
गिरीश जी
आधे दर्जन के लगभग जो अन्य पार्टियां प्रमुख रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत जीती हैं, वे धर्मनिरपेक्ष, मानवाधिकार समर्थक और श्रमिक अधिकारों की हिमायती हैं. नतीजे मार्क्सवाद, समाजवाद, पूंजीवाद समर्थक विचारधाराओं और बौद्धिक दार्शनिकों के असर से भी दूर प्रतीत होते हैं. दिलचस्प यह भी है कि दुनिया की अन्य मशहूर क्रांतियों/ बदलावों के नेताओं जैसे थॉमस पेन, मौंटेस्क्यू, ज्यां जेक्स रूसो, रोब्सपियर, लेनिन, माओ, गांधी या फिर पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध के साम्यवाद विरोधी आंदोलन के चेक नेता वेकलाव हावेल इत्यादि की तरह इसका कोई स्थापित नेतृत्व भी नहीं है. जोर बेहतर शासन और अच्छी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की स्थापना पर है, लोगों को संतुष्ट करने वाली अर्थनीति और तानाशाही से निजात दिलाते मानवाधिकारों पर है.
नाहदा इस्लामी पार्टी है. पुनर्जागरण की बात उठा रही है. लेकिन उसके नेता 70 वर्षीय राशिद गनूची घोषणा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी और उसके समर्थक विचार के स्तर पर लोकतांत्रिक पहले हैं, इस्लामी उसके बाद. गनूची का सारा जोर पहले से चल रही धर्मनिरपेक्ष-उदार व्यवस्था को बनाए खने पर ही है. 75 लाख मतदाताओं में से अनेक ने इस चुनाव में पहली बार वोट डाले हैं, इसलिए अनेक क्षेत्रों में 90 फीसदी से भी ज्यादा उत्साही मत पड़े. 11 हजार से ज्यादा प्रत्याशी चुनाव में खड़े हुए और 100 से ज्यादा पार्टियों ने अपना भाग्य आजमाया. लेकिन खास यह रहा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़चढ़ कर रही. दरअसल 1956 में ट्यूनीशिया ने हबीब बोरगुइबा की अगुवाई में जब फ्रांसीसियों से आजादी हासिल की तभी उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और महिलाओं को अधिकार के मुद्दे प्रमुखता से उठाए थे. इसी का नतीजा है कि आज वहां बहुविवाह प्रतिबंधित है. महिलाओं के विवाह की न्यूनतम आयु 18 साल है. पुरूषों के समान महिला साक्षरता दर भी काफी है, जो 65 प्रतिशत है, जब कि 15 से 24 साल के आयुवर्ग में यह 96 फीसदी है. जाहिर है महिलाएं सार्वजनिक जीवन के सभी क्षेत्रों और व्यवसायों में प्रभावी हैं. दरअसल ट्यूनीशिया के एकछत्र तानाशाह जिन अल अबीदीन बेन अली के क्रूर शासन के दौरान गनूची को न केवल जेल में रहना पड़ा बल्कि वो 22 साल तक देश से निष्कासित भी रहे. इससे जहां गनूची ने दुनिया के दूसरे देशों को नजदीक से देख कर अनुभव हासिल किया, वहीं उन्हें बेन अली के जाने के बाद जनता की स्वाभाविक सहानुभूति भी मिली. कहा जा सकता है कि गनूची भले ही इस्लामी पार्टी नाहदा के नेता हैं लेकिन उनकी दृष्टि हबीब बोरगुइबा का ही विस्तार है.
महवपूर्ण यह भी है कि अरब देशों में पिछले एक वर्ष के इस जम्हूरी तूफान ने तीन तख्तों को उखाड़ फेंका. सबसे पहले तो ट्यूनीशिया के बेन अली को भागना पड़ा, फिर मिस्र के शासक को और उसके बाद लीबिया के कर्नल मोहम्मर गद्दाफी को अपदस्थ होना पड़ा. अली की कहानी तो इसलिए भी मजेदार है कि जब उनका विमान जल्दबाजी में ट्यूनीशिया से उड़ा तो उन्हें यह पता नहीं था कि उन्हें शरण कहां लेनी है. नतीजतन कई घंटे तक विमान भूमध्य सागर के ऊपर चक्कर लगाता रहा. फ्रान्स समेत कई देशों ने शरण देने से इन्कार कर दिया. फिर बड़ी मुश्किल से सउदी अरब ने उन्हें अपने यहां उतरने की इजाजत दी. बेन अली, उनकी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों की तानाशाही से जनता बेइंतिहा परेशान थी. तभी तो एक सब्जी विक्रेता से विवाद ने स्थिति को क्रांति के मुहाने पर पहुंचा कर एक नये जम्हूरी तूफान की शुरुआत कर दी, जिसने देखते-देखते मिस्र, लीबिया, यमन, ओमान, बहरीन, सउदी अरब, जॉर्डन, इराक, इरान, सीरिया, लेबनान जैसे अनेक देशों में दस्तक दी. अब सीरिया को लेकर अरब लीग और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में चर्चा है कि उसे देश की सड़कों-गलियों से अपने टैंकों को वापस बुला लेने चाहिए, वरना स्थिति विस्फोटक हो सकती हैं. अभी तक की खबरें यही हैं कि वहां तीन हजार लोग राष्ट्रपति असद की मुखालिफत में मारे जा चुके हैं.
