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प्रधानमंत्री के एक बयान ने लोगों को शर्मिंदगी और सदमे में डाल दिया है

: नाकारा तंत्र और असहाय बच्चे : चाचा नेहरू बच्चों को भगवान का स्वरूप मानते थे बच्चे होते भी भगवान का रूप ही हैं। प्रधानमंत्री के एक बयान ने लोगों को शर्मिंदगी और सदमे में डाल दिया है।  प्रधानमंत्री ने कई दलों के सांसदों और समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों की संस्था हंगामा की तरफ से आये गये सर्वेक्षण से लोगों को अवगत कराते हुए बताया कि दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारतीय है। उन्होंने इस पर चिंता जतायी। चिंता जताना हर नेता का नैतिक अधिकार होता है। अच्छा होता कि वह इस बात के लिए शर्मिंदा होते कि वे उस पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री हैं जिसने देश में सबसे लम्बे समय तक शासन किया है और इस शासन ने बदले में अगर सबसे बेहतर कोई चीज दी है तो वह यह है कि दुनिया का हर तीसरा बच्चा इस नाकारा तंत्र के कारण कुपोषण का शिकार है।

: नाकारा तंत्र और असहाय बच्चे : चाचा नेहरू बच्चों को भगवान का स्वरूप मानते थे बच्चे होते भी भगवान का रूप ही हैं। प्रधानमंत्री के एक बयान ने लोगों को शर्मिंदगी और सदमे में डाल दिया है।  प्रधानमंत्री ने कई दलों के सांसदों और समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों की संस्था हंगामा की तरफ से आये गये सर्वेक्षण से लोगों को अवगत कराते हुए बताया कि दुनिया में कुपोषण का शिकार हर तीसरा बच्चा भारतीय है। उन्होंने इस पर चिंता जतायी। चिंता जताना हर नेता का नैतिक अधिकार होता है। अच्छा होता कि वह इस बात के लिए शर्मिंदा होते कि वे उस पार्टी की सरकार के प्रधानमंत्री हैं जिसने देश में सबसे लम्बे समय तक शासन किया है और इस शासन ने बदले में अगर सबसे बेहतर कोई चीज दी है तो वह यह है कि दुनिया का हर तीसरा बच्चा इस नाकारा तंत्र के कारण कुपोषण का शिकार है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के चालीस फीसदी से ज्यादा बच्चे न सिर्फ कमजोर हैं बल्कि 59 प्रतिशत बच्चों का कद भी उनकी उम्र के हिसाब से बेहद कम है। बेहद शर्मनाक बात तो यह है कि बच्चों में कुपोषण की समस्या दुनिया के सबसे गरीब सहारा अफ्रीका देशों से दोगुनी से भी ज्यादा है। यह स्थिति बताती है कि हमारे बच्चे किस तरह असहाय और अपंग होते जा रहे हैं। साथ ही हमारा नपुंसक नेतृत्व इस दिशा में कोई भी सार्थक पहल नहीं कर पा रहा।

हम दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत होने का दावा करते हैं। हमारी फौज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फौज है। हमारा दावा है कि जब दुनिया के बाजार बद से बदतर हालात में पहुंच रहे थे तब भी हमारा देश मजबूती के साथ खड़ा हुआ था। हमारा नेतृत्व दावा करता है कि उसने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि हम कितने प्रभावशाली हैं और हमारी ताकत दुनिया के सभी देशों को माननी ही पड़ेगी। मगर एक ओर जब हम अपना सबसे बड़ा साम्राज्य दुनिया को दिखा रहे हंै तो दूसरी ओर ऐसी भयंकर तस्वीर भी हमारे सामने है जिसमें हम अपने नौनिहालों को ही नहीं बचा पा रहे हैं।

ऐसी भयंकर रिपोर्ट के बाद पूरे देश में हंगामा मचना चाहिए और साथ ही सरकार को भी यह सफाई देनी चाहिए कि आखिर आजादी के इतने सालों में भी वह ऐसे हालात क्यों नहीं बना पायी कि जिससे हमारे नौनिहाल एक स्वस्थ जिंदगी जी पाते जिससे उनका भविष्य सुरक्षित रह पाता। मगर अफसोस कि ऐसी बातेें हमारे नेतृत्व को शर्मिंदा नहीं करती और न ही उन्हें यह सोचने पर बाध्य करती हैं कि आखिर इन स्थितियों में परिवर्तन कैसे हो पाये।

इससे पहले पूर्वांचल में पिछले कुछ सालों में दस हजार से ज्यादा बच्चे असमय ही काल का शिकार हो गये। जापानी बुखार नामक बीमारी ने इन बच्चों को अपनी चपेट में ले लिया। इस बीमारी में बच्चों को ठंड लगती है और धीरे-धीरे बुखार बढ़ता है। तेजी से बढ़ता हुआ यह बुखार बच्चों को अपनी चपेट में लेता है और वे अपना दम तोड़ देते हैं। इस बात की कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि पूर्वांचल में जब बच्चे को बुखार चढऩा शुरू होता है तो उसके मां-बाप तभी से रोना शुरू कर देते हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि उनका बच्चा अब कुछ ही समय का मेहमान है। इस बीमारी से लडऩे के लिए दिल्ली सरकार ने कोई सार्थक पहल की हो ऐसा भी नहीं हुआ।

