पता नहीं आपके शहर-कस्बे में जो अखबार सबसे ज्यादा बिकता है/बिकते हैं, उनका क्या हाल है, मगर हमारी दिल्ली के दो-तीन बड़े अंग्रेजी अखबार तो लगभग रोज बड़े से विज्ञापन के आवरण में लिपटे हुए मिलते हैं। ऊपर अखबार का नाम भर होता है और नीचे पूरे पृष्ठ का विज्ञापन होता है, कभी-कभी वैसे आधे पृष्ठ का भी होता है। जिस दिन यह संपादकीय लिखा जा रहा है, उस दिन भी इनमें से एक अखबार के मुखपृष्ठ से पहले आधे पृष्ठ का आगे और आधे पृष्ठ का उसके ठीक पीछे की तरफ डिजायर नामक कार के एक नये मॉडल का विज्ञापन है। साथ ही संयोग से उसी दिन अंदर अखबार का 20 पृष्ठों का जो परिशिष्ट है उसमें 2011 की भारत की मोस्ट डिजायरेबल वूमेन (सबसे ज्यादा पसंदीदा औरत) करीना कपूर को बताया गया है। यानी कार भी डिजायरेबल है और करीना भी!
दरअसल फिल्मवालों के लिए सबसे पसंदीदा औरत या मर्द घोषित होना एक व्यावसायिक उपलब्धि होती है, क्योंकि फिल्म का सारा धंधा ही ऐसी छवियों पर निर्भर होता है, जो बड़े परिश्रम से, बहुत पैसा खर्च करके गढ़ी और गढ़वाई जाती हैं। करीना की जल्दी ही शादी भी होने वाली है- सैफ अली खां से- तो शायद इस छवि की इस समय उसे सबसे ज्यादा जरूरत भी रही होगी, क्योंकि सामान्यत: शादी के बाद फिल्मी हीरोइनों का बाजार भाव काफी गिर जाता है, जबकि फिल्मी हीरो पर शादी करने या 10-15 साल पुरानी पत्नी को तलाक देने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या कारण यह है कि लड़कियां अपने पसंदीदा एक्टर को उसकी शादी के बावजूद चाहना बंद नहीं करती होंगी, जबकि लड़कों-युवकों की नजर से वह हीरोइन उतर जाती है, जिसने किसी हीरो आदि से शादी कर ली है? क्या उन्हें लगने लगता है कि यह सुंदरी तो किसी और की हो चुकी है, अब हमारे सपनों की रानी नहीं सकती।
कारण जो भी हो, सच तो यह है कि कैटरीना-करीना या प्रियंका या कोई और, लाखों-करोड़ों दर्शकों के लिए सिर्फ पर्दे पर दिखने वाला सपना ही होती है और इससे ज्यादा वह हो भी नहीं सकती, लेकिन अगर हमारा अनुमान सही है तो इससे मर्दाना सोच की एक परत जरूर खुलती है कि उसे अभिनय से और यहां तक कि हीरोइन की शारीरिक खूबसूरती से भी उतना मतलब नहीं होता, जितना कि इससे कि वह उसे अपने ख्वाबों में अपनी होते हुए देख सकता है या नहीं! यह भी शायद एक वजह है कि ऐसी हीरोइनें ज्यादा चलती हैं जो खूबसूरत-सी लगती हैं या जो अपनी खूबसूरती को खूबसूरती से बेच पाती हैं मगर अभिनय-वभिनय जिन्हें जरूरतभर ही आता है। वैसे ज्यादातर हीरो के बारे में भी यही सच है। इन्हीं सब वजहों से हिंदी फिल्म उद्योग 99 प्रतिशत औसत दर्जे की फिल्में पैदा करता रहता है, जो ज्यादातर बार पिट जाती हैं, लेकिन कभी-कभी इतनी ज्यादा चल भी जाती हैं कि फिल्म निर्माता के वारे-न्यारे हो जाते हैं।
बहरहाल हम मोस्ट डिजायरेबल ठूमन ऑफ 2011 पर लौटते हैं। करीना जाहिर है कि इस घोषणा से बहुत खुश है और इससे यह संभावना शायद कुछ बढ़ गई हो कि वह शादी के बावजूद कुछ समय तक फिल्मों में चलती रहेगी, हालांकि उसे छवि निर्माण उद्योग की इस हकीकत का भी पता है कि 2012 की सबसे पसंदीदा औरत कोई और होगी। इस बीच एक बात जरूर हुई है कि अब पुराने किस्म के संकोच दूर हुए हैं (कभी-कभी कुछ ज्यादा ही) और अब हीरोइनें अपनी सेक्स-अपील के बारे में भी बात करने से संकोच नहीं करतीं। करीना भी कहती है कि मैं तो साड़ी में भी सेक्सी लगती हूं वगैरह। जाहिर है कि सफल हीरोइन होने के लिए सेक्सी लगना अब ज्यादा जरूरी हो गया है। यह जरूरत बाकी सभी जरूरतों पर भारी पड़ रही है।
