मुंबई : महाराष्ट्र राज्य एकादमी और के.सी. कॉलेज हिन्दी विभाग मुंबई, के संयुक्त तत्वधान में साहित्य, समाज और मीडिया विषय पर 17 और 18 फरवरी को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. केसी कॉलेज में सम्पन्न हुए इस दो दिवसीय आयोजन में साहित्य, समाज और मीडिया से जुडे ज्वलंत प्रश्नों पर सार्थक, सकारात्मकता और गंभीर चर्चा हुई. संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में साहित्यकार बलराम ने साहित्य को समाज का अभिन्न हिस्सा बताते हुए पिछले दो दशकों में मीडिया के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा कि सर्वभक्षीय आकाशीय राक्षस ने हमारे समाज, संस्कृति और भाषा को निगल लिया है. लोकायत के संपादक और लेखक बलराम ने इस संकट के बीच साहित्य की चिरंतन अविकल धारा पर पूरा भरोसा रखते हुए कहा कि साहित्य की यह धारा इस सर्वभक्षीय आकाशीय राक्षस का मुकाबला करने के लिए सक्षम है. उन्होंने भारतीय प्रिंट मीडिया में भाषाई बदलाव पर भी चिंता व्यक्त की.
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और नवभारत टाइम्स के संपादक सुंदरचंद ठाकुर ने कहा कि साहित्य किसी भी समाज का प्राण होता है. साहित्य को दरकिनार करने की कोशिशों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अगर किसी संपादक के रूझान साहित्यक होते हैं तो अखबार का तंत्र उसका विरोध नहीं करता. उन्होंने जनसत्ता के साहित्यक रूझानों की भी चर्चा की और कहा कि मुंबई में उनका प्रयास हमेशा साहित्यक प्रश्नों से जुडने का रहेगा. इस अवसर पर उद्धाटन सत्र की अध्यक्षा और के.सी. कॉलेज की प्राचार्या मंजु निचानी ने मीडिया के प्रभाव से होने वाली सामाजिक उथल-पुथल पर चर्चा व्यक्त करते हुए कहा कि आज के दौर में मीडिया को देखते और सुनते हुए भय सा लगता है.
मुख्य अतिथि राजपाल हौंडा ने कहा कि मीडिया जिस तरीके से फैल रहा है वह जीवन के कई प्रश्नों को संबोधित कर रहा है. सत्र के शुभारंभ पर महाराष्ट्र राज्य साहित्य एकादमी के कार्याध्यक्ष दामोदर खडसे ने कहा कि साहित्य और समाज की घटनाएं सिर्फ नकारात्मक रूप से मीडिया को प्रभावित नहीं कर रही है, बल्कि उससे कुछ छन छनकर सकारात्मक बातें भी हम में आ रही है. इस अवसर पर महाराष्ट्र राज्य साहित्य एकादमी के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी ने समाज के सभ्यतागत बदलाव में मीडिया के कार्पोरेट का हिस्सा बन जाने पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने मौजूदा दौर में मीडिया के भीतर मूल्यो के गिरते स्तर के बीच साहित्य को संकट मोचक मानते हुए कहा कि साहित्य हमारे बीच एक दूरदृष्टा की भूमिका निभा रहा है. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब हमारे लिए वर्तमान को समझ पाना जटिल और दुष्कर हो रहा है वहां साहित्य हमें आगत को समझने में बेहतर मार्गदर्शन कर सकता है.
दो दिवसीय संगोष्ठी में साहित्य समाज और मीडिया के अंतर्गत प्रथम सत्र में मीडिया के सामाजिक सरोकार विषय पर सत्राध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने मीडिया के सामाजिक सरोकारों के लुप्त होने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि भारत की आजादी की लडाई के दौरान पत्रकारिता की जो नींव पडी थी और जो सरोकार पैदा हुए थे वे पूंजीवादी समाज के बनने के कारण बदल रहे हैं. गरीबी, कुपोषण, स्त्री औश्र दलित के सवाल हाशिये पर चले गए हैं, और समाचारों में नकली आवेश पैदा करने की कोशिश की जाती है.
इस सत्र में विषय विशेषज्ञ के रूप में सामाजिक सरोकारों के बारे में चर्चा करते हुए प्रो. देवेन्द्र चौबे ने कहा कि भारतीय मीडिया विशेषकर चैनल हिंसा की घटनाओं को प्रमुखता देते हैं, लेकिन जो नागरिक तथाकथित विकास में विस्थापित हो जाते हैं वे एक दूसरी तरह की हिंसा का शिकार होते हैं, और उनकी कोई चिंता नहीं करता. उन्होंने कहा कि वर्तमान की अवधारणा में हिंसा निहित है वह खून से रंगी हुई नहीं है, लेकिन तिल-तिलकर गरीबों को मार रही है.
