भाजपा के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार फिर यात्रा पर निकलने की घोषणा की तो उसे देखने, उसके निहितार्थ को समझने का लोभ संवरण नहीं कर सका. हम उनकी दो-तीन राजनीतिक यात्राएं पहले भी कवर कर चुके हैं. लेकिन अगले आठ नवंबर को उम्र के 84 वर्ष पूरा करने जा रहे आडवाणी की यह यात्रा कई मायने में अलग है. यह उनकी पहली यात्रा है जिसे उनके अपनों ने ही निस्तेज करने के यत्न किए. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आंखें फेर लेने के कारण इसका शुभारंभ उन्होंने गुजरात में सोमनाथ अथवा सरदार पटेल के जन्म स्थान करमसद से करने के बजाय सत्तर के दशक में बिहार में और फिर पूरे देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनांदोलन खड़ा करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर 11 अक्तूबर को उनके ही जन्मस्थान, सिताबदियारा से करने की घोषणा की.
लोकसभा चुनाव अभी तीन साल बाद होने हैं लेकिन यात्रा पर निकलने से पूर्व उन्हें आरएसएस के मुख्यालय में हाजिर होकर सफाई देनी पड़ी कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं और इस यात्रा का मकसद उनका राजनीतिक पुनर्वास भी नहीं है. तो फिर इस यात्रा का मकसद क्या है. इस जिज्ञासा के साथ हम एक दिन पहले ही छपरा-सिताबदियारा पहुंच गए. सरयू और गंगा नदियों के पेटे में तकरीबन दो दर्जन टोलों को मिला कर बने सिताबदियारा गांव के कुछ हिस्से उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में और कुछ बिहार के आरा और छपरा जिले में आते हैं. जेपी का जन्म लाला का टोला में हुआ था, जो अभी बिहार के छपरा जिले में है. बताते हैं कि गांव में प्लेग आने और उससे भी अधिक हर साल बाढ़ के समय सरयू नदी द्वारा टोले का बड़ा भूभाग निगल लिए जाते रहने से आजिज जेपी के परिजन बगल में ऊंचाई पर बसे टोले में चले गये, जो अभी उ.प्र. में जयप्रकाश नगर कहलाता है. जीवित रहते पूर्व प्रधान मंत्री चंद्रशेखर अन्य बड़े प्रभावशाली लोगों के साथ अक्सर और जेपी की जयंती, पुण्य तिथि पर तो खासतौर से वहां जाते.
समारोह होते और इस सबके चलते जयप्रकाश नगर का विकास भी होते गया. लेकिन सिताबदियारा के बाकी टोले इतना भाग्यशाली नहीं रहे. उन्हें आजादी के 64 साल बाद भी देखने पर पिछड़ेपन का भूगोल समझ में आ सकता है. ऊबड़-खाबड़ और दूर दूर तक गड्ढ़ों में बदल गए तटबंध रोड पर गिट्टी गिराने का काम जारी था. इस रास्ते से जेपी के जन्मस्थान तक पहुंचने के बाद समझ में आया कि आडवाणी की रथयात्रा का शुभारंभ सिताबदियारा से क्यों नहीं हुआ. वहां उनका भीमकाय रथ पहुंच ही नहीं सकता था. लिहाजा वे वहां हेलीकॉप्टर से गए. एक अनोखी मगर शर्मनाक बात यह भी देखने को मिली कि आजादी के 64 वर्ष गुजर जाने के बावजूद जेपी के गांव में बिजली नहीं पहुंच सकी थी जबकि कांग्रेस राज के 40 वर्षों को छोड़ भी दें तो पिछले 22 वर्षों से बिहार में उनके राजनीतिक शिष्यों-लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का ही राज है.
जन चेतना यात्रा को छपरा में जद यू के नेता, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हरी झंडी दिखाई. आडवाणी के साथ वे सिताबदियारा भी गए. इस बहाने गांव में बिजली भी गई. हालांकि पूरे कार्यक्रम में नीतीश अतिथि ही नजर आए. उन्होंने भरसक कोशिश की कि उनके धर्मनिरपेक्षता वाले राजनीतिक दामन पर आडवाणी, भाजपा और संघ परिवार का भगवा रंग नहीं चढऩे पाए. आडवाणी खुद भी इसी प्रयास में दिखे. पूरी यात्रा के दौरान उन्होंने अपनी ‘राम रथी’ की कट्टर हिंदुत्व वाली छवि तोडऩे की कोशिश की. लगा जैसे एक बार फिर वह अटल बिहारी वाजपेयी की तरह अपना भी उदारवादी चेहरा पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. 12 अक्टूबर को समाजवादी नेता डा. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर पटना में वह उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण करने गए. प्रेस वार्ता में उन्होंने जेपी और लोहिया के साथ अपने करीबी संबंधों का भी हवाला दिया.