इन दोनो कारणों में एक बात महत्वपूर्ण थी जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि आखिर हमारी सरकार इस बीमारी से निपटने में नाकाम क्यों रही। यह सिर्फ इसलिए हुआ कि दोनो कारणों में शिकार बच्चों के माता पिता बेहद गरीब थे। वे किसी खास जाति या खास मजहब के नहीं थे। इसीलिए वह किसी के वोट बैंक नहीं थे। चूंकि वह किसी के वोट बैंक नहीं थे लिहाजा उनके दुःख दर्द से सरकार को कोई सरोकार नहीं था। लिहाजा किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि इन गरीबों के बच्चे जिंदा रहें अथवा मर जायें। जिंदा रहें भी तो वह कुपोषण का शिकार होकर अपंग रहे और जिंदगी भर भीख मांगता रहे।

जिस सरकार के मंत्री सुप्रीम कोर्ट के तमाम निर्देशों के बाद यह कह रहे हों कि वह सड़ता हुआ अनाज समुद्र में फेंक देंगे मगर गरीबों को नहीं बंटवायेंगे। जिस सरकार के मंत्री एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ का घपला कर रहे हों  और सरकार ऐसे बेशर्म लोगों को बचाने पर आमादा हो। जिस सरकार के मुख्यमंत्री कारगिल शहीदों के लिए बनी सोसाइटी के फ्लैट अपने सास, ससुर और सालों को बांट रहे हों। जो सरकार विदेशों में जमा काला धन वापस लाने में लाचारी व्यक्त कर रही हो अगर उस सरकार से अपेक्षा की जाय कि वह कोई ऐसा तंत्र विकसित करेगी जिससे आम गरीब को राहत मिलेगी तो ऐसी आशा करने वाले व्यक्ति को सिर्फ मूर्ख ही कहा जायेगा।

यह तंत्र मजबूर है चंद भ्रष्ट लोगों के हाथों खुद को गिरवी रखने के लिए। यहां सारे नियम और कायदे कानून सिर्फ अमीरों के हितों के लिए बनाये जाते हैं। गरीब और आदिवासी मजबूर हैं इन चंद लोगों द्वारा बनाये गये नियमों से। गरीब रहना और गरीबी को झेलना इन लोगों की नियति बन गयी है। ईश्वर भी शायद इन असहाय लोगों की आवाज नहीं सुन पा रहा। इसलिए गरीब बेबस हैं कि वह अपने बच्चों को अपंग और बेबस होते हुए देखते रहें और बेबस रहें।

जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने थे तब देश को लगा था कि हमने एक योग्य अर्थशास्त्री को देश का नेतृत्व सौंपा हैं लिहाजा देश का अर्थशास्त्र ठीक हो जायेगा। मगर एक अर्थशास्त्री के नेतृत्व में गरीबों का अर्थशास्त्र पूरी तरह बिगड़ गया है। गरीबों को दो वक्त की रोटी और बीमारी की हालत में दवा भी नसीब नहीं हो पा रही है। लंबे समय से यह तंत्र ऐसे ही चल रहा है और लगता भी नहीं कि इसमें जल्दी ही कोई सुधार होने वाला है।

इस देश के आम जन को अब एक और क्रांति के लिए तैयार होना ही पड़ेगा। जब सत्ता चलाने वाले लोग अहंकारी बन जाए और आम जन को उपेक्षित समझने लगे तब एक नई रोशनी और एक नई लौ जलानी ही होगी। यह लौ जब जलेगी तब परिवर्तन की एक नई दिशा तय होगी। हम सबको साफ शब्दों में सरकार को यह समझाना ही होगा कि उसकी मनमानी के दिन अब लद गए हैं। भारत को अगर चाचा नेहरू के सपनों का देश बनाना है तो हमें अपने नौनिहालों को स्वस्थ और खुशहाल बनाना ही होगा। यह संभव नहीं होगा कि हमारा बच्चा खुशहाल रहे और किसी गरीब का बच्चा तड़प तड़प कर अपने प्राण त्याग दे या फिर इस नाकारा तंत्र के कारण जिंदगी भर अपंगता झेलने को विवश हो जाये। हमें अपने बच्चे को खुशहाल बनाना है तो समाज के सभी असहाय बच्चों को भी खुशहाल बनाने की जिम्मेदारी उठानी होगी वरना हमारे बच्चे का भविष्य भी कोई ज्यादा बेहतर रहने वाला नहीं है।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ से प्रकाशित वीकेंड टाइम्स के संपादक हैं.

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