कहते हैं इंदौर की धरती से पत्रकारिता का बीज अंकुरित होता है और देश के नक्शे पर वटवृक्ष का रूप लेने की क्षमता रखता है, लेकिन इसे विडंबना ही माना जाएगा कि पुराने हो चुके बरगद व नीम के पेड़ पत्रकारिता के धरातल पर उतरने वाले नये चेहरों को हजम नहीं कर पा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण न्यूज चैनलों के जरिये सामने है जहां आलम यह है कि कई लोग मात्र नाम की मोटी कमाई खा रहे हैं और मेहनतकश युवा कलमकार धक्के खा रहे हैं। इसके पीछे सही मायने में नाम वालों का हाथ है, जो नहीं चाहते कि इंदौर की सरजमीं से कोई उदीयमान सितारा कलमकार निकल सके। जो लोग सिर्फ और सिर्फ नाम के दम पर पत्रकारिता कर रहे हैं यह उनके लिए चेतावनी है युवा कलमकारों की तरफ से, क्योंकि अभी वायु धीमी बह रही है यदि तेज हो गई तो आंधी-तूफान का रूप ले लेगी और नामवालों तुम्हें तबाह कर रख देगी।
दरअसल राजेंद्र माथुर की जन्मभूमि में जितने भी न्यूज चैनल्स के दफ्तर हैं वहां महज नाम वाले ही चल रहे हैं काम वालों को इन्होंने दबाकर रख दिया है। उनमें कुछ नाम तो ऐसे हैं जो केवल तथाकथित बुद्धिजीवी होने का ढोंग रचकर ही खुद को वरिष्ठ पत्रकार साबित करने से बाज नहीं आते तो कुछ बिना व्यवहारिक ज्ञान के भी चैनल प्रमुख बनकर बैठे हैं। ऐसे नामवालों ने पढ़-लिखकर कलम से क्रांति लाने वालों पर पर्दा डाल रखा है लेकिन अब वो वक्त आ गया है कि पढ़ा-लिखा नौजवान इन नामवालों को पटखनी देने के लिए आवाज उठाने लगा है। जो बस नाम के लिए कुर्सी पर बैठे हैं अब वो युवा कलमकारों की नोंक पर हैं इसलिए आगाज से पहले यह आवाज उन तक भड़ास4मीडिया के जरिये पहुंचाई जा रही है। बहुत हुई नाइंसाफी अब नहीं सहेगा देश का कलमकार कोई अत्याचार।
लेखक महेंद्रसिंह सोनगिरा पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


