस का रिसाव हो गया। इससे बस में बैठे अरुण जेतली और सुष्मा स्वराज बेहोश होते हुए बचे। रास्ते में उन्हें बस से उतारा गया और किसी और गाड़ी में लाकर पटना के अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि जेतली और स्वराज विरोधी नेताओं, जिसमें राजनाथ सिंह समर्थक शामिल हैं, ने फिर यह दोहराया कि वे पहले से ही इस बात की तस्दीक करते रहे है कि दोनों का स्वास्थ्य इतना अच्छा नहीं है कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बन सके। राजनाथ सिंह के खास लोग तो शुरू से कहते है कि दो से तीन घंटे का प्रचार ही सुषमा और जेतली को बीमार कर देता है, छपरा से पटना लौटते हुए भी मुख्य कारण गैस का रिसाव नहीं, दोनों नेताओं के पहले से खराब स्वास्थ्य है।
लेकिन आडवाणी के लिए अशुभ संकेत यहीं खत्म नहीं हुए। जब पटना से आगे मुगलसराय के लिए उनकी बस निकली तो कोयलवर पुल पर उनकी बस फंस गई। वैसे तो नीतीश कुमार के राज्य में भारी विकास हुआ है, लेकिन उनकी गलती यही रही कि अंग्रेजों के जमाने के इस पुल की जगह कोई वैकल्पिक पुल का निर्माण नितिश जी नहीं करवा पाए हैं। बमुश्किल बस को पुल से निकाला गया। लेकिन इससे हाईटेक व्यवस्था खराब हो गई। आगे मुगलसराय में मुश्किल तब बढ़ गई जब रेलवे ने उस ग्राउंड में रैली की इजाजत नहीं दी, जहां आडवाणी जी की जनसभा होनी थी। अगले दिन बनारस में कांग्रेसियों ने हंगामा खड़ा कर दिया। लेकिन बनारस से आगे शिवराज सिंह के राज्य में घुसते ही उनके लिए नई परेशानी खड़ी हो गई। आडवाणी के भ्रष्टाचार विरोधी टीम के सदस्यों ने पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस में बढ़िया कवरेज के लिए लिफाफे में बंद पैसे पकड़ा दिए। वो खबरें टीवी चैनल तक आ गई और आडवाणी की पूरी छीछालेदर हो गई। साथ ही बिजली चोरी का आरोप अलग लग गया।
वैसे आडवाणी जी जिस हाईटेक बस में यात्रा कर रहे है वो चंडीगढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय टंडन ने भेंट किया है। चंडीगढ़ भाजपा अपने राष्ट्रीय नेताओं के लिए अशुभ है। 1999 में यहां पर पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष स्वर्गीय कृष्णलाल शर्मा जी लोकसभा का चुनाव लड़ने आए है। स्थानीय भाजपा के नेताओं ने भीतरघात कर हरवा दिया। इस हार से शर्मा जी इतने सदमें में चले गए कि छ महीनें बाद ही उनकी मौत हो गई। यह लेकिन यह हार पवन बंसल के लिए लाभदायक हो गई जिन्होंने उस समय शर्मा को हराया और अब केंद्र में ताकतवर मंत्री के रूप में है। लेकिन भाजपा के लिए परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। भाजपा के लीगल सेल के राष्ट्रीय संयोजक सत्यपाल जैन आडवाणी के खास बन गए और बाबरी मस्जिद केस में आडवाणी के वकील भी रहे। आडवाणी जी उनपर खूब विश्वास किया, क्योंकि जैन नरेंद्र मोदी से पीड़ित थे। लेकिन 2004 और 2009 के दो चुनाव जैन लगातार हार गए और आडवाणी जी के सपने ध्वस्त करते रहे। 2009 में कुछ निश्चित हारने वाले उम्मीदवारों में जैन भी शामिल थे, जिन्हें आडवाणी और सुषमा जी के हस्तक्षेप के बाद टिकट दिया गया। अगर कल्याण सिंह विरोधी अशोक प्रधान को यूपी में हारने की जानकारी के बावजूद आडवाणी ने टिकट दिया तो चंडीगढ़ में भी जैन को सारी जानकारी के बावजूद टिकट दिया गया। लेकिन 2009 की हार के बाद मजबूरी में जैन विरोधी संजय टंडन को कमान दी गई। वे प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए। उन्होंने चंडीगढ़ भाजपा ने भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाने के लिए बस ही भेंट कर दी। लेकिन बस तो पूरी तरह से आडवाणी जी के लिए अशुभ साबित हुई है।
लेखक संजीव पांडेय पत्रकार हैं.


