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इरोम शर्मिला : सैनिकीकरण के विरुद्ध जनतंत्र संघर्ष के 11 साल पूरे

मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला आज संघर्ष की कठिन राह पर हैं। इस साल चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो जायेंगे। इतनी लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वह न सिर्फ हमारे ‘लोकतंत्र’ की नौकरशाही और सैनिक तंत्र का मुकाबला कर रही हैं बल्कि अपनी मृत्यु से भी पंजे लड़ा रही हैं। इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, उस वक्त वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई।

मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला आज संघर्ष की कठिन राह पर हैं। इस साल चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो जायेंगे। इतनी लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वह न सिर्फ हमारे ‘लोकतंत्र’ की नौकरशाही और सैनिक तंत्र का मुकाबला कर रही हैं बल्कि अपनी मृत्यु से भी पंजे लड़ा रही हैं। इरोम शर्मिला ने जब भूख हड़ताल की शुरुआत की थी, उस वक्त वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम शर्मिला के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई।

 

हकीकत यह है कि तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद इरोम शर्मिला की भूख हड़ताल आज भी जारी है। भले ही इन वर्षों में इरोम शर्मिला का कृषकाय शरीर और जर्जर व कमजोर हुआ हो पर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छाशक्ति बढ़ी है। इसीलिए इसे मात्र भावुकता नहीं कहा जा सकता है बल्कि यह पूर्वोत्‍तर भारत खासतौर से मणिपुर के ठोस यथार्थ की आँच में पका उनका विचार व दृढ इच्छा शक्ति है, जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो-उत्पीड़ितों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है। इरोम शर्मिला के संघर्ष में हमें इसी दावेदारी की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इसके अन्तर में स्वतंत्रता की छटपटाहट और अदम्य साहस से लबरेज मौत को धता बता देने वाली ताकत है। इसीलिए आज इरोम शर्मिला इस्पात की तरह न झुकने, न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं।

बात दो नवम्बर 2000 की है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। मारे गये लोगों में 62 वर्षीया वृद्ध महिला लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि शामिल थीं। यह सब इरोम शर्मिला को आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम के लिए शान्ति रैली निकाल कर सत्‍ता की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने एलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्थी जनता के विरुद्ध सत्‍ता का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्‍पा) हटाया जाय। इस एक सूत्री माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया। तीन नवम्बर की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और चार नवम्बर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी।

इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहाँ उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया है। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है। इस तरह इरोम शर्मिला को जिन्दा रखने का ‘लोकतांत्रिक’ नाटक पिछले एक दशक से ज्यादा समय से चल रहा है।

उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हें रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से तरल पदार्थ देने का सिलसिला चलाया जाता है। यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना ही है कि एक तरफ इरोम शर्मिला की जान बचाने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर उनके नाक से तरल पदार्थ पहुँचाया जा रहा है, वहीं इरोम शर्मिला की माँग कि मणिपुर से अफस्‍पा को हटाया जाय, इस कानून की वजह से जो पीड़ित हैं, उन्हें न्याय दिया जाय तथा इसके लिए जिम्मेदार सैनिक अधिकारियों को दण्डित किया जाय – जैसे मुद्दों पर विचार करने तक को सरकार तैयार नहीं है।

दरअसल, इरोम शर्मिला जिस ‘अफस्‍पा’ को हटाये जाने की माँग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं, उस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। यही नहीं, यह कानून सशस्त्र बलों को किसी भी दण्डात्मक कार्रवाई से बचाती है, जब तक कि केन्द्र सरकार उसके लिए मंजूरी न दे। देखा गया है कि जिन राज्यों में ‘अफस्‍पा’ लागू है, वहाँ नागरिक प्रशासन दूसरे पायदान पर पहुँच गया है तथा सरकारों का सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ी है। इन राज्यों में जनतंत्र शिथिल हुआ है और सैनिकीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है, जन आन्दोलनों को दमन का सामना करना पड़ा है तथा नागरिकों में अलगाव की भावना बढ़ी है। हालत यह है कि आज देश के पाचवें हिस्से में ‘अफस्‍पा’ लागू है।

इसी का चरम रूप हमे मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में देखने को मिलता है जहाँ ‘आस्‍पा’ शासन के 53 वर्षों में बीस हजार से ज्यादा नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी है। इसी की देन एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या है तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट है। इस संदर्भ में 2004 में मणिपुर की महिलाओं द्वारा किये संघर्ष की चर्चा करना प्रासंगिक होगा। उनके आक्रोश और चेतना का विस्फोट हमें देखने को मिला जब असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’। इरोम शर्मिला इसी यथार्थ की मुखर अभिव्यक्ति हैं।

इरोम शर्मिला का यह संघर्ष अभी हाल में उस वक्त खास चर्चा में आया जब पिछले अगस्त में अन्ना हजारे जन लोकपाल की माँग को लेकर रामलीला मैदान में अनशन पर थे। इरोम शर्मिला ने अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का गर्मजोशी के साथ समर्थन किया था। अन्ना को लिखे अपने पत्र में इरोम शर्मिला का कहना था कि जहाँ अन्ना को अहिंसक तरीके से विरोध करने की स्वतंत्रता मिली, वहीं उन्हें यह स्वतंत्रता नहीं दी गई। इसके विपरीत

कौशल किशोर

उन्हें अपने अहिंसक आंदोलन के लिए जेल की काल कोठरी मिली है। इरोम शर्मिला की ये बातें हमारे जनतंत्र की वास्तविकता को सामने लाती है और उनका संघर्ष इस हकीकत से रुबरु कराता है कि हमारा जनतंत्र कितना खंडित है। यह ऐसा जनतंत्र है जहाँ भारतीय राज्य अशान्त क्षेत्रों में अपनी ही जनता के विरुद्ध अघोषित युद्ध चला रहा है।

लेखक कौशल किशोर एक्टिविस्‍ट हैं, ब्‍लॉगर हैं तथा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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