सभी देशवासियों के लिये एक सुखद संवाद है कि भारत दुनिया के पांच शीर्ष खुशहाल देशों में से एक है। इन पांच देशों में इंडोनेशिया हमसे आगे जरूर है लेकिन अमरीका, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे विकसित देश हमसे पीछे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्था इप्सोस ग्लोबल द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया है। भारत और खुशहाली में अव्वल? क्या सचमुच देश के लोग काफी खुशहाल और संतुष्ट हैं? आज जबकि भारत में अंधकार और परेशानियों का साम्राज्य अपनी पूरी विकरालता के साथ जनजीवन में व्याप्त है। यहां दमन का दुश्चक्र और शोषण की चक्की-आदमी और आदमी के बीच कुछ भी साबुत नहीं छोड़ती। सबसे ज्यादा खंडित आदमी का विश्वास होता है। इस विश्वास के आहत होने का मतलब है मनुष्य की विडम्बनापूर्ण और यातनापूर्ण स्थिति। दुःख-दर्द भोगती और अभावों-चिन्ताओं में रीतती उसकी हताश-निराश जिन्दगी। आज किसी भी स्तर पर उसे कुछ नहीं मिल रहा। उसकी उत्कट आस्था और अदम्य विश्वास को सामाजिक तनावों, आर्थिक दबावों, राजनैतिक दोगलेपन और व्यावसायिक स्वार्थपरता ने लील लिया है।
लोकतन्त्र भीड़तन्त्र में बदल गया है। दिशाहीनता और मूल्यहीनता बढ़ रही है, प्रशासन चरमरा रहा है। भ्रष्टाचार के जबड़े खुले हैं, साम्प्रदायिकता की जीभ लपलपा रही है और दलाली करती हुई कुर्सियां भ्रष्ट व्यवस्था की आरतियां गा रही हैं। उजाले की एक किरण के लिए आदमी की आंख तरस रही है और हर तरफ से केवल आश्वासन बरस रहे हैं। सच्चाई, ईमानदारी, भरोसा और भाईचारा जैसे शब्द शब्दकोषों में जाकर दुबक गये हैं। व्यावहारिक जीवन में उनका कोई अस्तित्व नहीं रह गया है। फिर भला भारत दुनिया के शीर्ष पांच खुशहाल देशों में कैसे? इस सवाल का उत्तर ढूंढने के लिए कुछ ने अपने भीतर झांक कर देखा होगा, कुछ ने व्यापक परिस्थितियों को व्यापक दृष्टि से देखा हो। कुछ द्वंद्व में हो सकते है तो कुछ उत्तर के निकट पहुंच गये हो। मैं नहीं जानता आपके भीतर क्या चल रहा होगा लेकिन मैं यह जानता हूं कि भारतीयों में कुछ तो है कि वे कुछ भी अजूबा कर सकते है। आखिर हम किस तरह गरीबी, महंगाई, लागातार घोटालों और जीवन की विडम्बनाओं के बावजूद खुश और संतुष्ट रहते हैं?
क्षणभर के लिए तो मैं इप्सोस ग्लोबल के द्वारा कराये गये सर्वेक्षण के परिणाम से हतप्रभ था। फिर मेरे सामने भगवान राम, कृष्ण, महावीर, गांधी, गुरु वल्लभ, आचार्य तुलसी के आदर्श चेहरे थे, मेरे निराश चिन्तन में थोड़ी चमक दिखाई दी। लगा कहीं किसी कोने में आज भी कोई मूल्य स्थापित कर रहा है। आदर्शों को हमने दीवाल पर ही नहीं, अपने सीने में भी टांक रखे हैं। हमारे में भी ऐसी बात है, जिसे कोई ‘रिश्वत’ छू नहीं सकती, जिसको कोई ‘सिफारिश’ प्रभावित नहीं कर सकती और जिसकी कोई कीमत नहीं लगा सकता। यहां ईमानदारी अभिनय करके नहीं बताई जाती, उसे जीवंत देखा जा सकता है कथनी और करनी की समानता के स्तर तक और इसी से वास्तविक खुशहाली आती है।
