यूपी विधानसभा का चुनाव क्या आ गया? महीनों से घिसे-पिटे मुद्दों को घसीटने वाली मीडिया को काम मिल गया। भागम-भाग, खबर, ब्रेकिंग के बीच हांफते पत्रकारों को पानी पीने की फुरसत ही नहीं मिली। धीरे-धीरे चुनाव ने पांचवां चरण भी पूरा कर लिया है। राजनीतिक पत्रकारिता हाशिए पर चली गई। अखबारों में विधानसभा चुनाव को लाइव दिखाया जा रहा है, तो टीवी एक कदम और आगे निकलते हुए चुनाव की ‘एक्सप्रेस’ दौड़ा रहा है। मीडिया का अभियान पूरे शबाब पर है। लेकिन कहीं से ऐसी कोई राजनीतिक खबर नहीं आ रही है। जिसको दावे से कहा जा सके यह ‘राजनीतिक पत्रकारिता’ है। पूरी पत्रकारिता ‘बाइट जर्नलिज्म’ की ही हो रही है। एक चैनल है, जो 100-200 लोगों का बटोर कर ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ तय कर रहा है। पूरे कार्यक्रम में यह बात समझ में ही नहीं आती कि कार्यक्रम को होस्ट करने वाले पत्रकार महोदय कहना क्या चाह रहे हैं?
पांचों चरणों के मतदान की लाइव रिपोर्टिंग सिर्फ सुबह के स्लॉट में 11 बजे तक ही दिखई पड़ रही है। भला हो चुनाव आयोग का कि ‘आशंकाओं पर आधारित परिणाम’ मीडिया नहीं बता रहा है। मीडिया में राजनीतिक विश्लेषकों की कमी नहीं है। लेकिन क्या करें चुनाव आयोग ने चरणों में चुनाव करा दिया है। अब पत्रकारिता कोई ‘च्यूंगम’, तो है नहीं कि जितना चाहे खींच लो। वह भी राजनीतिक पत्रकारिता। अखबारों में चुनाव की खबरें इस तरह की आ रही हैं कि लगता है कि ‘ढिबरी’ में तेल ही खत्म हो गया है। एक पत्रकार चुनावी दौरे पर निकले खाक छान मारी। बाजार, तहसील और जिला मुख्यालय का खूब चक्कर भी लगाया अंतत: दफ्तर गए और मिली हुई जानकारियों से लाइव रिपोर्टिंग कर डाली। उन्होंने जो लिखा वह पहले के चरणों में कई बार लिखा जा चुका था। अब चुनाव डेस्क का दबाव है कि चुनाव पेज के लिए कुछ खास लिखो। बेचारा क्या करे पत्रकार? कुछ तो लिखकर देना ही है।
लेखक अरुण पाण्डेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


