अरविन्द भाई, प्रशांत भूषण के साथ हिंसा नहीं होनी चाहिए थी, किरण बेदी का चरित्र हनन नहीं, आप पे हमला नहीं. वो सब गलत है. तो ये भी सही नहीं है कि आप आन्दोलन के नाम पर जो चाहें वो करें. अब तो आप आन्दोलन नहीं नफरत की एक मुहिम चला रहे हैं. भ्रष्टाचार नहीं, उसके नाम पर कांग्रेस के खिलाफ. अब आप वकीलों को अपने साथ जोड़ने में लगे हैं. पड़ोस के पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ ने भी यही किया था. ओपिनियन मेकर क्लास को साथ जोड़ने की जो कोशिश उन ने की वो अब आप कर रहे हैं. पर, आप भूल रहे हैं कि वहां एक तरह से मुशर्रफ की तानाशाही के चलते मीडिया नहीं, वकील ही ज्यादा मुफीद थे. भारत में मीडिया ने आपको सर आखों पे बिठाया है. आपकी गलत बातों को भी छापा और प्रसारित किया है. मीडिया आपसे बड़ी उम्मीदें लगाए था. आपने उसे निराश किया है.
थोड़ी बहुत हडबडियों के बावजूद भारत का मीडिया बहुत परिपक्व है. वो सवाल उठाने लगा है तो आप का उस से मोह कुछ भंग जैसा है. आप को अब उसका भी विकल्प चाहिए. आप समझते हैं कि वकील बेहतर बुद्धिजीवी होते हैं. मैं समझता हूँ कि वो कई पत्रकारों से भी ज्यादा पढ़े लिखे होते हैं. जवाब तो आप उन के भी सवालों का नहीं दे पाएंगे. जब भी आप किसी व्यवस्था परिवर्तन की बात करें तो आपको विकल्प भी देना होता है. वो नहीं है आपके पास. इसी लिए कुछ हताशा है. समझाने से लेकर धमकाने तक आप इसी चले आए हैं.
मिसाल के लिए प्रशांत भूषण ने कश्मीर में जनमत संगढ़ की जो बात कही वो विद्रोह था. किरण बेदी ने जो किया वो भ्रष्टाचार नहीं तो सुविधाभोग था और हिसार में आपने जो खुद किया वो धमकी नहीं तो विशुद्ध राजनीति थी. हो सकता है आप वहां कांग्रेस को हराने के एकमात्र मकसद से आए हों. अगर ऐसा है तो ये भी बहस का विषय है. वो बाद में. लेकिन अभी ये कि सूचनाएं आपके आन्दोलन के एक पदाधिकारी की एनजीओ को एक पार्टी द्वारा एक मोटी रकम दान देने की भी हैं. ये सूचनाएं गलत हो सकती हैं लेकिन ये सच है कि हिसार में आप के बारे में ये धारणा आज आम है. वरना यूं ही नहीं चले आए होते आप वहां चुनावी राजनीति करने. पहली बात तो ये है अरविन्द भाई, कि हिसार में कांग्रेस की हार अन्ना आन्दोलन के पहले से तय थी. ये इस से भी ज़ाहिर है कि पहले दो उम्मीदवारों में से किसी एक और कांग्रेस के उम्मीदवार को मिले वोटों में भी दो लाख का फर्क है और इतना बड़ा फर्क किसी के भी चार दिन के दौरे से नहीं आ सकता. दूसरे, आपकी किसी भी सभा में भीड़ खुद हारने वाले कांग्रेसी उम्मीदवार किसी सभा से अधिक नहीं थी. और हो भी मान्यवर, तो भीड़ कभी असल ताकत का प्रतीक नहीं होती. हाँ, आप कह सकते हैं कि भीड़ जब किसी की ताकत का असली अंदाज़ होती ही नहीं है तो फिर वो आपके मामले में भी नहीं थी. आप कह सकते हैं कि भीड़ हो न हो, असर तो आप का ही था. असर अगर आप का था तो वो महाराष्ट्र में क्यों नहीं था? आप कहेंगे हम गए ही नहीं वहां. क्योंकि वहां कांग्रेस नहीं, उसकी सहयोगी पार्टी थी.
क्या बताएंगे आप कि जब कोई विरोध आपका सहयोगी पार्टी से नहीं है तो कांग्रेस से ही क्यों है? आप कहते हैं, कांग्रेस ने लिख कर नहीं दिया कि जन लोकपाल को जस का तस पास करेंगे. तो क्या एनसीपी ने दिया?..या भाजपा ने और बीएसपी ने? सच ये है कि हिसार में आर पार हो ही रहा था कांग्रेस के खिलाफ पहले जाटों, फिर दलितों के आन्दोलन और फिर खुद कांग्रेसियों की भितरघात से. आपने सोचा नामनेकी मिल रही है, बटोर लेते हैं. ये आप भी जानते हैं, हरियाणा के लोग भी कि हिसार कांग्रेस की सीट कभी नहीं रही. कांग्रेस की सिर्फ तब रही है कि जब भजन लाल लड़ते थे या उनके आशीर्वाद से कोई और कांग्रेसी. कांग्रेस की सीट अगर वो होती तो सिर्फ छ: हज़ार के अंतर के साथ दूसरे नंबर पे इनेलो के अजय चौटाला न आए होते. चुनाव के दौरान आपकी टीम में किसी को वो मोटी रकम मिली हो, न मिली हो. लेकिन आपको उस यूपी में जा के इसका श्रेय लेने का बहाना तो मिल ही गया जहां हिसार की परिस्थितियाँ शायद ही कोई जानता होगा.