बहरहाल फिल्में सच और आभास के बीच की दूरी को कम-से-कम हमारे सपनों में जरूर पाट देती हैं और इसलिए हर समय के लड़कों और लड़कियों के अपने-अपने पसंदीदा हीरो और हीरोइन होती हैं, जिनके सपने वे देखा करते हैं। मेरे भी जो बुजुर्ग हैं, वे भी अपने जमाने की हीरोइनों को इसी तरह चाहते रहे हैं और सुरैया आदि की तस्वीरें जेब में या पर्स में रखकर या सपनों में उन्हें पाकर खुश होते रहे हैं। लेकिन यह ज्सबसे ज्यादा पसंदीदा औरत क्या होती है? इस बार करीना को और पिछली बार कैटरीना को किन-किनकी पसंद से ज्सबसे पसंदीदा औरत बनाया गया, यह तो खैर वीक-वीक अखबारवाले ही जानें, मगर एक स्तर पर इस सबका व्यापक संदेश लोगों के बीच क्या जाता है? क्या यह औरत को सिर्फ उसकी तथाकथित सेक्स-अपील तक सीमित कर देने की कोशिश नहीं है? क्या यह पुरुषों की सेक्स की कुंवित भूख को और ज्यादा जगाने की कोशिश नहीं है? और क्या ऐसी तमाम ऊपर से भोली-सी लगने वाली इन कोशिशों के कारण ही अक्सर यह नहीं होता है कि कोई स्त्री या लड़की कहीं अकेली होती है या भीड़भरी बस-ट्रेन में होती है तो उसके शरीर को छूने-पकड़ने-मसलने और यहां तक कि बलात्कार करने तक की कोशिशें भी होती हैं? जाहिर है कि करीना-कैटरीना तो ऐसे पुरुषों से सुरक्षित रहती हैं, लेकिन वे औरतें, जो कामकाजी हैं, चाहे वे मजदूरन या क्लर्क या सिपाही या अफसर हैं या मीडियाकर्मी हैं, वे ज्यादा से ज्यादा असुरक्षित होती चली जाती हैं क्योंकि ऐसे पुरुषों की पकड़ में जो आ जाए, वही उनके लिए फिर कैटरीना-करीना हो जाती है और वे पर्दे पर नहीं, असलियत में होती हैं, इसलिए करीना-कैटरीना उनके लिए जिंदा गोश्त होती हैं।
बहरहाल व्यवहार में, जीवन में किसी भी पुरुष की पसंदीदा स्त्री या किसी भी स्त्री का पसंदीदा पुरुष बुनियादी रूप से वही हो सकता है जो एक-दूसरे को समझ सके, एक-दूसरे के विचारों-भावनाओं का सम्मान कर सके, दोनों में से कोई किसी को बदलना भी चाहे, तो जोर-जबरदस्ती से या जिद से नहीं बल्कि धीरे-धीरे अपने व्यवहार से, अपने काम से और फिर भी किसी के पूरी तरह बदल जाने की उम्मीद-अपेक्षा न रखे। जो यह नहीं समझ सकता कि दूसरे का भी अपना व्यक्तित्व होता है, अपनी पसंद-नापसंद होती है, अपना स्वभाव और संस्कार होते हैं, अपनी कमियां और खूबियां होती हैं, अपनी जरूरतें होती हैं, वह व्यक्तिगत जीवन सफल ढंग से नहीं जी सकता, हमेशा परेशान रहता है।
करीना (या बेबो) पर्दे पर खूबसूरत दिखे, इतना ही काफी है। वैसे पर्दे पर दीखने वाली खूबसूरती, पर्दे पर दिखने वाली खूबसूरती ही होती है। उसमें सौंदर्य-प्रसाधनों और कैमरे आदि का कमाल ज्यदा होता है। वैसे असल में खूबसूरत मर्द और औरत तो वे हैं या वे हुए हैं जिन्होंने तरह-तरह से इस दुनिया को खूबसूरत बनाने की सफल-असफल कोशिशें की हैं और आज भी कर रहे हैं। उस किसान या उस मजदूर से खूबसूरत कौन हो सकता है, जिसने आधा पेट खाकर भी, झुग्गी में रहकर भी, करीना जैसी तमाम औरतों को अपने को खूबसूरत कहलवाने दिया है, जिसका कि करीना को पता भी नहीं है। जिन्होंने श्रम से, कल्पना से, बुद्घि कौशल से, हार न मानने की अपनी जिद से, अपनी जान को खतरे में डालकर भी इस दुनिया को खूबसूरत बनाने की कोशिश की है, वे ही दरअसल खूबसूरत हैं। वह औरत या मर्द या किशोर या किशोरी क्या कम खूबसूरत है, जिसने जलती आग से घिरे लोगों को बचाया और कई बार दूसरों को बचाने के लिए खुद भी अपनी जान दे दी, जिसने घायलों को अस्पताल पहुंचाया है, जिसने समता और बराबरी की बात की और उस पर अमल करके भी दिखाया, जिसने कुचलों को आत्मविश्वास दिया, जिसने किसी एक के भी जीवन में कभी रोशनी दी। हो सकता है इनमें से किसी एक पैमाने पर कभी करीना भी खरी उतरी हो या भविष्य में उतरे लेकिन उससे ज्यादा खूबसूरत तो बहुत से लोग हमारे आसपास हैं, हो सकता है हमारे अपने घर के अंदर ही वे हों लेकिन हम उन्हें देख-समझ न पा रहे हों क्योंकि उनके पास उस तरह की तथाकथित खूससूरती नहीं है जो करीना-कैटरीना आदि के पास है। यह शारीरिक खूबसूरती भी वास्तव में जितनी होती नहीं, उससे ज्यादा मार्केटिंग के जरिए हमें विश्वास दिलाया जाता है कि वह है। वैसे दीखना और होना भी दो अलग बातें होती हैं, पर्दे का जीवन और वास्तविक जीवन बिल्कुल दो जुदा बातें होती हैं, आपके-हमारे लिए भी, और खुद करीना-सैफ जैसों के लिए भी।
‘शुक्रवार’ मैग्जीन के प्रधान संपादक विष्णु नागर का ‘शुक्रवार’ मैग्जीन में प्रकाशित संपादकीय.


