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क्‍या हम अपने दायित्‍वों से मुंह मोड़ रहे हैं?

भारतीय मान्यता के अनुसार हर भारतीय को सबसे पहले अपने समाज फिर अपने परिवार और उसके बाद अपने बारे में सोचना चाहिए, मगर आज-कल हमारे समाज में बिलकुल इसका उल्टा हो रहा है. हर कोई पहले अपने बारे में सोच रहा है. यही एक सबसे बड़ी वजह है जिसके वजह से हमारे समाज का पतन दिन प्रतिदिन होता जा रहा है. किसी को भी समाज के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है. आज अगर हमारे भारतीय सामाजिक परिवेश का पतन हो रहा है तो इसके जिम्मेदार वो नहीं है, जिन्हें समाज में गलत लोगों की संज्ञा दी जाती है बल्कि इसके जिम्मेदार वो सफ़ेदपोश लोग हैं जो अपन दायित्व को नहीं समझते है. अगर हमारा पड़ोसी गलत है तो क्या हुआ हम तो सही हैं, यही सोच कर हम अच्छे बने रहना चाहते हैं.

भारतीय मान्यता के अनुसार हर भारतीय को सबसे पहले अपने समाज फिर अपने परिवार और उसके बाद अपने बारे में सोचना चाहिए, मगर आज-कल हमारे समाज में बिलकुल इसका उल्टा हो रहा है. हर कोई पहले अपने बारे में सोच रहा है. यही एक सबसे बड़ी वजह है जिसके वजह से हमारे समाज का पतन दिन प्रतिदिन होता जा रहा है. किसी को भी समाज के बारे में सोचने की फुर्सत नहीं है. आज अगर हमारे भारतीय सामाजिक परिवेश का पतन हो रहा है तो इसके जिम्मेदार वो नहीं है, जिन्हें समाज में गलत लोगों की संज्ञा दी जाती है बल्कि इसके जिम्मेदार वो सफ़ेदपोश लोग हैं जो अपन दायित्व को नहीं समझते है. अगर हमारा पड़ोसी गलत है तो क्या हुआ हम तो सही हैं, यही सोच कर हम अच्छे बने रहना चाहते हैं.

हमारे आस पास लोग अगर गलत हैं तो इससे हमें क्या, पर यही वो वजह है जिसकी वजह से हमारा स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है. हम अपने साथ वालों को कभी रोकने का प्रयास नहीं करते कि वो गलत कर रहे हैं. हम तो बस ये सोच कर खुश हैं कि हम सही हैं, पर क्या हमारा ये सोचना सही है..? बिलकुल नहीं! जब तक हम ये नहीं सोचेंगे कि हमारा भी दायित्व समाज के प्रति कुछ है, तब तक सुधार संभव नहीं है. अगर हमारे आस-पास लोग गलत है तो हमें क्या, हमें क्या फर्क पड़ता है …! बचपन में मैंने एक कहानी पढ़ी थी -“एक समुद्र के किनारे रेत पर सैकड़ों मछलियां पड़ी तड़प रही थी. दरअसल ये मछलियां समुद्र की लहरों के साथ किनारे पर आतीं फिर लहर वापस चली जाती और ये मछलियां रेत पर ही रह जातीं और कुछ देर तड़पने के बाद मर जाती थी. यहाँ समुद्र के किनारे सैकड़ों लोग थे पर कोई उनकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा था.. वहीं एक आदमी बारी-बारी से मछलियों को उठाकर पानी में फेंक रहा था और एक व्यक्ति बड़ी देर से उसे ऐसा करते हुए देख रहा था. आखिर में उसे रहा नहीं गया और उसने करीब जाकर उससे पूछा कि भाई ये क्या कर रहे हो, यहाँ तो सैकड़ों मछलियां पड़ी हुई हैं तुम कब तक ऐसा करोगे..? इससे क्या फर्क पड़ेगा ..? इसपर उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि सबका तो नहीं पता पर मैंने जितनों को यहाँ से पानी में डाला है, कम से कम उनपे तो फर्क पड़ेगा.”

कुछ ऐसी ही सोच हमें भी रखनी चाहिए तब कही जाकर शायद हम अपने समाज में कुछ परिवर्तन ला सकेंगे. आज कुछ ऐसा ही हाल हमारे पत्रकारिता जगत का भी है. हमें ये तो पता है कि फलां पत्रकार गलत कर रहा है, उसने यहाँ गलत किया, वहां गलत किया पर हम कभी उसे इस बात के लिए नहीं टोकते कि भाई आखिर तुम ऐसा क्यों करते हो. क्या तुम आने वाली पीढियों के लिए यही आदर्श प्रस्तुत करना चाहते हो. शायद आपके समझाने से उसका जमीर जाग उठे. शायद आपकी वजह से कोई एक बदल जाये. अपना प्रयास जारी रखें….! अभी हाल में ही हमारे एक भाई ने हमसे कहा कि तुम्हारी सोच बड़ी टुच्ची है और तुम बहुत ही महत्वाकांक्षी हो तो मैं इसे क्या मानू अपनी आलोचना या शाबाशी की एक तरफ वो मेरी सोच को घटिया बता रहे हैं और दूसरी तरफ महत्वाकांक्षी. फिलहाल मैं इसे उनके द्वारा अपना उत्साहवर्द्धन ही मानता हूँ कि कम से कम कोई तो है, जो मेरी आलोचना करता है. अगर महत्वाकांक्षी होना टुच्चा होना है तो मैं हूँ. पर मेरी सोच ये है कि मैं कुछ न कुछ तो ऐसा जरुर करूं, जिससे आने वाले समय में लोग मेरा अतीत भूल कर मेरे वर्तमान से प्रेरित हों.

लेखक मनीष पाण्‍डेय पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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