कई बार संयोगों में भी काफी सन्देश निहित होते हैं. इस सोमवार को जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और भारत के रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी की मौजूदगी में छत्तीसगढ़ के लिए एक अनोखे रेल गलियारा सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हो रहे थे तो लगभग उसी समय रेल भवन से कुछ किलोमीटर ही दूरी पर स्थित सुप्रीम कोर्ट अपने उस आदेश पर दस्तखत कर रहा था, जिसमें अटल जी के समय के महात्वाकांक्षी ‘नदी जोड़ो परियोजना’ को उचित ठहराया गया है. उस समय एनडीए के घटक दल में शामिल तृणमूल कोटे के केन्द्रीय मंत्री जब भाजपाई मुख्यमंत्री के साथ यूपीए सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर इस नए सहमति के साक्षी बने तो अब यह उम्मीद की जा सकती है कि ऐसे बड़े मामले में अब ‘राजनीति’ को विकास के आड़े न आने दिया जायेगा.
भारत के लिए रेल हमेशा से भारत की एकता, अखंडता कायम रखने और भावनात्मक रूप से समूचे देश को एक सूत्र में पिरोने का काम करता रहा है. किसी ने कहा है कि अमरीका अमीर है इसलिए वहां की सड़कें अच्छी नहीं है बल्कि वहां की सड़कें अच्छी है इसलिए अमेरिका अमीर है, वहां आवागमन के साधन पर्याप्त है. यह बात भारत में रेल के संबंध में भी सौ फीसदी सच हो सकता है. अगर भारत में भी आवागमन के साधन अच्छे कर दिए जाय तो स्वतः ही देश का समेकित विकास संभव होगा.
लेकिन विडंबना यह है कि रेल को भी हिन्दुस्तान में हमेशा एक राजनीतिक हथियार के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता रहा है. यात्री सुविधाओं की वास्तविक दरकार कहां-कहां है, इसके बदले महत्वपूर्ण यह रहा है कि ‘वोट’ के लिए क्या ज़रूरी है. लेकिन इस तीन नए रेल यात्री कॉरीडोर से वास्तव में देश के इस सबसे पिछडा इलाके माने जाने वाले छत्तीसगढ़ के साथ ही समूचे देश के लिए भी एक नए अध्याय की शुरुआत होगी. इस एमओयू के द्वारा पहली बार यह हुआ है कि रेल के बुनियादी ढांचे के निर्माण में निजी क्षेत्रों को भी भागीदार बनाया जाएगा. हालांकि विश्लेषक अभी भी यह कह सकते हैं कि मात्र 19 दिन के रिकॉर्ड समय में यह एमओयू होना इसलिए संभव हुआ क्यूंकि रेल मंत्रालय तृणमूल कांग्रेस के अधीन है. या उस कार्यक्रम में रेल मंत्री द्वारा इस योजना के बहाने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की तारीफ़ किये जाने को भी प्रेक्षक भविष्य के किसी नए समीकरण की ओर का इशारा समझ सकते हैं.
लेकिन राजनीति से परे की बात करें तो इस निर्णय से प्रदेश के रायगढ़, जशपुर, कोरबा, बिलासपुर से लेकर सरगुजा, सूरजपुर, बलरामपुर आदि जिले के पहुंचविहीन क्षेत्रों के लोगों को भी सीधे या पास के स्टेशन से रेल सुविधा प्राप्त हो सकेगी. किसी को भी जानकर हैरत हो सकता है कि देश को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले बिलासपुर ज़ोन का प्रदेश ‘छत्तीसगढ़’ यात्री सुविधाओं से काफी हद तक अछूता जैसा ही रहा है. वहां के कोयले से भले ही देश की धड़कन चल रही हो, वहां का स्टील प्लांट भले ही रेल को लग्ज़री बोगी उपलब्ध कराने में मददगार रहा हो, प्रदेश की बिजली से भले भोपाल गुलजार होता रहा हो लेकिन छत्तीसगढ़ के आदिवासी जन-जीवन में अन्धेरा कायम रहा है. शेष देश-दुनिया से काट कर रखने की यह साज़िश ही आजतक नक्सलवाद को ‘बहाने’ दे रहा है. प्रदेश के जिन सात जिलों को इस गलियारे से फायदा होगा ये देश के वो इलाके हैं जहां लोगों ने कभी सोचा ही नहीं होगा कि उन्हें कभी रेल के दर्शन भी हो सकते हैं.