अगर आप नवाज़ शरीफ के नक़्शे कदम पर चल रहे हैं तो भी, अपना ये मानना है कि आप ग़लतफ़हमी में हैं. वकील और किसी भी वर्ग की बजाय ज्यादा गहराई से देखेगा आपकी जन लोकपाल वाली जिद को. वो पूछेगा कि किसी भी शासन तंत्र में नियुक्ति का अधिकार सरकार के अलावा किसी और को कैसे दिया जा सकता है. और अगर कर्मचारी वे सरकार के होंगे तो उन्हें सिवाय चुनाव आयोग की परिपाटी के किसी भी संस्था के हवाले कैसे किया जा सकता है?
आपने कहा कि भाजपा की चिट्ठी आ गई. क्या इसमें लिखा है कि लोकपाल जिन सरकारी कर्मचारियों से काम लेंगे वे हमेशा उन्हीं के अधीन होंगे? क्या संयुक्त संसदीय समिति में बाकी सभी पार्टियों ने स्पष्ट कर दिया है कि आपके सुझाए प्रावधानों पे उनका स्टैंड क्या है? अगर नहीं तो फिर पीछे आप कांग्रेस के ही क्यों पड़े हो? और अगर आपको लगता है कि उसी का जाना ज़रूरी है तो फिर विकल्प भी बताओ. वरना क्या फायदा होगा अगर यूपी की सीटें सभी पार्टियों में बराबर बराबर बंट गईं. और अगर आपको कांग्रेस भ्रष्ट सबसे ज्यादा लगती है तो फिर आपकी निगाह में भट्टा परसौल क्या है, मायावती का सात सौ करोड़ी हाथी पार्क क्या है? या येदुरप्पा का जेल जाना?
जिस दिन आप लोगों ने आन्दोलन किया आप इस देश की जनता के लिए एक उम्मीद और देश के हीरो थे. आज आप और न सही विवादास्पद व्यक्ति तो हैं. लोग आपसे सवाल पूछने नहीं लगे, खुद आप पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगे हैं. ये व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई बड़ी मुश्किल होती है और सत्ता हमेशा कठोर. लेकिन न प्रशांत भूषण की पिटाई सत्ता ने कराई है, न आप पे चप्पल उसने फिंकवाई है. ये वो ही गुबार है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ था तो सरकार के खिलाफ था. आज आप से भी नाउम्मीदी हुई है तो फिर चप्पलें आप पर फिंकने लगी हैं. लोग जानना चाहते हैं कि आप राजनीति क्यों करने लगे हैं. क्यों लोग मानने लगे हैं कुछ भी ले लेकर आप किसी के भी खिलाफ प्रचार करने लगोगे. बात आ ही गई है तो ये मैं आपसे कह रहा हूँ अरविन्द जी, पूरी जिम्मेवारी के साथ. आप मेरी मर्ज़ी से किसी पार्टी के खिलाफ प्रचार कर देना यूपी में, दस बीस करोड़ का इंतजाम मैं कर दूंगा आप के लिए ! …
मुझे दुःख है ये कहते और लिखते हुए लेकिन आपकी छवि आम आदमी में आज कुछ ऐसी ही हो गयी है. बहुत बेहतर होता आप अन्ना जी के साथ बैठे ही रहते अनशन पर, आपके लोकपाल बिल का निपटारा होने तक. वो विशुद्ध आन्दोलन तो होता. अब क्या है? उसे आप राजनीति की गन्दी दलदल में घसीट लाये हो. मान लीजिये आपका मकसद कांग्रेस पे दबाव बनाना है तो तब क्या होगा जब कांग्रेस आपके ये सब करने के बावजूद सरकार बना ले जाएगी अगली बार भी. और तब क्या अगर कांग्रेस की जगह आई किसी दूसरी सरकार ने भी सारे देश के कर्मचारियों के विद्रोह से डरते उन सब को आपके लोकपाल के अधीन नहीं किया?
आन्दोलन और अव्यवस्था में कोई बहुत लम्बा चौड़ा फर्क नहीं होता अगर आप खुद उसे सही दिशा में न रख पाएं. भीड़ देख कर सम्मोहित न होइए अरविन्द जी. भीड़ ही की बात करें तो रामदेव के पास आपसे पहले भी ज्यादा थी, आज भी ज्यादा है. जनता के बीच टूटते तिलिस्म को देखिये. खुद अपनी टीम में आते बिखराव को देखिए. और इस आन्दोलन से उपजीं भ्रष्ट हो और कर सकने वाली संभावनाओं को देखिए. मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जिसने संपत्ति के लिए अपने माँ और बाप दोनों की हत्या कर दी और अन्ना के नाम पर आज ज़माने को डराता फिरता है. भीड़ अपना काम करने आई. वो आई तो फिर अपना काम करके चली जाएगी. मगर भीड़ एक राजनीतिक दार्शनिक के अनुसार ‘मूर्ख’ भी हो सकती है. लोकपाल कैसा हो इसका फैसला विचारशील व्यक्तियों ने करना है. आपको अगर संसद पे विश्वास नहीं है तो या तो खुद चुनाव लड़ लड़ा के देख लो या फिर जैसा भी बिल पास होता है होने दो, उसमें फेरबदल की बात इस देश में सबसे विद्वान व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट के जजों पर छोड़ दो. लेकिन भगवान के लिए अपने आन्दोलन को चुनावी दलदल में न धकेलो. सिवाय कीचड़ में मुंह सन जाने के, कुछ नहीं मिलेगा वहां!
स्नेह सहित,
जगमोहन फुटेला
वरिष्ठ पत्रकार
चंडीगढ़


