Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

बच्चे जियेंगे, तभी नया बंगाल गढ़ेंगे ममता जी

यह दुर्भाग्य ही है कि देश में कहीं जब ढेर सारी मौतें होने लगती हैं, हो-हल्ला मचता है, तभी समस्या की गंभीरता का पता चलता है और सरकारें जागती हैं। वह चाहे यूपी में गोरखपुर इलाके में फैला दिमागी बुखार हो या बंगाल में हो रहीं शिशुओं की मौतें। फिलहाल तो बंगाल चर्चा में ज्यादा है, जहां अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में सरकारी अस्पतालों में 40 से ज्यादा नवजात बच्चों की मौतें हुई हैं। कोलकाता और बर्दवान के अस्पतालों की मौतों को लेकर जांच कमेटी बैठाने से पहले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीसी राय अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी, जहां सबसे ज्यादा मौतें हुईं। हालांकि यह क्लीन चिट ममता पर तब भारी पड़ गई, जब दो और वारदातें हुई।

यह दुर्भाग्य ही है कि देश में कहीं जब ढेर सारी मौतें होने लगती हैं, हो-हल्ला मचता है, तभी समस्या की गंभीरता का पता चलता है और सरकारें जागती हैं। वह चाहे यूपी में गोरखपुर इलाके में फैला दिमागी बुखार हो या बंगाल में हो रहीं शिशुओं की मौतें। फिलहाल तो बंगाल चर्चा में ज्यादा है, जहां अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में सरकारी अस्पतालों में 40 से ज्यादा नवजात बच्चों की मौतें हुई हैं। कोलकाता और बर्दवान के अस्पतालों की मौतों को लेकर जांच कमेटी बैठाने से पहले ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीसी राय अस्पताल प्रबंधन को क्लीन चिट दे दी, जहां सबसे ज्यादा मौतें हुईं। हालांकि यह क्लीन चिट ममता पर तब भारी पड़ गई, जब दो और वारदातें हुई।

नवंबर शुरू होते ही मुर्शिदाबाद में एक प्रसूता के मामले में लापरवाही के चलते एंटीसेप्टिक के बदले एसिड से साफ कर दिया गया। बच्चे की भी इसी वजह से मौत हुई, क्योंकि उसके शरीर पर भी झुलसने के निशान पाये गये। अभी उसके घाव भर ही रहे थे कि सात नवंबर को कोलकाता के बाघाजतीन अस्पताल में एक चिकित्सक महोदय शराब पीकर इमर्जेसी वार्ड में चिकित्सा करने लगे। एक रोगी को उनकी हालत का पता तब चला जब वे दर्द वाले दाहिने पैर की जगह बाएं पैर का निरीक्षण करने लगे। इसके पहले दोपहर तक वे कई रोगियों का कथित इलाज कर चुके थे। कुछ माह पहले महानगर के एक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक महिला मरीज के पैर की एक उंगली को चूहों ने कुतर दिया था।

ममता ने इस बदहाली का ठीकरा पिछली वाममोर्चा सरकार पर फोड़ा है और एक हद तक वे सही भी हैं। राज्य के सरकारी अस्पताल बहुत पहले से बीमार चल रहे हैं। हालांकि 20 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही ममता ने महानगर के कई अस्पतालों का छापामार शैली में दौरा किया था। उसमें बाघाजतिन वाला अस्पताल भी था। कई निलंबनों व हड़काने वाली कार्रवाइयों के बाद व्यवस्था को दुरुस्त करने का वादा भी किया गया। जाहिर है इस तरह के शार्टकट से स्वास्थ्य सेवा की दु:साध्य बीमारी का इलाज संभव नहीं होता, जब तक कि बुनियादी सुविधाएं न बढ़ाई जायें। मालूम हो कि नौ वर्ष पहले यानी 2002 में भी तीन दिनों में बीसी राय अस्पताल में ही 32 बच्चों ने दम तोड़ा था। तब भी वाममोर्चा ने कथित तौर पर एहतियाती कदम उठाये थे। आज विपक्ष में बैठी माकपा के राज्य सचिव विमान बसु मुख्यमंत्री के साथ स्वास्थ्य मंत्री का काम भी देख रहीं ममता पर निशाना साध रहे हैं, पर इस मामले में वाममोर्चा सरकार का रिकार्ड भी खराब ही रहा है।

