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एकला चलो रे… और याद आ गए टैगोर

: रवीन्द्र रचना महोत्सव की पहली शाम : रवीन्द्र रचना महोत्सव शब्द राग रंग की दूसरी शाम रवीन्द्र संगीत के नाम रही। पीपुल्स मीडिया एंड थिएटर की ओर से जवाहर कला केन्द्र में आयोजित रवीन्द्र संगीत संध्या में तकरीबन एक दर्जन कलाकारों ने टैगोर की रचनाओं को संगीतबद्ध कर श्रोताओं को आनंदित किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रख्यात कला मर्मज्ञ विजय वर्मा के उद्बोधन से हुई। वर्मा ने रवीन्द्र संगीत के बारे में श्रोताओं को बताया। उन्होंने बताया कि जो जीवन की राह दिखलाए, वो रवीन्द्र संगीत है। हालांकि उन्होंने भाषा की बाध्यता के कारण इसका बंगाल और बंगलादेश के अलावा अन्य जगहों पर प्रसार कम होना बताया। वर्मा ने खमाज राग में रिकॉर्डेड रवीन्द्र संगीत प्ले कर उसके बारे में श्रोताओं को समझाया।

: रवीन्द्र रचना महोत्सव की पहली शाम : रवीन्द्र रचना महोत्सव शब्द राग रंग की दूसरी शाम रवीन्द्र संगीत के नाम रही। पीपुल्स मीडिया एंड थिएटर की ओर से जवाहर कला केन्द्र में आयोजित रवीन्द्र संगीत संध्या में तकरीबन एक दर्जन कलाकारों ने टैगोर की रचनाओं को संगीतबद्ध कर श्रोताओं को आनंदित किया। कार्यक्रम की शुरुआत प्रख्यात कला मर्मज्ञ विजय वर्मा के उद्बोधन से हुई। वर्मा ने रवीन्द्र संगीत के बारे में श्रोताओं को बताया। उन्होंने बताया कि जो जीवन की राह दिखलाए, वो रवीन्द्र संगीत है। हालांकि उन्होंने भाषा की बाध्यता के कारण इसका बंगाल और बंगलादेश के अलावा अन्य जगहों पर प्रसार कम होना बताया। वर्मा ने खमाज राग में रिकॉर्डेड रवीन्द्र संगीत प्ले कर उसके बारे में श्रोताओं को समझाया।

रवीन्द्र संगीत की शाम मुखर हुई अशोक मुखर्जी और उनके साथियों के गायन वादन से। रवीन्द्र संगीत की कुल 13 रचनाएं सुनाईं गईं। पागला हवा गीत में सारे जहां की थकावट के बाद घर लौटने के आराम को रेखांकित किया गया। अभी चीनी गो चीनी गे तुम्हारे में कलाकारों ने पहचान से रूबरू कराया। गायन में सारेगामापा विनर सुमंत मुखर्जी और रवीन्द्र संगीत में पीएचडी कर रही गार्गी बनर्जी ने भी अशोक मुखर्जी का साथ दिया। स्ट्रिंग गिटार पर पवन बालोदिया, तबले पर चौथमल, वायलन पर महावीर, कीबोर्ड पर लोकेश ने संगत की। माझी रे चलते जाना में निरंतर बढ़ते रहने की प्रेरणा और बाग-बाग गीत में वर्तमान बसंत ऋतु का बखान किया गया। कार्यक्रम में दर्शक उस समय करतल ध्वनी और गुनगुनाते हुए साथ देने लगे जब रवीन्द्र नाथ टैगोर की कालजयी रचना एकला चलो को गाया गया। कार्यक्रम का समापन जनगणमण यानी की हमारे राष्ट्रगान से हुआ। रवीन्द्र नाथ टैगोर दुनिया के एक मात्र वो रचियता हैं जिनकी लिखी दो अलग अलग रचनाएं दो दो राष्ट्रों में राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार की गई हैं। पीएमटी के अध्यक्ष अशोक राही ने बताया कि बुधवार 8 फरवरी को तीन दिवसीय इस रवीन्द्र रचना महोत्सव का समापन होगा। समापन में दोपहर में जवाहर कला केन्द्र के कृष्णायन सभागार में रवीन्द्र की कहानियों का वाचन होगा और शाम को रंगायन सभागार में टैगोर के दो काव्य नाटकों के साथ कार्यक्रम का समापन होगा।

हर घर में हो चिराग, रोशनी चाहे कम ही हो

…और तोता खामोश हो गया

 

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