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जो मजा चबूतरे की कमेंटरी, गप्पबाजी, खिंचाई और चुहलबाजी में है वह ट्विटर में कहां

: ट्वीपल और चबूतरे की चुहल : ‘वी द पीपल’ के एक कार्यक्रम में पीपल को ‘ट्वीपल’ बनाने के लिए संचालिका का आभार। उन्होंने ट्विटर-प्रेमियों की एक जमात के बीच टीवी चरचा चलाई थी। ट्विटर फेसबुक लिंक्ड इन आदि किस तरह के मीडिया हैं और किस तरह के संदेश और आदमी ये बनाते हैं, इन मुददों पर चरचा थी। नए साइबर संदेश ज्ञान की बातें थीं। मुख्य धारा के मीडिया यानी अखबार या रेडियो या टीवी के आदी लोगों के लिए ये लोग उनके अनुभव एकदम नए थे। वे चपल-चंचल संचार के प्रेमी थे। इसी चरचा में एक महिला पेनलिस्ट ने कहा कि उसे यह अजीब लगता है कि कई दोस्त एक साथ एक जगह बैठे होते हैं लेकिन वे आपस में बात नहीं करते। वे अपने-अपने मोबाइल पर कान लगाए इधर-उधर बात करते रहते हैं या संदेश लिखते रहते हैं। यह आपसी संपर्क और बातचीत का खत्म होते जाना है!

: ट्वीपल और चबूतरे की चुहल : ‘वी द पीपल’ के एक कार्यक्रम में पीपल को ‘ट्वीपल’ बनाने के लिए संचालिका का आभार। उन्होंने ट्विटर-प्रेमियों की एक जमात के बीच टीवी चरचा चलाई थी। ट्विटर फेसबुक लिंक्ड इन आदि किस तरह के मीडिया हैं और किस तरह के संदेश और आदमी ये बनाते हैं, इन मुददों पर चरचा थी। नए साइबर संदेश ज्ञान की बातें थीं। मुख्य धारा के मीडिया यानी अखबार या रेडियो या टीवी के आदी लोगों के लिए ये लोग उनके अनुभव एकदम नए थे। वे चपल-चंचल संचार के प्रेमी थे। इसी चरचा में एक महिला पेनलिस्ट ने कहा कि उसे यह अजीब लगता है कि कई दोस्त एक साथ एक जगह बैठे होते हैं लेकिन वे आपस में बात नहीं करते। वे अपने-अपने मोबाइल पर कान लगाए इधर-उधर बात करते रहते हैं या संदेश लिखते रहते हैं। यह आपसी संपर्क और बातचीत का खत्म होते जाना है!

अंग्रेजी में लिखा ‘ट्वीपल’ शब्द यहां नागरी में उसी तरह लिखा है जिस तरह हिंदी में पढ़ा जा सकता है। पीपल की जगह यह शब्द नया है। इसमें कौतूहल है। खेल है। जिज्ञासा है और मजा है। यह एक बड़े बदलाव का द्योतक है। पीपल से ट्वीपल होने में पीपल को ज्यादा वक्त नहीं लगा। लेकिन मॉस को अंग्रेजी का पीपल बनने में पीपल को हिंदी में ‘जनता’ बनने में काफी समय लगा और अब तक लग रहा है। मीडिया समाज को बनाता है तो उसकी भाषा उसकी पदावली भी रचता है। अगर मीडिया स्थिर मिजाज का है तो पदावली स्थिर अर्थ वाली रहेगी जैसे प्रिंट का ‘पाठक’ पढ़ने वाला, पढ़ा लिखा विशेष व्यक्ति! पाठक अब तक मौजूद है!

अगर मीडिया स्वयं चंचल वृत्ति का है तो उसकी पदावली फिसलन भरी होगी। इलेक्ट्रानिक मीडिया अपने स्वभाव से चित्र-चंचल ठहरा। उसके दर्शक श्रोता भी चंचल ठहरे। आभासी मीडिया हुआ तो अति चंचल आभासी दर्शक बन गया। जनता से उपभोक्ता बनाया गया लेकिन उसे कहा दर्शक गया। मीडिया और समाज ने आपसी संबंधों की क्रिया में जन, जनता, मॉस और मॉसेज को लगातार बदला है। उसके कई संस्करण किए हैं। आदमी का नाम उसकी पहचान तक बदली है। पीपल यानी जनता से ट्वीपल यानी ‘ट्विटराती जनता’ तक की यात्रा कई मानी में दिलचस्प है। पहले मीडिया ‘सोसाइटी’ या समाज को संबोधित होता था। ‘सोशल नेटवर्क साइट में ‘सोशल’ अब भी लगा हुआ है। मार्शल मेकलूहान के समय तक संचार सामाजिक क्रिया रहा। मीडिया विकास का बड़ा औजार रहा। अब वह राष्ट्र राज्य को परिभाषित करने वाला जन, जनता और पब्लिक ,रिपब्लिक को परिभाषित करने वाला बन चला है। उसके शतध रूप और स्तर उसको लोगों का आंख-कान बना रहे हैं।