जिस सर्वेक्षण ने हमें खुशहाली में सर्वोच्च घोषित किया है, जरूर उन्हें लगा होगा कि भारत में संस्कारों की पौध से ही सुन्दर फुलवारी बनी है। सीख को हमने साख का माध्यम बनाया है, तमाम विपरीत स्थितियों के हमने अपनी सोच और समझ को सकारात्मक बनाया है। हमने सीढ़ियों को जमीन के उस हिस्से पर रखकर ऊपर चढ़ना शुरू किया जो समतल, सुदृढ़ और मूल्याधारित थी, यही सावधानी हमारी खुशहाली का आधार बनी है और यही निर्माण का क्षण हमें शुभ शकुन देता है। डॉ. मार्टिन आलबुड ने भी कुछ ऐसा ही अनुभव किया और कहा कि ’मुझे भारत ने नहीं, भारतवासियों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है’। डॉ. आलबुड, जो अंग्रेजी, स्वीडी आदि अनेक भाषाओं के कवि, लेखक, भाषाविद्, समाजशास्त्री और भारतीय-दर्शन के प्रखर प्रवक्ता थे। भारतीय संस्कृति पर देश-विदेशों में उनके हजारों प्रवचन हो चुके थे। भारत में आयोजित अपने एक विशेष व्याख्यान में उन्होंने भाव-विभोर होकर कहा-जहां तक भौगोलिक और प्राकृतिक सौंदर्य का सवाल है, हमारे देश-स्वीडन में भी वह कम नहीं है। लेकिन सहनशक्ति, क्षमाशीलता, दयालुता और गहरी अंतर्दृष्टि-ये भारतीयों की अपनी एकदम निजी विशेषताएं हैं। ये ही वे चीजें हैं जो किसी भी संस्कृति और उस संस्कृति को जीने वाले लोगों को खुशहाल बनाती है। इसी खुशहाली ने विश्व-क्षितिज पर भारत को गौरवपूर्ण स्थान दिया है।
मैं गर्व से सीना तानकर कर कह सकता हूं कि भारत का मस्तक ऊंचा करने वाले लोगों की आज भी देश में कमी नहीं है। न केवल देश का बल्कि सम्पूर्ण मानवता का मस्तक ऊंचा करने की सामर्थ्य हममें हैं और आज दुनियाभर के लोग इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारतीय जीवन पद्धति ही पूरी दुनिया को बचा सकती है। यही एकमात्र संस्कृति है जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की प्रार्थना करती है और यहां के लोग ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को जीते हुए सम्पूर्ण दुनिया को एक परिवार मानते है।। हम केवल प्रार्थना ही नहीं करते उसे व्यावहारिक रूप से प्रकट भी करते हैं।
यहां के जन-जीवन में रामायण व्याप्त है जो श्रीराम की मर्यादाओं की कथा है। यहां के लोगों के हृदय में गीता का सन्देश गूंजता है जो कर्म का मार्ग दिखलाती है, यहां के सर्वधर्म सद्भाव की संस्कृति में श्री गुरुग्रंथ साहिब हैं, कुरान है, बाइबल है जो धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। भारतीयों को ऋषियों, मुनियों, गुरुओं और समाज सुधारकों ने यही संस्कार दिए हैं कि संतोष ही परम सुख है। बचपन में हमें पढ़ाया जाता था कि आदमी के लिए गाय, हाथी, घोड़ा तथा रत्न की खान-इन सब धन का बड़ा मूल्य होता है लेकिन जब आदमी को संतोषरूपी धन प्राप्त हो जाता है तो ये सारे धन धूलि-मिट्टी के समान हो जाते हैं। संतोष धन के आगे किसी भी धन का मूल्य नहीं है। एक व्यक्ति हजार की आकांक्षा लेकर कर्म क्षेत्र में उतरता है जैसे ही उसकी ये पूर्ति होती है उसमें दस हजार फिर लाख की इच्छा पैदा होती है। इस तरह वह लखपति फिर करोड़पति भी बन जाता है किन्तु उसकी लालसा चिर युवा बनी रहती है।
यह अनुभव एक व्यक्ति का नहीं, सबका है। जो धन-संचय की लालसा से मुक्त हो जाते हैं, उन्हें अपवाद मानना चाहिए। कबीर ने चेतावनी दी थी-‘नाव में पानी भर जाता है तो नाव डूब जाती है। घर में धन-संपत्ति बढ़ती है तो उसके संचय में विपत्ति भी आती है।’ प्रायः देखने में आता है कि धन के पीछे बाप-बेटे, भाई-भाई पराये बन जाते हैं और कहीं-कहीं तो व्याधि इतनी बढ़ जाती है कि वे एक-दूसरे की जान ले लेते हैं। यही देखकर कबीर ने घर में बढ़े धन को निकाल देने की सलाह दी थी। मानव की इसी दुर्बलता को देखकर भगवान महावीर ने ‘परिग्रह-परिमाण’ की बात कही थी। उन्होंने धन को हेय नहीं बताया था, अपनी नितान्त आवश्यकता की सीमा बंधवाई थी। यह सीमा संतोष की ही पर्याय थी। गांधीजी ने भी इसी बात को दूसरे शब्दों में स्पष्ट करते हुए कहा था कि अपनी अनिवार्य आवश्यकताएं पूरी करने के बाद जो बचे, उसका अपने को ‘न्यासी’ (ट्रस्टी) मानो और उसको उपयोग समाज के कल्याण के लिए करो। यही सब करते हुए ही हम तमाम विपरीत स्थितियों के बावजूद खुशी से जीना जानते हैं।
