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आज चार बड़ी खबरें हाथ लगी हैं, वो मैंने आगे भेज दी

सिरसा आज काफी आगे बढ़ चुका है। खास तौर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में। आज सिरसा में करीबन लोकल समाचारों पत्रों की होड़ ऐसी लग गई है, मानो अखबारी क्रांति आ गई हो। अखबारों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। बढ़े भी क्यों न बैठे बिठाए जो खबरें मिल जाती है। आज के पत्रकार को खासतौर पर सिरसा के पत्रकार को तो मेहनत करने की जरूरत नहीं। घर बैठे ही प्रेस नोट मिल जाते है। और रही बात अखबार चलाने की तो किसी तरह राजनेता से पैसे वसूल ही लेते हैं। इतना कम बड़ा क्षेत्र देखते हुए सिरसा में चार या पांच या फिर दस बारह तो अखबार चल सकते हैं, लेकिन इनकी संख्या तीस से चालीस पहुंच जाए तो कहेंगे सिरसा में विकास हुआ है अखबारों का। विज्ञापनों का। और आलसी पत्रकारों का।

सिरसा आज काफी आगे बढ़ चुका है। खास तौर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में। आज सिरसा में करीबन लोकल समाचारों पत्रों की होड़ ऐसी लग गई है, मानो अखबारी क्रांति आ गई हो। अखबारों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। बढ़े भी क्यों न बैठे बिठाए जो खबरें मिल जाती है। आज के पत्रकार को खासतौर पर सिरसा के पत्रकार को तो मेहनत करने की जरूरत नहीं। घर बैठे ही प्रेस नोट मिल जाते है। और रही बात अखबार चलाने की तो किसी तरह राजनेता से पैसे वसूल ही लेते हैं। इतना कम बड़ा क्षेत्र देखते हुए सिरसा में चार या पांच या फिर दस बारह तो अखबार चल सकते हैं, लेकिन इनकी संख्या तीस से चालीस पहुंच जाए तो कहेंगे सिरसा में विकास हुआ है अखबारों का। विज्ञापनों का। और आलसी पत्रकारों का।

यूं तो मुझे सिरसा के लगभग सभी पत्रकार बंधु जानते हैं। लेकिन एक बार मैं मेरे दोस्त पत्रकार के आफिस में चला गया। मेरा दोस्त पत्रकारिता करने में काफी रूचि रखता है इसलिए फील्ड वर्क काफी अच्छी तरह से करता है और किसी भी खबर के तह तक जाने की कोशिश भी करता है। जैसे ही मैं आफिस में पहुंचा तो वहां आफिस में दो और पत्रकार बैठे थे, जो उसी आफिस में काम करते थे। मैंने वहां देखा कि वे खबरें फोन पर ले रहे थे। कभी पीआर से तो कभी किसी पुलिस थाने से। कभी किसी कार्यक्रम से। मेरे दोस्त से कहने लगे ले आया घूम कर क्राइम की बड़ी खबरें। मुझे अच्छा नहीं लगा लेकिन मैं यूं किसी के आफिस में बोल भी नहीं सकता था। चुप रहना ही मुनासिफ समझा। खैर इस काम में कुछ तो मेहनत का काम था पर उसी के साथी पत्रकार को देखिए वह भाई साहब तो ई-मेल को आगे फार्रवड कर रहे थे और बोल रहे थे कि आज मेरे पास चार बड़ी खबर हाथ लगी है, वो मैंने आगे भेज दी है। यानी कि खबर किसी पार्टी की है। लग गई तो माला माल। भाई पार्टी से विज्ञापन के रुपऐ जो लेने है। आज पत्रकार के आलसी रूप से किसी अखबार के संपादक को कोई नुकसान नहीं हो रहा है। क्योंकि संपादक को चाहिए खूब सारी एड और खूब राजनैतिक पार्टी का सहयोग और खूब सारे ऐसे पत्रकार जो राजनेता से पैसे ऐंठ सकें। मुझे तो शर्म आने लगी है ऐसी पत्रकारिता करने वालों से। राजनेता तो राजनेता ये समाज के मसीहा कहे जाने वाले पत्रकार भी राजनेता से दो कदम आगे हैं, तभी तो आजकल पत्रकारों की तूती बोलती है।

प्रमोद रिसालिया

टीवी पत्रकार

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