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अब पत्रकारों के लेखनी का नहीं लाइजनिंग का दौर है

इंदौर की पत्रकारिता में ये वो दौर है जब ज़माना लेखनी पर विश्‍वास नहीं कर रहा यहां तो लाइजनिंग का चलन चल पड़ा है। अखबार से लेकर टीवी चैनलों तक हर तरफ लाइजनर्स का ही बोलबाला है, आलम यह है कि अच्छे लेखक की जगह संस्थान बेहतर लाइजनर को तव्वजो दे रहे हैं। इसका उदाहरण हाल ही में हुए कई बड़े फेरबदल हैं जो न केवल इस बात की योग्यता को मद्देनजर रखते हुए किये गए हैं कि नया पत्रकार कितनी ताकत रखता है बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों को चैनल के पक्ष में करने के लिए बल्कि कौन-सा पत्रकार किस राजनीतिक दल से चैनल को खबरों के लिए फंड दिला सकता है। और भी कई ऐसे नमूने हैं जो इन दिनों इंदौर में खासे चर्चा में हैं।

इंदौर की पत्रकारिता में ये वो दौर है जब ज़माना लेखनी पर विश्‍वास नहीं कर रहा यहां तो लाइजनिंग का चलन चल पड़ा है। अखबार से लेकर टीवी चैनलों तक हर तरफ लाइजनर्स का ही बोलबाला है, आलम यह है कि अच्छे लेखक की जगह संस्थान बेहतर लाइजनर को तव्वजो दे रहे हैं। इसका उदाहरण हाल ही में हुए कई बड़े फेरबदल हैं जो न केवल इस बात की योग्यता को मद्देनजर रखते हुए किये गए हैं कि नया पत्रकार कितनी ताकत रखता है बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों को चैनल के पक्ष में करने के लिए बल्कि कौन-सा पत्रकार किस राजनीतिक दल से चैनल को खबरों के लिए फंड दिला सकता है। और भी कई ऐसे नमूने हैं जो इन दिनों इंदौर में खासे चर्चा में हैं।

इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में यदि ब्यूरो पर नजर डाली जाय तो रिपोर्टर की जगह अब मार्केटिंग वालों ने ले ली है शायद यही है कलयुग की पत्रकारिता, जिसकी झलक इंदौर यानी राजेंद्र माथुर जैसे आदर्श स्तंभ से जुड़े शहर में देखने को मिल रही है।  अपने दर्द के साथ

लेखम महेंद्र सिंह सोनगिरा इंदौर में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के पत्रकार हैं.

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