: राजनीति व प्रांतवाद का शिकार कोलेजियम : हाईकोर्ट में जजों का अभाव चिंताजनक : लखनऊ । उच्चतम न्यायालय की पीठ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के नगण्य प्रतिनिधित्व और उच्च न्यायालय इलाहाबाद में माननीय न्यायमूर्तियों की नियुक्ति के अभाव पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व महाधिवक्ता तथा उच्च न्यायालय इलाहाबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता एसएमए काज़मी ने इसे दुखद और चिंताजनक मुद्दा बताया है। उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट न केवल इस देश बल्कि विश्व की सबसे बड़ी हाईकोर्ट इस एतबार से है कि यह 160 न्यायमूर्तियों की पीठ है। दुखद बात यह है कि आज आधे से कम न्यायमूर्तियों की नियुक्ति के बावजूद लगभग 20 करोड़ जनता को न्याय देने की जिम्मेदारी यह हाईकोर्ट उठा रही है।
उन्होंने कहा कि जनसंख्या तथा न्यायमूर्तियों की तादाद के अनुपात में सर्वोच्च न्यायालय में कम से कम तीन न्यायमूर्तियों को उच्च न्यायालय इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व करना चाहिए और कम से कम दो मुख्य न्यायमूर्ति विभिन्न प्रदेशों में इस उच्च न्यायालय से होने चाहिए। जबकि स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायलय में केवल एक और किसी भी प्रदेश में एक भी उत्तर प्रदेश का मुख्य न्यायमूर्ति नहीं है। यह स्थिति क्यों और कैसे पैदा हुई, यह केवल बेंच और बार का मुददा नहीं होना चाहिए बल्कि केन्द्र की कांग्रेस सरकार और प्रदेश की बसपा सरकार जो निर्जीव और अप्रासांगिक मुद्दों पर प्रदेश में राजनीति कर रही हैं, उन्हें भी इस बात पर गौर करना चाहिए था कि वह न्यायपालिका जिसकी मज़बूती पर प्रजातंत्र की आधारशिला खड़ी है, को देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रदेश में कमजोर करके वह प्रदेश की जनता और अपने हितों की कितनी सुरक्षा कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि दुखद बात तो यह है कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद तथा उसकी खण्डपीठ लखनऊ के गौरव और गरिमा की रक्षा करने के बजाय इसी हाईकोर्ट में पनपे कुछ न्यायमूर्तियों ने इस उच्च न्यायालय की गरिमा पर कुछ अनुचित टिप्पणियां करके इस स्थिति को उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन कुछ अप्रासांगिक टिप्पणियों से इस उच्च न्यायालय के उज्जवल इतिहास पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।
श्री काज़मी ने कहा कि विधि और भाषा की निपुणता के एतबार से इलाहाबाद उच्च न्यायालय और लखनऊ खण्डपीठ के जज साहबान देश के सर्वोच्च श्रेणी के न्यायमूर्तियों की सूचि में सम्मिलित किए जाने योग्य हैं परन्तु ऐसा महसूस होता है कि जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम की वह प्रणाली जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका की निर्भीकता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रतिपादित किया था, वही आज आपसी राजनीति और प्रांतवाद जैसी बीमारियों का शिकार हो चुकी है। समय आ गया है कि कोलेजियम की इस प्रणाली और इसकी सार्थकता पर पुनर्विचार किया जाए।
लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित हिंदी दैनिक डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार


