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अब नसीमुद्दीन का सूर्य अस्‍त होने जा रहा है!

चाहे वह मायावती के सतीशचंद्र मिश्र जैसे महान कानूनची हों, या फिर महाब्राह्मण सम्मेलन में शंखनादों का पंचवर्षीय एकदिनी उल्लास पार्टी हो, लेकिन छोटी-बड़ी बैठकों में भी किसी भी दरी-चादर पर सहमें बैठे लोगों को हर समय यही डर लगा रहता है कि पता नहीं किस किसकी नौकरी चौपट हो जाए। मौहाल यह, जैसे कि वक्ता एक लेकिन श्रोता सब के सब। हां, प्रसाद-चरणोदक किसी को किसी को भी नहीं। केवल सिवाय नसीमुद्दीन सिद्दीकी के। अपने लोटाछाप पत्रकार में वेदों के ज्ञान का छौंका वे अपने बैठकों में खूब लगता हैं। उन्हें बसपा में वेदों का एकमेव काकषुंभडिक माना जाता है, साथ ही वे खुद ही खूब बड़ाई दिलाने में सर्वत्र ख्याति प्राप्‍त हैं। लेकिन अब आखिर इसमें कोई शक नहीं कि उनके सारे अब भांडे बिखर गये हैं। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से साफ तौर से कह दिया गया है कि उनके अरबों की काली कमाई की लिस्ट बना कर कार्रवाई की जाए। इतना भी यही नहीं कि इसके लिए सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को इसके लिए केवल मोहलत एक महीना भर का ही लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा ने दिया है।

चाहे वह मायावती के सतीशचंद्र मिश्र जैसे महान कानूनची हों, या फिर महाब्राह्मण सम्मेलन में शंखनादों का पंचवर्षीय एकदिनी उल्लास पार्टी हो, लेकिन छोटी-बड़ी बैठकों में भी किसी भी दरी-चादर पर सहमें बैठे लोगों को हर समय यही डर लगा रहता है कि पता नहीं किस किसकी नौकरी चौपट हो जाए। मौहाल यह, जैसे कि वक्ता एक लेकिन श्रोता सब के सब। हां, प्रसाद-चरणोदक किसी को किसी को भी नहीं। केवल सिवाय नसीमुद्दीन सिद्दीकी के। अपने लोटाछाप पत्रकार में वेदों के ज्ञान का छौंका वे अपने बैठकों में खूब लगता हैं। उन्हें बसपा में वेदों का एकमेव काकषुंभडिक माना जाता है, साथ ही वे खुद ही खूब बड़ाई दिलाने में सर्वत्र ख्याति प्राप्‍त हैं। लेकिन अब आखिर इसमें कोई शक नहीं कि उनके सारे अब भांडे बिखर गये हैं। सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से साफ तौर से कह दिया गया है कि उनके अरबों की काली कमाई की लिस्ट बना कर कार्रवाई की जाए। इतना भी यही नहीं कि इसके लिए सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को इसके लिए केवल मोहलत एक महीना भर का ही लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा ने दिया है।

कहने जरूरत की नहीं कि अब लोकायुक्त के इस फैसले के चलते अब पूरा का पूरा कुनबा ही गहरे संकट में है। मेहरोत्रा के मुताबिक इस फैसले की मियाद में कार्रवाई नहीं की गयी तो मामला सीधे राज्यपाल को ही भेज दे दिया जाएगा। लेकिन बदलते राजनीतिक हालातों में तो पलड़ा पर लोकायुक्त ही भारी पड़ रहे हैं। दरअसल, आठ भाई-बहन वाले संकट के इस परिवार के छठे भाई, छह फुटे नसीमुद्दीन ने घर सम्भाला। शौक था बास्केटबॉल का। सन था 1977। बेरोजगार नसीमुद्दीन ने होमगार्ड विभाग में अवैनिक जवान भर्ती हो गया। नरैनी-बांदा के बीच अपने  लम्बे लट्ठ की रंगबाजी में कमाई में करने लगे। बताते हैं कि एक दिन उन्हें कांशीराम से किसी बात पर हुई झड़प से बचाया और कमाई में इजाफा होने लगा। कुछ कमाई हुई तो नगरपालिका में ठेकेदारी भी करने लगे। मायावती की किचन में शामिल भी हो गये। सपने बडे़ हुए तो सीधे अब्दुल हफीज से चुनाव में भिड़ गये, लेकिन करारी हार मिली।