एक नया मीडिया मय व्यक्ति बन रहा है जो मीडिया में रहता है। उसमें जीता-मरता है। उसका संदर्भ-प्रसंग सब वही है। उसकी लाइब्रेरी, उसकी दुकान, उसका टिकट सब वही है। उसका चौका वही है। बस उसमें चूल्हा नहीं जला सकता। रोटी नहीं बना सकता। अब तक सामाजिक प्राणी कहलाता मानव अब मीडिया प्राणी बन गया है। इससे कई लाभ हैं मगर ऐंद्रिक जीवन की हानि हो रही है। इंद्रियों की हानि हुई तो आदमी या समाज क्या बनेगा, कोई नहीं जानता। देखते-देखते अखबार का पाठक रेडियो का श्रोता और टीवी प्राणी अब सिर्फ एक सौ चालीस अक्षरों वाला ‘ट्विटर प्राणी’ बन गया है। शब्द कोश कम हो रहा है। भाषा का बरतना कमतर हो रहा है। बहुत कुछ कम हो रहा है।

बचपन में बच्चे पढ़ा करते। एक राष्ट्र होता, राज्य होता, नागरिक होते हैं। कुल मिलकर समाज बनाते हैं। समाज में ‘क्लास’ हुआ करती थी। क़्लास के बरक्स ‘मॉस’ होती थी। ‘मॉस’ का मतलब वजनदार एकमुश्त कोई चीज, एक साथ जमा लोग जो काम करें, फैक्टरी दफ्तर से निकलते, सड़क पर चलते जैसे आफिस के आने-जाने के समय में आईटीओ पर या मुंबई लोकल ट्रेनों के प्लेटफार्मो पर या किसी मैदान में। यह भीड़ होती जो मॉस कही जाती। रैलियों में भीड़ अभी तक भीड़ होती है। जब संख्या बढ़ जाती है, वह ‘समर्थक भीड़’ बन जाती है और उसे आदर देना हो तो ज्ञानियों द्वारा उसे जनता कहा जाने लगता है। मॉस सोसाइटी से ‘मास कल्चर’ निकली। मजदूर निम्न-मध्य वर्ग एक साथ एक जैसा जीवन जीने, एक सी चीजें सस्ते में बरतने वाले लोग। यह महानगरों में बनी। लंदन पेरिस में बनी। दिल्ली मुंबई में बनीं। यह ‘मॉस’ बनी यानी निचला जीवन, निचली कल्चर वाली जनता!

मास यानी किसी बड़े उदात्त उद्देश्य से रहित असंगठित लेकिन इकट्ठी। यों इकठ्ठी होती। वह ‘क्राउड’ यानी ‘भीड़’ कही जाती थी। उसका दंगों में उपयोग होता तो दंगाई को माब्स्टर कहा जाता। मॉब अमेरिकी इतिहास में आया माब्स्टर यानी माफिया हुआ, जो भीड़ उपयोग अपने हित में करे। उससे अपराध कराए हिंसा कराए। उसे बचाए। उसे विशेष ‘मॉब’ बनाया गया। सामान्यत: मॉस में से कुछ मॉब बन जाते। आधुनिक राष्ट्र राज्य की कल्पना ने मॉस को पीपल बनाया। वह पीपल बन गई। नए विमर्श में मीडिया में एवं समाजशास्त्रों में पीपल को ‘पब्लिक’ कहा जाने लगा। इस तरह ‘जनता’ बनाया गया तो जनता ‘जनता’ बन गई। पब्लिक बनाई गई वह पब्लिक बन गई। पब्लिक में से सिविल सोसाइटी बनाई तो वह सिविल सोसाइटी बनने लगी। मीडिया ने सिटीजन जर्नलिस्ट बनाए। अब ट्वीपल।

ट्विटर की दुनिया अल्पाक्षरवादी है। यहां एक सौ चालीस शब्दों में दुनिया जहान के फैसले हो जाते हैं। आपके पास कंप्यूटर है। इंटरनेट है। इंटरनेट वाला मोबाइल है तो आप ट्वीपल जगत के नागरिक बन सकते हैं। यह अलग साइबर राष्ट्र है। इसकी कीमत है। वजन है। यहां जनमत बनता है, यह मीडिया को प्रभावित करता है।‘कमखर्च बालानशीं’ की तर्ज पर ‘कमशब्द बालानशीं’। सब एक सौ चालीस अक्षरों से अपनी बात कह चरचा में आ सकते हैं। यहां सबको छूट है। साइबर जनतंत्र है। यहां चरचा में आने का मतलब ही है कि आप जीवित हैं।

अपना समाज अभी तक गप्पियों, गोष्ठीबाजों, अड्डा मारने वालों का समाज बना हुआ है। ट्विटर साइबर स्पेस का अड्डा है लेकिन जो मजा चबूतरे की कमेंटरी, गप्पबाजी, खिंचाई और चुहलबाजी में है वह यहां कहां? साइबर स्पेस में ओपिनियनें आती जाती हैं।चौक के चबूतरे पर चुटीली चुहल रहती हैं। पीपल ट्वीपल बना। मुहल्ले से चबूतरा गायब हुआ लेकिन आपसी गप्प-चुहल वह अभी तक नहीं गई न जाएगी! यही है,जायका गप्प का!

जाने-माने मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी का विश्लेषण.

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