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गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी थी भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के साहित्‍य विद्यापीठ की ओर से ‘रामचंद्र शुक्‍ल की इतिहास दृष्टि और भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता’ विषय पर आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह के दौरान राष्‍ट्रीय संस्‍कृत संस्‍थान, लखनऊ के शिशिर कुमार पाण्‍डेय ने कहा कि भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई थी। पर आज की मीडिया सामाजिक सरोकारों से कटती जा रही है। भारतेंन्‍दुयुगीन पत्रकारिता का भाषा की रूप-रेखा के निर्माण में प्रेमधन की पत्रिका ‘आनन्‍द कादम्‍बनी’ का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है तथा इस दौर की पत्रकारिता ने सामाजिक व राजनीतिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया।

वर्धा : महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के साहित्‍य विद्यापीठ की ओर से ‘रामचंद्र शुक्‍ल की इतिहास दृष्टि और भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता’ विषय पर आयोजित विशेष व्‍याख्‍यान समारोह के दौरान राष्‍ट्रीय संस्‍कृत संस्‍थान, लखनऊ के शिशिर कुमार पाण्‍डेय ने कहा कि भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता गहरे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई थी। पर आज की मीडिया सामाजिक सरोकारों से कटती जा रही है। भारतेंन्‍दुयुगीन पत्रकारिता का भाषा की रूप-रेखा के निर्माण में प्रेमधन की पत्रिका ‘आनन्‍द कादम्‍बनी’ का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है तथा इस दौर की पत्रकारिता ने सामाजिक व राजनीतिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया।

बतौर वक्‍ता, श्री वार्ष्‍णेय महाविद्यालय, अलीगढ़ के हिंदी विभाग के प्रमुख डॉ.रमेश कुमार पाण्‍डेय ने आचार्य रामचंद्र शुक्‍ल की इतिहास दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य शुक्‍ल साहित्‍य की साहि‍त्यिकता की रक्षा करते हुए सहृदय पाठक के रूप में व्‍याख्‍या करते हैं। उन्‍होंने कहा कि ‘ह्वाट हैज़ इंडिया टू डू’ जैसे लेख लिखने वाले आचार्य शुक्‍ल साम्राज्‍यवादी नीतियों को समझते हुए यह सवाल उठाते हैं कि ग्रामवासियों को यह जानना चाहिए कि आखिर वह इतना कम क्‍यों कमाता है। उन्‍होंने कहा कि आचार्य शुक्‍ल सिर्फ साहित्‍य के नहीं अपितु सांस्‍कृतिक आलोचक हैं।

दोनों वक्‍ताओं के उद्बोधन के उपरांत विद्यार्थियों द्वारा उठाए गए सवालों पर विस्‍तार से चर्चा हुई। समारोह की अध्‍यक्षता करते हुए साहित्‍य विद्यापीठ के प्रो.के.के.सिंह ने कहा कि शोधार्थियों का ध्‍यान भारतेन्‍दुयुगीन पत्रकारिता पर होनी चाहिए। उन्‍होंने आचार्यशुक्‍ल की इतिहास दृष्टि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, कहा जाता है कि तथ्‍य स्‍वयं बोलते हैं, यह सच नहीं है। सारे सच तथ्‍य स्‍वयं नहीं बोलते हैं। वही तथ्‍य बोलते हैं जिन्‍हें बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसे वैचारिक आधार बताते हुए उन्‍होंने कहा कि यही कारण है कि आचार्य शुक्‍ल के बाद आचार्य द्विवेदी जी इसी विषय पर साहित्‍य के इतिहास की आलोचना करते हैं। साहित्‍य विद्यापीठ की रीडर डॉ. प्रीति सागर ने संचालन किया तथा सहायक प्रोफेसर डॉ. रामानुज अस्‍थाना ने आभार व्‍यक्‍त किया। इस अवसर पर विद्यापीठ के प्राध्‍यापक, शोधार्थी व विद्यार्थी बड़ी संख्‍या में उपस्थित थे। प्रेस रिलीज

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