इतना ही नहीं, अब्दुल ने नगर पालिका घोटालों का भी पोल खोल अभियान छेड़ा तो पुलिस में मुकदमे हुए। भाग कर नसीम सीधे लखनउ गये। और जैसे बिल्ली की तरह की छींका टूटा, गेस्ट हाउस कांड हो गया। बढ़-चढ़ कर नसीमुद्दीन ने माया को बचाने की ऐसी नौटंकी की कि मायावती के वे ब्लू-आई यानी नसीमुद्दीन सिद्दीकी बल्लौरी आंखों वालों की तरह दूसरों पर भारी पड़ गये। मायावती की सरकार क्या बनी, सरकार में तो सह-दूल्हा जैसी हैसियत मिल गयी। बताते हैं कि अपनी रणनीति के चलते पहले नसीमुद्दीन ने क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने खेमे में शामिल कर उनपर करम-करना शुरू कर दिया। यह लोग ही अपने के चाकर रहे, लेकिन जब उनका कद बढ़ा तो ऐसे हर शख्स को इन लोगों के दो-दो इंचों तक तराश करा दिया। ऐसे लोगों की लिस्ट बहुत लम्बा है। चाहे वो उमाकांत यादव, रमाकांत हों या फिर बाबूसिंह कुशवाहा रहे हों। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने हर एक से गिन-गिन कर बदला लिया। कहीं लोगों को केवल ब्राह्मण के नाम पर तो किसी पर किसी पर यादव के नाम पर केवल प्रताडित करने लगा। ब्राह्मण संरक्षण के नाम के नारे के खिलाफ केवल ऐसा गुट तराश दिया गया।

सांसद धनंजय सिंह जैसे ठाकुर बसपाई नेताओं की तो छीछा-लेदर ही करा ही कर दिया गया। बदहाली तो प्रत्येक की हो गयी जो जरा भी जुबान रखता रहा हो। एक वक्त तो यहां तक आ गया कि मायावती की सरकारों में उनके बाद केवल नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास ही मंत्रालय की भरमार थी। 90 फीसदी पैदल मंत्री केवल अपने कमरों पर अपनी भड़ास निकाले रहते थे। कई मंत्रियों की फर्मों को उपरी इशारे पर तबाह कर दिया गया। लेकिन बाद में बसपा की सरकारें की ताकत बढती जा रही थी, तो सिद्दीकी और उनके परिवार की हैसियतें अट्टलाटियों की बढ़ती जा रही थीं। एक वक्त में तो यहां तक चर्चा चली कि बांदा से हमीरपुर-चित्रकूट से लेकर लखनउ, नोएडा से लेकर बाराबंकी तक में नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनके घर के लोगों की ही खूब कब्‍जाई हुई जमीनें हैं। क्या बडी फैक्ट्रियों हों या फिर रिहायशी जमीन!! कई जिलाधिकारियों ने लोकायुक्त की पूछताछ में बताया कि कई जगहों पर सरकारी जमीनें तक कब्जाये गये हैं।

लेकिन विरोध की आंधी तो चलती ही है। बांदा में एक रिटायर्ड टीचर के बेटे और एमएसडब्ल्यू की डिग्री देखकर समाजसेवा में जुटे आशीष सागर श्रीवास्तव ने इन धांधलियों पर आवाज उठायी। नसीमुद्दीन सिद्दीकी खानदान की इस लूटमारी के खिलाफ भीड़ जुट गयी। सूचना अधिकार के साधन से दर्जनों अर्जियां आशीष ने लगायीं और आखिरकार पहुंच गये लोकायुक्त के दफ्तर में गुहार लगाने। बहरहाल, लोकायुक्त के निर्देश पर सीबीआई से नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बसपाई वेदों के ज्ञान अब धूल मिल चुके हो गये हैं। लोगों का तो यहां तक कहना है कि सिद्दीकी का राजनीतिक सूरज अब अस्‍त होने जा रहा है। और वैदिक पारंपारिक तरीके से देखा जाए तो कहा यह जाएगा कि सूर्य हो रहा है अस्‍त, अतः अस्ताचल इस डूबते को चुल्लू भर पानी दिखा कर नमस्कार करें। धर्मशास्त्र ही तो ऐसी परम्परा पर सम्मान करता है। चाहे हो भले ही महाभारत या वेद हो, तो हे अस्तचाल सूर्य, आपको प्रणाम है।

लेखक कुमार सौवीर सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. वे कई अखबारों तथा चैनलों में वरिष्‍ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों स्‍वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

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