राजनीति लोगों की आकांक्षा व आशा के अनुरूप नहीं हो रही है वरन उस दिशा में हाँकी जा रही है, जहाँ सरकार व उनके मंत्रियों को निजी व दलगत धन व्यवस्था करने वाले लोग ले जाना चाहते हैं। फिर चाहे ऐसी व्यवस्था करने वाली कपंनियां विदेशी भले ही हों। एक ईस्ट इंडिया कपंनी छद्म खरीद व्यापारी बन कर भारतीय बन्दरगाह पर उतरी और देश पर कब्जा कर लिया था। उसे भगाने में दो सदी लगी और लाखों भारतीय शहीद हुए। 1991 में उदारीकरण के नाम से जो राजनीति चलाई गयी उसने केवल विदेशी पूँजी को दिवालिया होने से बचाने के लिए ही कार्य किया। देश की पिचानवें फीसद आबादी की बर्बादी की कीमत पर विदेशी कपंनियाँ, उनके भारतीय साझीदार व दरबारी अर्थशास्त्रियों की टीम को लेकर नेताओं ने राजनीति में ऐसा बंवडर मचाया जिसने देश के नौजवानों को हताशा में भौतिकवादी चश्मा पहना दिया। वे पश्चिमी सभ्यता के महलों में चोवदार की भूमिका में जिन्दगी की गुजर बसर का रास्ता ढूढ़ रहे हैं।
फसल बीमे में विदेशी कपंनियों की दखल व उनके छल, खुदरा व्यापार के बहुब्रान्ड में 51 फीसद व एकल ब्रांड में शत प्रतिशत के विदेशी निवेश की भारत में अनुमति, पेंशन राशि का निजी निवेश, दवाओं के परीक्षण के लिए भारतीय गरीबों का खतरनाक ढंग से उपयोग, दवा कीमतों में आकाश की ऊँचाईयों जैसा मुनाफा, सरकारी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवा को बिगाड़ कर निजी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रोत्साहन, कृषि के मुकाबले वाहनों के लिए ऋण की खुली व्यवस्था, लालची लोगों के भद्दे दिखावे पर हुए धन के अपव्यय की जनता की जेब से पूर्ति जैसे निर्णय क्या यह नहीं बता रहे कि राजनीति किस दिशा में जा रही है? कांग्रेस तो यह संदेश देने में जुट गयी है कि उनके पुरखों ने स्वतन्त्रता संग्राम चला कर गलती की! भाजपा भी इन आरोपों से पृथक नहीं है परन्तु वह क्षम्य मानी जा सकती है। लोग कहते है कि स्वतन्त्रता संग्राम से जुड़ा कोई नेता भाजपा के मूल दल जनसंघ में नहीं था। हमारे स्वतन्त्रता संग्राम में अगनित योद्वाओं ने संघर्ष किया वहीं न जाने कितने चापलूसों ने अंग्रेजों की बंदना की परन्तु स्वतन्त्र भारत ने सभी को सम्मान दिया। अच्छा तो यह हो कि राजनीतिक दल जनता की इच्छा व आकांक्षाओं को समझें। भूखी जनता, आत्म हत्या करते कृषकों के परिवार बेरोजगार होते दुकानदार दीर्घकाल तक बेवकूफ नहीं बनाए जा सकते।
कम से कम देश के बौद्धिक वर्ग को साहस के साथ आगे बढ़कर कहना चाहिए कि राजनीति को पटरी पर लाने के लिए शोर शराबा छोड़कर मुद्दे पर आया जाय। एक वर्ष के लिए फालतू बातों को विराम दें। अन्ना, क्रिकेट, ग्लैमर यह सब हो-हल्ला है जिसमें पीडि़तों की चीख दब रही है। यह मुद्दों से भटकाव के तमाशे हैं। अन्ना जनलोकपाल के साथ पश्चिमी देशों द्वारा भारत में की जा रही आर्थिक नाकेबन्दी को भी मुद्दा बनाऐं। इस समय भारत की आर्थिक नीतियाँ पूँजीपतियों की बैठक में कीर्तन करने वाले अर्थशास्त्रियों द्वारा बनायी जा रही हैं। वाणिज्य नीति का संचालन विश्व