हमें बताया गया है कि सांसारिक वस्तुएं अस्थायी और क्षणिक हैं। बाहरी वस्तुओं में जितना सुख अनुभव किया जाए, वह उतना ही आत्मा को दुख देने वाला होता है। बाहरी सुखों में खुद को लीन कर लेना अज्ञानता है, अंधकारमय है। सांसारिक भोग-विलास का मार्ग आत्मा का हनन करने वाला है। केवल समृद्धि और संपन्नता ही मानव को संतुष्ट और खुश रख सकती है, यह सही नहीं है। खुशी का कोई एक कारण नहीं होता, हर व्यक्ति के संतुष्ट होने या खुश होने का अपना-अपना पैमाना है। भारतीयों में जो संस्कार बसे हुए हैं, वह उन्हें संतोष प्रदान करते हैं और लोग खुशहाली में रहते हैं। वास्तव में भारतीय लोग इतने परिश्रमी हैं कि पूरी दुनिया उनका लोहा मानती है। भारतीयों का यह गुण है कि कठिन से कठिन हालातों में भी वे घबराते नहीं बल्कि अपने हौसले से और पूरी क्षमता से स्थिति का सामना करते हैं।
व्यभिचार, चोरी, ठगी, झूठ, जालसाजी से बचने वाला ही सदैव खुशहाल रह सकता है। थोड़े से काम के लिए अपने आदर्श को ताक में रखने वाला अवसरवादी व्यक्ति उदास चेहरे को लेकर भटकता रहता है। अति सुख के पीछे भागने की इच्छा जब समाप्त हो जाती है, तो वह जीवन में स्थायी आनंद की स्थिति का कारण बनती है। इसीलिए कहा गया है कि ‘मस्ती इतनी सस्ती नहीं कि हर हस्ती को मिल जाए।’ अपनी सीमित आवश्यकता में मस्त रह सकने वाला ही असली मस्ती का हकदार हो सकता है। जो अपने को अच्छा न लगे वह व्यवहार दूसरों के प्रति नहीं करने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में धार्मिक व स्थायी सुख-शांति एवं खुशहाली का अधिकारी है। जीयो और जीने दो को मानने वाला सुखी हो सकता है। ध्यान रखो कि सच्चे मन से चाहने से सब चीजें हासिल हो सकती हैं, अधूरे मन से हम सब चीजें खोते हैं।
लोगों ने अपने लिए सुख-सुविधाएं जुटाने के लिए अपना-अपना मार्ग तलाश लिया है। वह सही हो या गलत? उसे क्या लेना-देना सरकार की घोषित आर्थिक विकास दर से, उसे क्या लेना-देना सरकारी आंकड़ों से। लोग अपनी मुश्किलों का हल ढूंढ लेते हैं। उनके पास जो कुछ है काफी है, यही भावना उन्हें संतुष्ट करती है और खुशहाल भी। इसमें अध्यात्म भी एक बड़ा सहारा है। वैसे तो आध्यात्मिक विकास का एक लाभ हमारे शरीर और मन को भी होता
है। यानी इससे शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो जाता है। पर इससे भी बड़ी बात यह है कि आध्यात्मिक विकास नई खुशियों और नई व सार्थक अनुभूतियों का द्वार मनुष्य के लिए खोलता है। जब हम दूसरों का दुख-दर्द दूर करते हैं तो इससे गहरा संतोष और प्रसन्नता मिलती है। इस तरह जो खुशी जीवन में आती है, वह भोग-विलास से होने वाले क्षणिक आनंद से बहुत अलग तरह की खुशी है और यही शाश्वत है, त्रैकालिक है और सार्वकालिक है। यही हमें लिये चलती है या हम इसी के सहारे चलते हैं।
ललित गर्ग दिल्ली के निवासी हैं तथा लेखन से जुड़े हुए हैं.


