उत्तराखंड के देहरादून से लगा है जौनसार-बावर आदिवासी क्षेत्र. पिछले दिनों यहाँ एक हृदय विदारक घटना घटी. कच्ची सड़क पर एक जीप दुर्घटनाग्रस्त हुई. अधिकतम 10 लोगों की क्षमता वाली इस जीप में 32 लोग सवार थे. दुर्घटना में दर्जनभर लोग मारे गए. मृतकों में एक आई ऍफ़ एस अधिकारी उनकी पत्नी व बच्चे भी शामिल थे. यह परिवार स्थानीय त्योहार मरोज के लिए अपने गाँव गया था और वापस अपनी नौकरी पर जा रहे थे. खैर, ऐसी घटनाएं पहाड़ों में आम होती है पर…. इसी क्षेत्र के रहने वाले तथा केंद्र सरकार में एक बड़े पद पर तैनात भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ट अधिकारी रमेश चन्द्र जोशी इन घटनाओं को भ्रष्टाचार से जोड़कर देखते हैं. उनका तर्क है कि यदि यहाँ प्रशासन नाम की कोई भी चीज होती तो ऐसी दुर्घटनाएं रुक सकती थी. यहाँ की सडकों पर कागजों में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं पर इंजीनियर-ठेकेदार और नेताओं का गठजोड़ इन्हें हजम कर जाता है, कभी कोई जांच की बात होती है तो इस भ्रष्टाचार को यहाँ आने वाली प्राकृतिक आपदा के सर मढ़ दिया जाता है. कभी-कभी तो बाढ़ व भूस्खलन के बाद कागजों में ही काम दिखाकर निर्माण कार्य को आपदा से नष्ट होना दिखाकर लाखों रुपये चट कर लिए जाते हैं.
इस आदिवासी क्षेत्र में इस समय तीन प्रकार के जौनसार- बावर अस्तित्व में हैं, पहला जो अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का लाभ लेकर बड़ी-बड़ी सरकारी नौकरियों में हैं और वे महानगरों व शहरों में बस गए हैं. दूसरा यहाँ तैनात कर्मचारी, नेताओं व ठेकेदारों का गठजोड़ है, यही वर्ग यहाँ के विकास जर्जर हालत के लिए जिम्मेदार है. तीसरा, यहाँ रहने वाले लोग हैं जो यहाँ की कठिन परिस्थितियों में किसी प्रकार से दो जून की रोटी जुटाने में लगे हैं. राजनीतिक रूप से जौनसार- बावर दो खेमो में बंटा है. मुन्ना सिंह चौहान तथा प्रीतम सिंह खेमा. यहाँ आजादी के बाद से प्रीतम सिंह के पिता स्व. गुलाब सिंह पांच दशकों से सियासत पर काबिज रहे. वे उत्तर प्रदेश में मंत्री तथा एक बार निर्विरोध विधायक भी चुने गए. कुल मिलाकर जौनसार-बावर में इनकी सियासत को किसी ने ठीक से चुनौती नहीं दी. तब गुलाब सिंह विरोधियों ने मुन्ना सिंह चौहान को आगे किया, मुन्ना ने इन्हे कड़ी टक्कर दी और मुन्ना ने भी अपने पक्ष में कर्मचारियों व ठेकेदारों की एक मजबूत लाबी खड़ी कर ली.
राजनीतिक विकल्प देने के बाद क्षेत्र के कर्मचारी तो अपने काम में रम गए पर जौनसार- बावर की पूरी कमान यहाँ के ठेकेदारों के हाथ में आ गयी. यहाँ की राजनीतिक कमान इन दोनों परिवारों के बीच बदलती रही. इसमे जनता का भला तो नहीं हुआ पर ठेकेदारों की कमाई बढ़ती रही. आज अनुसूचित जनजाति क्षेत्र का भारी भरकम सरकारी बजट होने के बाद भी यह क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. यहाँ की एक मात्र कालसी-त्यूनी सड़क आज से 60 साल पहले जैसे हाल में है. स्कूलों में टीचर तथा अस्पतालों में डाक्टर नहीं है. कई गांव में पेयजल की किल्लत है. नहरें ऐसी जगह बनी है जहाँ न खेत हैं न ही पानी. कई योजनायें कागजों में ही बन गयी है. जौनसार-बावर का बुद्धिजीवी यहाँ के नेता व ठेकेदार गठजोड़ से कितना परेशान है कि दिल्ली में क्षेत्र के प्रवासी नौकरशाहों के संगठन गंभीरता से इस बात पर विचार कर रहे हैं कि वे उन नेता, अधिकारी व ठेकेदारों के खिलाफ हनोल के महासू देवता पर घात डालेंगे ताकि वे उन लोगों को सबक सिखा सके जिनके भ्रष्ट कार्यों के कारण इस पिछड़े क्षेत्र का विकास नहीं हो पा रहा है. यहाँ के बुद्धिजीवियों में यह भी सुगबुगाहट चल रही है कि मुन्ना सिंह व प्रीतम सिंह को टक्कर देने के लिए कोई तीसरा राजनीतिक विकल्प खड़ा किया जाए जो यहाँ के विकास के लिए समर्पित रह सके.
क्या है घात………जौनसार-बावर क्षेत्र के लोगों में यह मान्यता है कि यदि कोई दुखी होकर महासू के मंदिर में न्याय की गुहार लगाता है तो वह न्याय अवश्य करता है. इसलिए अब यहाँ के बुद्धिजीवी क्षेत्र को लूटने वालों के खिलाफ देवता से न्याय की गुहार लायेंगे. इसमे क्षेत्र के ऐसे वरिष्ठ नौकरशाह भी शामिल हैं जो दिल्ली के मंत्रालयों में देश के विकास की रणनीति बनाते हैं पर अपने इलाके के पिछड़ेपन से बेहद दुखी रहते हैं. और वे इसकी गुहार अपने इष्ट देव से करने का मन बना रहे हैं!
विजेंद्र रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