बहरहाल ट्यूनीशिया में संवैधानिक परिषद में नाहदा दूसरी पार्टियों से तालमेल करके संविधान निर्माण और राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री का चुनाव करेगी. यह ठीक है कि जनता की लोकतांत्रिक अपेक्षायें ज्यादा हैं और सेना, पुलिस, न्यायपालिका इस नए तेवर को कितना झेल पाती हैं- यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन जनता ने जिस तरह से बेहतर उदार व्यवस्था के लिए अपने रुझान को व्यक्त किया है, वह जनता की एक बड़ी जीत है. दरअसल जनता ने जिस तरह से दुनिया के अनेक देशों में विभिन्न विचारधाराओं और जनता के चहेते नेताओं के पतन की कहानियां देखी-सुनी हैं, उसने भी उन्हें किसी व्यक्ति आधारित नेतृत्व या ‘हीरो वर्शिप’ से दूर ही रखा है. वैसे इसका दूसरा कारण यह भी रहा कि अरब देशों के एकतंत्री शासन में बौद्धिक नेतृत्व या तो विरोध के चलते खुद ही देश छोड़ कर चले गए, या फिर उन्हें शासन द्वारा मिला लिया गया. नतीजतन अलग से लोकतांत्रिक क्रांति के लिए कोई बौद्धिक जनस्वीकार्य नेतृत्व पैदा नहीं हो सका. अनेक बौद्धिकों ने यदि जनरैलियों में शिरकत की भी तो वे औरों की तरह ही रहे, नेतृत्व नहीं किया.
गौरतलब यह भी है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अरब राष्ट्रवादी आंदोलन उफान पर रहा. उस समय आदर्शवादी नौजवानों ने बढ़चढ़ कर क्षेत्र को पिछड़ेपन और उपनिवेशवादी शोषण से मुक्ति के लिए प्रयास भी किया. कमाल पाशा का इस दिशा में बड़ा योगदान है. इन्हीं के नक्शे कदम पर चल के और राष्ट्रवादी अवधारणा के तहत सीरिया में बाथ पार्टी आई-जिसका लक्ष्य था आधुनिकता, आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय. इसी तर्ज पर इराक में भी प्रयास हुआ. लेकिन फिर जल्दी ही सैन्य नायक सारी सोच और व्यवस्था पर प्रभावी हो गए तानाशाही का जन्म हुआ. मिस्त्र में भी अरब समाजवाद तानाशाही में परिणित हुई, और इसकी पराकाष्ठा देखने को मिली- गद्दाफी के लीबिया में. गद्दाफी ने साम्यवादी और पूंजीवादी व्यवस्थाओं से दूरी तो बनाई लेकिन जनता की बेहतरी नहीं, खुद की तानाशाही के लिए. संभवतः यह एक बड़ा कारण रहा जिसे हम अरब आंदोलन के विश्लेषण में प्रमुख रूप में पाते हैं कि लोग क्रांतिकारियों की गद्दाफी शैली से दूर हो गए. यह रोमैंटिक क्रांतिकारियों और जनता से दूर होते शासकों के लिए सबक भी है. इस कहानी में नाम भले बदले हों, लेकिन विभिन्न देशों में जनता का रूझान एक ही है- बेहतर आधुनिक व्यवस्था. निश्चित रूप से ट्यूनीशिया की यह शुरुआत दूसरे अरब देशों के लिए नजीर ही साबित होगी- जहां पुराने से सबक लेते हुए कोरे कागज पर नई कहानी लिखने की शुरुआत हो चुकी है.
लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.