मीडिया की विश्वसनीयता पर चिंता करते हुए झारखंड के पत्रकार निराला तिवारी ने कहा कि मीडिया सिर्फ महानगरों के ही समाचार देता है, उसका आदिवासी परंपरागत बोलियों को बोलने वालों और उत्तर पूर्व में रहने वाले भारतीयों से कोई जुडाव नहीं है. उन्होंने कहा कि मीडिया की आम आदमी के संघर्ष की बात करने और उसे जन-जन तक पहुंचाने में कोई रूचि नहीं है. इस अवसर पर मीडिया और सांस्कृतिक हस्तक्षेप पर डॉ सतीश पांडे ने भी अपने विचार व्यक्त किए. जनतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की भूमिका पर डॉ नरेन्द्र मिश्र ने कुछ गंभीर सवाल उठाए.
प्रथम दिवस में संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में नए माध्यम और अभिव्यक्ति का प्रश्न विषय के अंतर्गत मीडिया के कार्पोरट चरित्र पर बोलते हुए नवभारत टाइम्स के पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी ने कहा कि इस समय बाजार ने मीडिया को कंपनी बना दिया है और समाचारों को प्रोडक्ट. उन्होंने कहा कि मीडिया आज मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाकर देश की जनता को गुमराह कर रहा और भ्रम की स्थति पैदा कर रहा है. रेडियो माध्यम विषय पर आनंद सिंह ने कहा कि बदलते समय के साथ-साथ और एफएम रेडियो के जरिये इस माध्यम में बाजारवादी घुसपैठ के बीच भी विविध भारती ने अपने मूल्यों को बचाए रखा है. इंटरनेट, संभावनाएं और चुनौतियां विषय पर बोलते हुए युवा पत्रकार सोनू उपाध्याय ने कहा कि इंटरनेट की दुनिया ने हमारी जिंदगी को एक आभासीय दुनिया में तब्दील कर दिया है जिसमें हमारा यथार्थ खोता जा रहा है. उन्होंने कहा ऐसे समय में जबकि जीवन में चारों ओर से सूचनाओं की बमबारी हो रही है ऐसे में मनुष्य की मौलिकता खत्म होती जा रही है. जो गहरी चिंता का विषय है.

इस विषय पर विषय विशेषज्ञ के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार सोपान जोशी ने कहा कि आज के दौर में इंटरनेट में सोशल नेटवर्किंग साइट पर एक पनघट की तरह हो गई है. यहां होने वाली बात ठीक वैसी ही है जैसे पहले गांवों मे पनघट पर हुआ करती थी. उन्होंने कहा कि आज के दौर में इंटरनेट हमारे सामाजिक विवेक पर प्रतिघात कर रहा है और उसने जमीनी विरोध के जज्बे और उर्जा को भी काफी नुकसान पहुंचाया है. सत्राध्यक्ष और कवि व साहित्यकार डॉ सुधारकर मिश्र ने कहा कि आज मीडिया ने भाषाई संस्कारों को पूरी तरह से विकृत कर दिया है. उन्होंने कहा कि बाजार ने हमारे भीतर की रचनात्मकता को भी नकली और सतही बनाकर रख छोडा है ऐसे में साहित्य एक रास्ता है जहां हम अपने मूल्यों को बनाए एवं बचाए रख सकते हैं.
