मैं सोच रहा हूं, आप भी सोचिये कि सचिन आखिर शतकों का शतक बनाने से क्यों चूक गये। मीडिया इस पर खूब सोच रहा है। जब भी कोई मैच होता है और उसमें सचिन खेलने वाले होते हैं तो अखबार वाले, इलेक्ट्रानिक मीडिया वाले सोचने लगते हैं। दस दिन पहले से ही उनका चिंतन शुरू हो जाता है और तब तक चलता रहता है, जब तक सचिन आउट नहीं हो जाते। यह सब आठ महीने से चल रहा है। सैकड़ों घंटे बर्बाद किये जा चुके हैं। वैसे मीडिया के लिए यह कोई नयी बात नहीं है। वह ऐसे तमाम सवालों पर वक्त बर्बाद करता रहता है, जो वाकई सवाल होते ही नहीं। उसके चिंतन के विषय बड़े कौतुक भरे होते हैं। मसलन जल्द ही प्रलय आने वाली है, अगर प्रलय आ गयी तो क्या होगा और नहीं आयी तो क्या होगा। ऐसा लगता है मानों प्रलय नहीं आयी तो उनका काम ही बंद हो जायेगा। वे पूरी दीवानगी से अपना काम करते हैं। कभी आप ध्यान से सुने तो ऐसा लगेगा मानो प्रलय आने ही वाली है। कोई आश्चर्य नहीं कि आप उस समय डर जायें और आप भी सोचने लगे। कुछ ऐसे ही आँय-बाँय-साँय, जैसे मीडिया वाले सोचते रहते हैं।
आप चाहें तो सोच सकते है कि प्रलय आयी और आप अकेले बच गये तो क्या होगा। हो सकता है भगवान आप से ही फिर नयी सृष्टि शुरू करने की सोच रहा हो। आप सोच सकते हैं कि आप अगली सृष्टि के मनु हैं, कहीं आस-पास ही शतरूपा भी होगी। आप सोच सकते हैं कि वह कभी भी आ सकती है और आप से कह सकती है, कौन तुम संसृति जलनिधि तीर, तरंगों से फेंकी मणि एक। आप चाहें तो इसके आगे भी सोच सकते हैं, कुछ कचरा टाइप चिंतन भी कर सकते हैं। आप वहां तक भी पहुंच सकते हैं, जहां तक मीडिया वाले नहीं पहुंच पाते। अब सचिन का ही मामला लीजिए। लगता है जैसे पूरा देश ही किसी माँद से निकलकर स्टेडियम की ओर भागा चला जा रहा है। मेले का नजारा बन जाता है। कुछ गरीबों का फायदा भी हो जाता है। जहां-जहां खेलप्रेमी जुटते हैं, गुलगप्पे वाले, चाट वाले, पान-बीड़ी-सिगरेट वाले अपने ठेले लेकर पहुंच जाते हैं। उनकी खासी बिक्री भी होती है। ईमानदारी के साथ इसका श्रेय सचिंन जी को जाना ही चाहिए। बच्चों, युवकों में तो उन्माद भर जाता है, सचिन के एक-एक रन पर नारे लगते हैं। कुछ देर कोई रन न बने तो चेहरों पर मायूसी छा जाती है जैसे अगर सचिन ने सैकड़ा नहीं बनाया तो कोई प्रलय आ जायेगी, कोई ज्वालामुखी फूट पड़ेगा, पाकिस्तान हमला कर देगा या कोई और बड़ी अनहोनी घट जायेगी।
उनके चाहने वालों ने उन्हें भगवान का दर्जा दे रखा है, उनके मंदिर बना रखे हैं। अब बताइये कोई भगवान नाकाम कैसे हो सकता है? उसकी पराजय, उसकी नाकामी को नाकामी न समझिये श्रीमान, वह जरूर कोई लीला है। कोई बड़ा गहरा अर्थ है सचिन की इस लीला का। सामान्य आदमी नहीं समझ सकता। हां, मीडिया के महंतों की बात न करिये। वे जरूर समझ लेंगे। वे न भी समझें तो क्या, नासमझी तो बयान कर ही सकते हैं। उनकी नासमझी भी कोई मामूली बात नहीं है। जिसे आप, हम नासमझी मानते हैं, उन्हीं चीजों से अखबारों का सर्कुलेशन बढ़ता है, चैनलों की टीआरपी बढ़ती है। अब देखिये, ज्योतिष सम्राट बैठे हैं, उन्होंने नारद बाबा की तरह रूप बनाया हुआ है। बाल काले, दाढ़ी सफेद या सिर पर बड़ा बहुरंगी चोंगा या कुछ और विचित्र सा रूप, जो आप कल्पना नहीं कर सकते। त्रिकालदर्शी हैं। अपना छोड़कर बाकी सबका भूत, भविष्य, वर्तमान जानते हैं। आप कुछ पूछ कर देखिये, तुरत समाधान हाजिर।
शनि का प्रकोप है, हर शनिवार को काली चीजों का दान करिये। राहू ग्रसे हुए है, पिल्लों को रोटियां डालिये, कच्चे तिल का दान कीजिये, शाम को एक माला हाहा-हीही-हूहू जपिये। सब ठीक हो जायेगा। व्यापार में कई साल से घाटा चल रहा है, हर शाम चार लौंग, एक नीबू मिट्टी के पात्र में रखकर मुंहअंधेरे नदी में बहाइये। आठ दिन लगातार करिये, ग्राहक आने लगेंगे, व्यापार चल निकलेगा। प्रेम करते हैं मगर यह पता नहीं कि जिससे प्रेम करते हैं, वह भी प्रेम करती या नहीं। कोई बात नहीं, रोज स्नान करके चंदन का टीका लगाइये और कोशिश करिये कि टीका लगाने के एक घंटे के भीतर वह आप को देख ले। समझिये काम बन गया। वह खुद ही आप के पास आ जायेगी।
मनमोहन सिंह जी को मेरी सलाह है कि इन ज्योतिषियों को कम से कम उन मंत्रियों की जगह बिठा देना चाहिए, जो नाकारा साबित हो गये हैं। महंगाई और पेट्रोल के मामले में जरूर इनको आजमाया जाना चाहिए। अगर समय से इनकी मदद ली गयी होती तो शरद पवार जी को ऐसे खराब समय का सामना नहीं करना पड़ता। सचिन के प्रशंसकों को भी सोचना होगा। आखिर देश के गौरव का प्रश्न है। वे तो खेलेगे ही, उनके फैन भी कुछ करें। तंतर-मंतर, शाबर, टोटके, जो भी हो सके। चलिये मीडिया वालों से परामर्श करके एक ओझा, तांत्रिक, ज्योतिषी महासम्मेलन बुलाते हैं, जिसका नुस्खा सबसे धाँसू होगा, उसे आस्ट्रेलिया में मैच के वक्त आजमाया जाना चाहिए। अगली बार कोई चूक नहीं चलेगी।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 8853002001 के जरिए किया जा सकता है.