यह बात और है कि इससे पहले उन्हें अथवा भाजपा को भी जेपी और लोहिया की जयंती अथवा पुण्यतिथि के अवसर पर कभी नहीं देखा गया. शायद कट्टरपंथी नेता की छवि से बाहर निकलने की कोशिशों के क्रम में ही अयोध्या-राम मंदिर, कश्मीर और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों का उन्होंने जानबूझकर कहीं जिक्र तक नहीं किया. एक बार किसी ने राम जन्मभूमि मंदिर के लिए उनकी राम रथ यात्रा और उनके द्वारा खाई जाने वाली कसमों की याद दिलाई तो उन्होंने यह कह कर चैप्टर क्लोज करने की कोशिश की कि अयोध्या पर अदालत के फैसले से उनका ‘राम काज’ पूरा हो गया है.
वह सिर्फ भ्रष्टाचार पर ही बोलना चाहते थे. यह सवाल भी मन में कौंधते रहा कि जन चेतना यात्रा अगर विशुद्ध रूप से भ्रष्टाचार के विरुद्ध ही है तो उन्होंने अपनी यात्रा का सारथी-संयोजक ऐसे व्यक्ति को कैसे बनाया जिसके नाम राजग सरकार में मंत्री रहते घोटालों में लिप्त रहने और खासतौर से तकरीबन 14500 करोड़ रु. के हडको घोटाले में उछले थे. यात्रा के एक अन्य सह संयोजक की भूमिका भाजपा मुख्यालय में हुई करोड़ों रु. की नकदी की चोरी में संदिग्ध बताई गई. भाजपा के एक तत्कालीन अध्यक्ष बंगारु लक्षमण कैमरे के सामने रिश्वत लेते धरे गए थे. राजग शासन के दौरान भाजपा के ही एक नेता दिलीप सिंह जू देव कैमरे के सामने कहते सुने गए कि ‘पैसा खुदा तो नहीं लेकिन खुदा से कम भी नहीं.’ हाल के वर्षों में संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे लेने की बात हो या फिर कबूतरबाजी की, नोट लेकर वोट देने का मामला हो या फिर सांसद निधि के आवंटन में घपले-घोटाले की बात, प्राय: सभी घोटालों में भाजपा के लोगों के नाम ही प्रमुखता से सामने आए. ऐसे में बेहतर तो यही होता कि औरों से अलग होने का दावा करने वाली भाजपा के भीतर ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन चेतना जगाई जाती.
लेकिन आडवाणी जी अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में भी केवल यूपीए सरकार के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले, ‘नोट फार वोट’ एवं कुछ अन्य घोटालों, कालेधन का जिक्र करते हैं. भाजपा शासित राज्यों में फैले भ्रष्टाचार के बारे में उनके मुंह से बोल नहीं फूटते. पुरानी बातें छोड़ दें. कम से कम कर्नाटक और उत्तराखंड में उनके दो मुख्यमंत्री-बी एस येदियुरप्पा और रमेश पोखरियाल निशंक हाल ही में भ्रष्टाचार के कारण ही हटाए गए थे. येदियुरप्पा की गिरफ्तारी के बाद के दो दिन तक तो उन्होंने उस पर कोई टिप्पणी ही नहीं की. गला खराब होने के नाम पर उन्होंने यात्रा के दौरान मीडियाकर्मियों से बातचीत और अपनी प्रेस वार्ताएं भी रद्द कर दीं. जाहिर है कि इस सबका असर उनकी यात्रा को मिलने वाले समर्थन और उत्साह में कमी के रूप में भी दिखा क्योंकि कांग्रेस हो अथवा भाजपा, सपा हो या बसपा, द्रमुक हो अथवा अन्ना द्रमुक जनता सबके भ्रष्टाचार से पीडि़त और आक्रोशित है. इस मामले में वह आडवाणी की तरह फर्क नहीं करती.
बिहार में उनकी यात्रा के दौरान रास्ते में और सभाओं में भी जुटी भीड़ राज्य में भाजपा-जद (यू) सरकार के होने का प्रमाण थी तो उ.प्र. के वाराणसी और मिर्जापुर में सरकार के नहीं होने और कुछ हद तक भाजपा की गुटबाजी का अर्थ भी साफ समझ में आया. वाराणसी से भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी सांसद हैं जबकि यह इलाका एक अन्य पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह, प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कलराज मिश्र और ओमप्रकाश सिंह का प्रभाव क्षेत्र भी कहा जाता है. कलराज मिश्र की स्वाभिमान यात्रा को वाराणसी में आडवाणी ने ही अपनी सभा के बाद हरी झंडी दिखाई. वाराणसी में आमतौर पर बड़े नेताओं की सभाएं बेनिया बाग के मैदान में होती हैं लेकिन आडवाणी की सभा का आयोजन भारत माता मंदिर के प्रांगण में किया गया जहां बमुश्किल दो हजार लोग जुटे.