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में मीडिया से गायब होता समाज, मीडिया विषय पर वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली मीडिया और क्षेत्रीयता का आग्रह विषय पर डॉ संजीव दुबे ने अपने विचार व्यक्त किए. द्वितीय सत्र में विकास, विस्थापन और मीडिया पर दिल्ली से आए सामाजिक कार्यकर्ता सोपान जोशी ने कहा कि विकास शब्द अपने आप में ही गलत है क्यों कि इसके भीतर हिंसा निहित है. उन्होंने कहा कि आज के दौर में मीडिया ने विस्थापन की पीडा समझता है और न ही उसके भीतर रच बस रही संस्कृति को समझता है. साहित्य, समाज और मीडिया का अंतरद्वंद विषय पर जेएनयू के प्रो. देवेन्द चौबे ने कहा कि आज मीडिया ने समाज और साहित्य दोनों को दरकिनार कर दिया है और जिस समाज को मीडिया ने अपने लिए बचाए रखा है वह उसके लिए बाजार मात्र है. मीडिया और हाशिये का समाज पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विवि से आए प्रो डॉ अमरेन्द्र सिंह ने मीडिया की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह उठाते हुए कहा कि मीडिया केवल मुख्यधारा में रचता बसता रहा है जबकि दलित, स्त्री और पिछडों के सवाल पर वह मौन रहा है और उन्हें हमेशा दरकिनार करता रहा है. इस
दो दिवसीय समारोह के आखिरी सत्र में फिल्मी फैक्ट्री और सामाजिक यथार्थ विषय के अंतर्गत मीडिया और सीमांत के समाज पर अपने विचार रखते हुए तहलका के पत्रकार निराला कुमार तिवारी ने कहा कि आज के समय में जहां हम सारा दोषारोपण मीडिया और बाजार पर कर रहे हैं ऐसे में एक बार ईमानदारी से हमें अपने भीतर भी झांककर देखना चाहिए है कि हमने अपने समाज की परंपरा, मूल्यों और हाशिये के समाज के प्रति कितनी चिंता की है और उनकी रक्षा के लिए कितनी जिम्मेदारी से हाथ बढाया है. सार्थक सिनेमा बनाम व्यावसायिक सिनेमा विषय पर बोलते हुए अमर उजाला के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सुमन्त मिश्र ने कहा कि फिल्में केवल अच्छी होती हैं या बुरी होती है. उन्होंने कहा कि हमारे समाज में फिल्मों को एक सरल मनोरंजन के रूप में लिया जाता है और फिल्म बनाने वाला एक काल्पनिकता के संसार को रचकर उसे देखने वाले के लिए हल्का मनोरंजन भर करता है इसलिए सिनेमा को सार्थकता और व्यावसायिकता में नहीं बांटा जा सकता. इस अवसर पर रेडियो फीवर के युवा रेडिया जॉकी तुहीनांशु ने एफएम रेडियो की जिम्मेदारी का सवाल उठाते हुए कहा कि आज के बाजारवादी दौर में भी एफएम रेडियो ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है. उन्होंने कहा कि एफएम रेडियो अपनी तरह से समाज की समस्याओं को दूर करने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है जाहिर है इसे नकारा नहीं जा सकता.
इस अवसर पर सत्राध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार मनमोहन सरल ने कहा कि बाजार ने आज हमारे मूल्यों को खरीद लिया है, हमारी नैतिकता भी हमारी रचनात्मकता के साथ प्रोडक्ट के साथ आ जुडी है. हमारी भाषा, और रचनात्मकता संस्कार को बाजार ने भ्रष्ट कर दिया है. दो दिवसीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर रिजर्व बैक ऑफ इंडिया को भारतीय रिजर्व बैंक का नाम देने वाले और भारतीय बैंकिंग प्रणाली में हिन्दी भाषा के प्रयोग को लेकर क्रांतिकारी प्रयोग करने वाले विद्वान और पूर्व गर्वनर डॉ पी जयरामन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे. डॉ जयरामन ने कहा कि हिन्दी के विकास, प्रचार और उन्नति के लिए अनवरत क्रियाशील और कार्यशील रहने पर जोर दिया. उन्होंने कहा हिन्दी हमारी राजभाषा ही नहीं मात्र भाषा है जो मां के समान है इसलिए हमें इसके सम्मान के लिए हमेशा कार्य करते रहना होगा.
कार्यक्रम में विशेष रूप से शामिल हुए साहित्यक पत्रिका नवनीत के संपादक विश्वनाथ सचदेव ने भी साहित्य समाज और मीडिया पर अपने विचार व्यक्त किए. समापन अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में महाराष्ट्र राज्य साहित्य एकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष ने इस तरह की संगोष्ठियों को साहित्य, समाज और मीडिया के लिए एक मंथन की तरह बताया. समापन सत्र में महाराष्ट्र राज्य साहित्य एकादमी के सदस्य अनुराग चतुर्वेदी ने राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आए, लेखक, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों और श्रोताओं व सम्मानिय अतिथियों आभार माना. कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली, नवभारत टाइम्स मुंबई के संपादक सुदंरचंद ठाकुर, लोकायत के संपादक और लेखक बलराम, बिहार से आए तहलका के पत्रकार निरालाकुमार तिवारी, प्रो. देवेन्द्र चौबे, प्रकाश जोशी, नवभारत टाइम्स के पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी, अमर उजाला के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार सुमन्त मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार सोपान जोशी, साहित्यकार और प्रो. अमरेन्द्र शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार मनमोहन सरल सहित राज्य के अलग-अलग हिस्सों से आए, लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया.


