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संवेदनाएं सूख रही हैं और बाजार पनप रहा है : नंद चतुर्वेदी

: समकालीन कविता पर परिसंवाद आयोजित : मुंबई : आज संवेदनाएं सूख रही हैं और बाजार पनप रहा है, मनुष्‍य के लिए उपस्‍थित इस संकट काल में कविता जन आंदोलनों से प्रभावित होकर लोकतंत्रात्‍मकता की ओर झुकी है. इसमें लोक हित के लिए चल रहे विमर्श इसी के परिणाम हैं. उक्‍त विचार वरिष्‍ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने व्‍यक्‍त किए. वे महाराष्‍ट्र राज्‍य हिंदी एकादमी के सहयोग से क. जे. सौमया कला व वाणिज्‍य महाविद्यालय के हिन्‍दी विभाग की ओर से आयोजित समकालीन कविता विविध विमर्श विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्‍ट्रीय परिसंवाद में बोल रहे थे.

: समकालीन कविता पर परिसंवाद आयोजित : मुंबई : आज संवेदनाएं सूख रही हैं और बाजार पनप रहा है, मनुष्‍य के लिए उपस्‍थित इस संकट काल में कविता जन आंदोलनों से प्रभावित होकर लोकतंत्रात्‍मकता की ओर झुकी है. इसमें लोक हित के लिए चल रहे विमर्श इसी के परिणाम हैं. उक्‍त विचार वरिष्‍ठ कवि नंद चतुर्वेदी ने व्‍यक्‍त किए. वे महाराष्‍ट्र राज्‍य हिंदी एकादमी के सहयोग से क. जे. सौमया कला व वाणिज्‍य महाविद्यालय के हिन्‍दी विभाग की ओर से आयोजित समकालीन कविता विविध विमर्श विषय पर आयोजित द्विदिवसीय राष्‍ट्रीय परिसंवाद में बोल रहे थे.

इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि कुमार अंबुज ने कहा कि विकृत पूंजीवाद के कारण सब तरफ फैले समर्पण, समझौते और पस्‍ती के समय में कविता एक तरफ हमारे समय की क्रूरताओं, स्‍खलनों और चालाकियों को अचूक तौर पर पहचान कर इंगित कर रही है, तो दूसरी ओर तमाम निराशाजनक स्‍थितियों को बताते हुए भी वह पस्‍त नहीं हुई है. उन्‍होंने कहा कि कविता परोक्ष रूप से उन सवालों को खड़ा करती है जो मानव जीवन को सुंदर बनाने के लिए जरूरी है. अपने समय से टकराना और एतिहासिक समझ के साथ हस्‍तक्षेप करना कविता का मूल चरित्र है.

बीज वक्‍तव्‍य देते हुए रीवा विश्‍वविद्यालय के डॉ. दिनेश कुशवाहा ने कहा कि हमें जो क्षतिग्रस्‍त कर रहा है, उसका पुनर्निर्माण ही समकालीन कविता है. विषम परिस्‍थितियों में सामाजिक समरसता बचाए रखने का दायित्‍व ही कविता मानते हुए उन्‍होंने कहा कि समकालीन विमर्श इसे बखूबी निभा रहे हैं. पांच सत्रों में विभाजित इस परिसंवाद में शहर के प्रमुख कवि, समीक्षक तकरीबन 40 महाविद्यालयों के प्राध्‍यापकों ने भाग लिया. इसमें डॉ. विजय कुमार बोधिसत्‍व, ह्दयेश मयंक, आलोक भट्टाचार्य, डॉ रामजी तिवारी, डॉ. देवेश ठाकुर, डॉ.जसवंत पंड्या (अहमदाबाद), डॉ. ओमप्रकाश त्रिपाठी (गोवा), डॉ कृष्‍णाशंकर उपाध्‍याय, डॉ. शीतला प्रसाद दुबे, डॉ. संजीव दुबे आदि ने अपने विचार रखे.

इन संत्रों में समकालीन कविता की अवधारणा और सरोकारों के अतिरिक्‍त, वैश्‍वीकरण, बाजारवाद, उत्‍तर आधुनिकता, स्‍त्री विमर्श,दलित एवं आदिवासी विमर्श, सांप्रदायिकता, पर्यावरण, महानगर एवं ग्रामीण जीवन बोध आदि संदर्भों में चर्चा की गई. कार्यक्रम में अतिथियों का स्‍वागत प्राचार्य डॉ. सुधा व्‍यास ने किया और आभार संयोजक डॉ. सतीश पांडेय ने माना.

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