मध्यप्रदेश में जरूर एक बार फिर भाजपा के सत्ता में होने का रंग दिखा. रास्तों में और सभाओं में जुटी अथवा जुटाई गई भीड़ से आडवाणी खुद भी काफी गदगद दिखे. सरकारी प्रयासों से चहुंओर उत्सव का माहौल था. बिजली, सड़क और पानी के नाम पर सत्ता में आई भाजपा सरकार ने इस मौके पर बिजली और सड़क का फौरी इंतजाम तो कर लिया. सड़कों पर ताजा डामर और भरे गए गड्ढ़े साफ बताते थे कि काम आनन फानन में हुआ है. इसके बावजूद जब जगह-जगह सड़कों का बदहाल स्वरूप दिखा तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह सड़क उनकी नहीं केंद्र सरकार (राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) की है. जो भी हो, बदहाल सड़कों के कारण ही आडवाणी ने भोपाल से छिंदवाड़ा तक की यात्रा उडऩखटोले में की. हाल के दिनों में राज्य में क्लर्क से लेकर नौकरशाह तक के घरों से करोड़ों रु. की काली कमाई बरामद हुई. मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. एक सूचना अधिकार कार्यकर्ता शेहला मसूद भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने के कारण ही मौत के घाट उतार दी गई. और तो और सतना में आडवाणी जी की यात्रा की बेहतर कवरेज के लिए स्थानीय सांसद और राज्य सरकार के मंत्री द्वारा बुलाई गई प्रेस वार्ता में स्थानीय पत्रकारों के बीच 500 और एक हजार रु. के नोट बांटे गए. इस सबके बावजूद आडवाणी जी ने कहा कि वह म.प्र. में शिवराज सिंह के ‘सुशासन’ से बेहद प्रभावित हैं और उनके मध्यप्रदेश की तर्ज पर ही ‘नया भारत’ बनाना चाहते हैं.
महाराष्ट्र के विदर्भ में प्रवेश करने के साथ ही आडवाणी और उनकी यात्रा के प्रति उदासीनता साफ नजर आई. नागपुर संघ का मुख्यालय है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी भी यहीं से हैं. लेकिन पूरे विदर्भ में रास्तों पर और सभाओं में भी इसका प्रमाण देखने को नहीं मिला. नागपुर में आडवाणी की सभा बहुत छोटे, चिटणीस पार्क में हुई, इसके बावजूद वहां कम लोग जुटे. गडकरी ने नागपुर से ही उन्हें विदा कर दिया. आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में जरूर उत्साहित और प्रतिक्रियाशील भीड़ ने आडवाणी का स्वागत गर्म जोशी से किया. हालांकि यह भीड़ भाजपा अथवा आडवाणी और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम के समर्थन से ज्यादा अलग तेलंगाना राज्य की मांग पर जोर देने के लिए थी. एक जगह तो आडवाणी को लोगों ने भ्रष्टाचार के बजाय अलग तेलंगाना राज्य के समर्थन में बोलने के लिए बाध्य सा कर दिया. नतीजतन आदिलाबाद से लेकर हैदराबाद तक वह जय तेलंगाना राग ही अलापते नजर आए.
पिछली दो यात्राओं-मार्च 2004 में कन्याकुमारी से अमृतसर तक की भारत उदय यात्रा और फिर 6 अप्रैल से 10 मई 2006 तक गुजरात में द्वारका से दिल्ली तक की भारत सुरक्षा यात्रा के समय आडवाणी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद के घोषित दावेदार थे. हालांकि दोनों बार मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया था. लेकिन इस बार तो उन्हें उनके अपनों ने ही निस्तेज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्हें सफाई देनी पड़ रही है कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं. क्या बोलना है क्या नहीं बोलना है- किस मसले पर चुप्पी साधनी है, इस तरह के निर्देश भी उनके पास आ रहे हैं. हालांकि प्रधानमंत्री की दावेदारी से जुड़े सवालों के जवाब में वे यह कहना नहीं भूलते कि ”चुनाव के समय पार्टी ही तय करेगी कि प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार कौन होगा. यह बहुत कुछ स्वास्थ्य पर भी निर्भर करेगा. अभी तो फिट हूं, आगे न जाने कैसा रहे.” गौरतलब है कि इस उम्र में भी डाक्टरों ने उन्हें पूरी तरह निरोगी घोषित कर रखा है.
एक प्रसंग और, आडवाणी को इस यात्रा में भाजपा के संकटमोचक कहे जाते रहे स्व.प्रमोद महाजन की कमी बहुत खल रही है. इसका जिक्र उन्होंने नागपुर
की प्रेस वार्ता में भी किया. सच तो यह है कि आडवाणी की पहली ‘राम रथ यात्रा’ के प्रेरणा पुरुष और सारथी वही थे. उन्होंने ही उनका पहला रथ तैयार करवाया था. यह एक अजीब संयोग है कि भारत सुरक्षा यात्रा के दौरान 21 अप्रैल 2006 को आडवाणी के काफिले में नागपुर तक हम भी साथ थे. नागपुर की सभा में प्रमोद महाजन भी थे. उसी दिन वे मुंबई लौट गए और हम दिल्ली. अगले दिन मुंबई में उन पर अपने ही सहोदर भाई द्वारा गोलियां दागने की खबर आई. कुछ दिन बाद यही गोलियां उनकी मौत का कारण भी बनीं. नागपुर में आडवाणी की जन चेतना यात्रा के पहुंचने के समय वाकई प्रमोद महाजन बहुत याद आए.
लेखक जयशंकर गुप्त जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकमत समाचार के कार्यकारी संपादक हैं.