मिसाल देखिए। साल 2008-2009 में बंगाल के 19 जिलों के बच्चों को ओरल पोलियो ड्राप पिलाये गये, जो एक्सपायरी थे। यह तथ्य उभरकर आया भारत के महालेखा परीक्षक व नियंत्रक विनोद राय की रिपोर्ट में, जो उन्होंने इसी साल 23 मई को पेश की थी। बंगाल के एकाउन्टेंट जनरल-आडिट सुदर्शन तलापात्र द्वारा उपलब्ध कराये गये इस तथ्य की छानबीन के बाद पेश रिपोर्ट ने बताया कि पल्स पोलियो वैक्सीन को जिस फ्रिज में रखा जाता है, उसका तापमान 18 से 20 डिग्री तक होना जरूरी है। जब पर्यवेक्षक कोलकाता के बागबाजार केंद्रीय परिवार कल्याण केंद्र के पोलियो सेंटर गये तो पता चला कि फ्रिज खराब है और तापमान निर्धारण की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां का तापमान 40 डिग्री मापा गया। टीकों की जांच के बाद 31.92 लाख फाइलों को नष्ट कर दिया गया, जिनकी कीमत 1.50 करोड़ रुपये थी। दुर्भाग्य की बात है कि इसके पहले 10 लाख शिशुओं को ये टीके खिला दिये गये थे।

हाल में बच्चों की मौत से कहीं अधिक दुखदाई अस्पताल प्रबंधन का यह तर्क है कि ऐसा तो होता ही रहता है। बताया गया कि बड़ी संख्या में बच्चे तभी आते हैं, जब उनकी हालत खराब हो चुकी होती है। ममता ने भी अस्पताल को क्लीन चिट देने में देर नहीं की और हैरत है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी ऐसा ही किया। स्पष्ट है कि देश को यह बताने-समझाने की कोशिश हो रही है कि सरकारी अस्पतालों में एक दिन में 10-12 बच्चों की मौत से परेशान होने की जरूरत नहीं है। हकीकत है कि जैसी दुर्दशा बंगाल के सरकारी अस्पतालों की है, वैसे ही हालात देश के दूसरे सरकारी अस्पतालों में भी हैं। कहीं कम तो कहीं ज्यादा।

आंकड़े बताते हैं कि देश में हर एक हजार बच्चों में से 66 बच्चे पांच साल की उम्र तक पहुंचने से पहले दम तोड़ देते हैं। 2009 में देश में 2,67,87,000 बच्चे पैदा हुए और 17,26,000 बच्चे पांच साल की उम्र से पहले ही चल बसे। बच्चों की मौत का औसत पांच हज़ार रोजाना से ऊपर है। इन मौतों को रोका जा सकता है, अगर हमारी सरकारें बच्चों के लिए न्यूनतम स्वास्थ्य सेवाएं बहाल कर दें। देश में लगभग 84 फीसदी मेडिकल खर्च लोगों को अपनी जेब से करना पड़ता है। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए इलाज कराना नामुमकिन हो जाता है। उल्लेखनीय हैं कि गरीबों के इलाज का वायदा कर देशभर में बड़े-बड़े निजी अस्पताल कौडि़यों के भाव जमीन ले रहे हैं, लेकिन उनका इलाज करना तो दूर, गरीबों को उनके आसपास भी फटकने तक नहीं दिया जाता है। ये अस्पताल नि:शुल्क इलाज के झूठे कागजात तैयार कर गलत आमदनी दर्ज करवा कर टैक्स की चोरी भी करते हैं। इस तरह सरकारी अस्पतालों पर बोझ बढ़ जाता है। अगर सरकारी अस्पतालों की सेवाओं में सुधार हो तो यह काफी राहत की बात होगी। इस संबंध में हम बिहार की मिसाल दे सकते हैं, जहां सरकारी अस्पतालों की सेवाओं में गुणात्मक सुधार हुआ है।

बात बंगाल पर खत्म करते हैं। ममता को एक अलग स्वास्थ्य मंत्री बनाने की सलाह दी जा रही है, क्योंकि ढेर सारे विभाग उनके पास पड़े हैं। उनकी सरकार को बने पांच माह से ज्यादा हो गये और जाहिर है जनता किसी भी तरह के सुधार की उम्मीद भी उन्हीं से करेगी। परिवर्तन के खुशनुमा माहौल में पैदा हो रहे बंगाल के बच्चे अगर जिंदा रहेंगे, तभी तो वे ममता का नया बंगाल गढऩे में अपना योगदान दे सकेंगे।

लेखक बिमल राम कोलकाता के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों के साथ वरिष्‍ठ पदों पर रहे, इस समय स्‍वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं. उनका यह लेख दैनिक ट्रिब्‍यून में प्रकाशित हो चुका है वहीं से साभार लिया गया है.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...