व्यापार संगठन के मुखिया कर रहे हैं। स्वास्थ्य नीति विश्व की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी के मालिक बनाते हैं(?) यदि अन्ना इन सब मुद्दों को जोड़ लें तो भारत सुधर जायेगा। जिस देश के राजकुमार के पास सोचने लायक कुछ न हो, वही बोले जो अंग्रेजों के जमाने की आडम्बरी सोच वाले सेवा निवृत नौकरशाह उनके मुँह में डाल दें तो राजनीति को वहां से किसी सावरवती का राणेसिद्व के आश्रम में वापस लाकर नई शुरुआत करनी पडे़गी।
मैं जब लिख रहा हूं कि एक वर्ष के लिए सभी तमासे बंद कर केवल राजनीति पर बहस हो तो यह अटपटी या बचकानी बात नहीं है। देश की जनता को यह जानना बहुत जरूरी है कि बडे़ नेताओं व अधिकारियों ने गैर सरकारी संगठन चला रखे हैं। चिल्ला-चिल्ला कर उसकी परतें खोल कर जनता को दिखानी हैं। यहाँ अरबों रुपयों के झूठ सच में बदले जाते मिल जायेंगे। खादी ग्रामोद्योगों में पंजीकृत ऐसी संस्थायें मिल जायेंगी, जो केवल ठेके लेने व बिल काटने का कार्य करती हैं। यही से पैंतीस पैसे का गिलास पैंतीस रुपये में सप्लाई होता है। विदेशी सॉफ्टवेयर कम्पनी भारत की एन०जी०ओ० को ऐसी दवाओं के प्रचार के लिए अनुदान देती है, जिसकी यहां जरूरत ही नहीं है। हम बड़े लोगों की देखादेखी व उनके फैशन के गुलाम है। अत: भारत सरकार भी विना सोचे उसी प्रचार में जुट जाती है तथा कृतज्ञता व्यक्त करते हुए अपना अनुदान भी दे देती है। बीमारी का खौफनाक चेहरा ऐसा दिखा दिया जाता है कि लोग उस गैर जरूरी दवा को खरीदने पर जुट जाते हैं। विदेशी कंपनी से जितनी खैरात आई थी उससे अधिक मुनाफा विदेश वापस चला जाता है। दरअसल यह सॉफ्टवेयर कंपनी की खैरात नहीं थी। पश्चिम की दवा कंपनियों ने नामी सॉफ्टवेयर कंपनी के मुखिया को ब्रान्ड के रूप में प्रस्तुत कर प्रचार का बजट दिया था।
सरकार जनता के लिए है। राजकुमार को जनता के निठल्लेपन पर गुस्सा आ रहा है। निठल्ली जनता पर राज करने का अधिकार केवल कांग्रेस को है क्योंकि देश की नब्बे फीसदी आबादी को गरीब बनाने में उसने साठ वर्ष कड़ी मेहनत की है। संसद में कभी चर्चा हुई कि सत्तर फीसदी आबादी अपनी आय को इलाज पर खर्च कर राशन आदि उधार में चलाती है। इसके लिए दवाओं को महंगा करने के लिए कांग्रेस की सरकार लगातार सक्रिय रही। इसके लिए उन्हें दवा की लागत व विक्रय मूल्य में एक हजार फीसद की अन्तर भी रखना पड़ा। आम जनता को गरीब बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। राजकुमार को गुस्सा चीन और पाकिस्तान पर नहीं आता जो भारत की हजारों हेक्टेयर जमीन दबाए बैठे हैं। उन्हें गुस्सा केन्द्र सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों पर नहीं आता जिनकी घोटालों की राशि से ही देश का हर बुझा हुआ चूल्हा जल उठेगा।
लेखक गोपाल अग्रवाल समाजवादी आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। इन दिनों समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति के हिस्से हैं तथा समाजवादी व्यापार सभा यूपी के अध्यक्षत हैं. मेरठ निवासी गोपाल से संपर्क


