मैं इस देश का बहुसंख्यक हूं। मेरे पास कुछ नहीं है। कभी- कभी तो रोटी के भी लाले रहते हैं। कपड़े का क्या कहूँ, किसी तरह तन ढंका रहता है, लाज बची रहती है। मकान नहीं बना पाया। तीन दीवारों पर एक छप्पर टांग कर रहता हूं, रेलवे लाइन के किनारे डंडों पर प्लास्टिक लटका कर रहता हूं, कभी-कभी सीवर के लिए सड़कों के किनारे पटके गये चौड़े पाइपों में या फ्लाईओवर्स या पुलों के नीचे भी कुछ समय गुजार लेता हूं। गंदे और असुविधाग्रस्त मुहल्लों में रहता हूं। मैं मजदूरी करता हूं, हल जोतता हूं, दिहाड़ी पर खेतों में काम करता हूं, कभी-कभी रैलियों में नारे लगाता हूं। बार-बार बिकता हूं, खरीदा जाता हूं। लोग पैसे की कीमत तो बयां करते हैं लेकिन मेरे श्रम को बहुत हेय दृष्टि से देखते हैं, बड़ा मोल-भाव करते हैं।
इसके बावजूद मैं दाता हूं। मतदाता। मत ही मेरा धन है। लोकतंत्र के कीचड़-कुंभ में हर पांच साल बाद, कई बार बीच में भी मुझे अपनी मत-संपदा के उपयोग का अवसर मिलता है। मत देते ही मैं निर्धन हो जाता हूं। देना मेरा काम है। दाता होकर भी कंगाल, पीड़ित, वंचित रहना मेरी नियति है। मत ही है मेरे पास। मत देकर दरिद्र हो जाता हूं। आजादी के बाद से लगातार मैं मत देता आ रहा हूं। मत देने के बाद भले मेरी कोई कीमत न हो लेकिन मेरे मत की कोई बड़ी कीमत जरूर है क्योंकि मैंने जिन्हें मत दिया, वे अदने से करोड़पति, अरबपति हो गये, सायकिल से आलीशान गाड़ियों पर आ गये, घास-फूस की झोपड़ी से शानदार कोठियों में पहुंच गये। मैंने जिन्हें मत दिया, उनका मत अचानक महत्वपूर्ण हो गया। सुबह का सूरज उगते ही जैसे रात का अंधकार विनष्ट हो जाता है वैसे ही मेरा मत मिलते ही उनका अज्ञानांधकार तिरोहित हो गया और वे हर विषय पर बोलने लगे, सभाओं में आने लगे, उनकी सदारत करने लगे।
मेरा मत मिलते ही उन्हें नोटों की मालाएं पहनायी जाने लगीं, उन्हें सिक्कों से तोला जाने लगा, उन्हें सोने की गदाएं, तलवारें और मुकुट भेंट किये जाने लगे। मैं मत देने के बाद बस रिश्वत देने के लिए अभिशप्त हो गया। मेरे मत की ऊर्जा का उन्होंने रिश्वत में रूपांतरण कर दिया है। इसमें बड़ा दम है। बड़े से बड़ा काम पलक झपकते हो जाता है, फाइलें दौड़ने लगती हैं, बाबू से लेकर बड़े बाबू तक के पांवों में तेजी आ जाती है, उनके चेहरों पर गुलाब खिल जाते हैं। अपना मत दे देने के बाद मेरा कोई मत नहीं रह जाता। मैं चाहे उनकी आलोचना करूं, उनकी निंदा करू, उनके खिलाफ नारे लगाऊं, उनको गालियां दूं, उन पर कोई असर नहीं होता। वे हँसते-मुस्कराते नजर आते हैं, मानो कह रहे हों, बेटा तुम्हें असहमति का अधिकार है, हर किसी को है पर इसकी भी एक सीमा है, उसे न लाँघना। तुम्हारे मत ने मुझे जो ताकत दी है, उसके इस्तेमाल के लिए मजबूर न करना।
तुमने एक बार लाठी मेरे हाथ में सौंप दी है, अब भैस घर ले जाने की जिद न करो। तुम जानते ही हो कि जिसके हाथ में लाठी होती है, भैंस वही ले जाता है। भैंस जिसके पास होगी, दूध भी वही पियेगा, दही, मक्खन, पनीर सब उसी के हिस्से की चीजें होंगी। तुमने मुझे यह मौका दिया, धन्यवाद पर अपनी औकात भी समझो। तुम्हारा काम मत देना है, बस। बाकी काम मुझे करने दो। मुझे बहुत कुछ करना है। मुझे दरिद्रता पर गर्व नहीं है, इसलिए पहले अपनी दरिद्रता भगानी है, कुछ ऐसा कर लेना है कि मेरे बच्चे भी ऐश करें। मुझे तो ऐश करने लायक तुमने बना ही दिया है, कर रहा हूं। तुम सीधे हो, सच्चे हो, इसलिए तुमसे बात करते हुए मैं अपनी झूठ बोलने की आदत कायम नहीं रख पा रहा हूं। सच बोलता नहीं हूं पर अभी सच बोल रहा हूं। अब तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते। तुमने मुझे मत नहीं दिया था, तुम तो मेरे विरोधी से नाराज थे, तुमने उसके खिलाफ अपनी नाराजगी जतायी, वह बिन मांगे मेरी झोली में चली आयी। नाराज मत होना।
असल में तुम्हारी नाराजगी ही खराब चीज है। तुम कभी मुझसे तो कभी उससे नाराज होकर अपना मत देते हो। चलो अच्छा है, इससे मेरे जैसे तमाम समाजविरोधी, जनविरोधी, स्वार्थी, धूर्त और बेईमान लोगों को ठगी का धंधा चलाते रहने का तुम खुद ही मौका देते हो। मैं जानता हूं, तुम जल्दी बदलोगे नहीं। मैं सच कहता हूं, मैं भी बदलने वाला नहीं हूं। तुम ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकते हो, मुझसे नाराज हो जाओगे तो मुझे बदल कर उसे ला दोगे। वह होगा किसी दूसरी पार्टी में पर छल-छद्म में वह मेरा सगा है, सहोदर है, साथी है। चोर-चोर मौसेरे भाई। तुम दाता हो, देते रहो और देकर दरिद्र बने रहो। तुम्हें तुम्हारी निश्छलता मुबारक, तुम्हारी गरीबी मुबारक, तुम्हारी परेशानी मुबारक। तुम्हें तुम्हारी दीनता, हीनता और मलिनता मुबारक। मैं जानता हूं तुम जागोगे नहीं, तुम्हें तुम्हारी नींद मुबारक। तुम सोये रहोगे तो मेरा जोग-भोग-संभोग चलता रहेगा। मुझे जो करना है सो करना, तुम्हारे गुस्से से क्या डरना। तुम्हें तुम्हारा पंचसाला गुस्सा मुबारक।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.