मोटे तौर पर छत्तीसगढ़ में अभी तक उतनी ही रेल सुविधा है जिससे शेष देश को कोलकाता या मुंबई से जोड़ा जा सके. लेकिन प्रदेश के दुर्गम इलाके के लोगों की पहुंच भी ‘देश’ के लिए आसान हो इस पर आज तक नहीं सोचा गया था. क्षेत्रफल की दृष्टि से बिहार से भी बड़े इस राज्य में अभी तक केवल 1188 किलोमीटर का रूट लाइन है. और हद तो ये है कि हाल के दशकों में केवल 19 किलोमीटर लाइन का यहां विस्तार हुआ था. लेकिन इस एक पहल से प्रदेश में 452 किलोमीटर नए लाइन बना कर 38 प्रतिशत रेलवे रूट लाइन की बढोतरी संभव होगा. लगभग चार हज़ार करोड की यह परियोजना अगले पांच वर्ष में साकार रूप लेगी. बहरहाल. इस रेल गलियारा के बहाने नक्सलियों के प्रस्तावित ‘लाल गलियारा’ पर भी विमर्श किये जाने की ज़रूरत है. या यूं भी कहा जा सकता है कि यह गलियारा उस गलियारे का बेहतर जबाब हो सकता है.
नक्सलवाद से सार्वाधिक पीड़ित प्रदेश के बस्तर अंचल पर हालिया प्रकाशित एक उपन्यास ‘आमचो बस्तर’ में विस्तार से वर्णित किया गया है कि किस तरह पहले कलक्टर के रूप में बस्तर के जिस एक नौकरशाह ने दुर्गम इलाकों में विकास की रोशनी नहीं पहुंचने दी. जिसने ये बहाने बना कर कि विकास से आदिवासी संस्कृति को नुकसान होगा, वहां सड़कें आदि नहीं बनने दी. जिन लोगों ने आदिवासी संस्कृति के नाम पर लोगों को केवल सिंह पहन कर नाचने वाला ही बनाए रखा. वही लोग बाद में सेवानिवृति होने के बाद विकास नहीं होने का रोना रोने लाल झंडा उठाये बस्तर पहुंच गए थे. इस तरह छत्तीसगढ़ का दुःख-दर्द उनके लिए एक उत्पाद की तरह ही रहा जिसे बेचते रहना ही उन समूहों का एकमात्र काम रहा है. यहां यह कहना ज्यादे उचित होगा कि नक्सलवाद वहां इसलिए ही नहीं पनपा क्यूंकि इसके लिए शोषण आदि पर्याप्त कारण थे. बल्कि ऐसे कारण या बहाने खोजे और पनपाये भी गए क्यूंकि तब आंध्र में सक्रिय कोंडापल्ली सीतारमैया जैसे नक्सली नेता को अंचल की भौगोलिक स्थिति अपने ठिकानों के लिए उपयुक्त लगी थी.
तो विकास की कमी के बहाने से तिरुपति से पशुपति तक का नक्सल ‘लाल गलियारा’ का बेहतर जबाब बिलासपुर से सूरजपुर को जोड़ने वाले ऐसे रेल गलियारे का निर्माण हो सकता है. या भविष्य में कभी नारायणपुर को बलरामपुर, दल्ली को दिल्ली या कोंटा को कोलकाता से जोड़कर भी यह काम किया जा सकता है. अभी बस्तर में ही पिछले दिनों बीजेपी के नेतृत्व में रेल सुविधाओं को लेकर बड़ा आंदोलन किया गया था. उम्मीद है कि रेल बजट में इस ओर भी ध्यान दिया जाएगा. ज़ाहिर है अब तक के विकास की राजनीतिक थ्योरी के उलट आज ऐसे विकास सिद्धांतों की ज़रूरत है जो रेल पटरियों की तरह ही भले समानांतर चले लेकिन उनका गंतव्य एक हो, विकास की ऐसी रेल देश के कोने-कोने के ऐसे ही दुर्गम इलाकों से चले. रेल पटरियां उखाड़ लेने वाले नक्सलियों, झाड़ग्राम में रेल बोगियों को ही ताबूत बना देने वाले माओवादियों के लिए पीटर मारित्ज्वर्ग की तरह ही ऐसे कदम
उनकी भी ताबूत के आख़िरी कील साबित हो सकते हैं. देश के लिए लाल गलियारे का विकल्प ऐसे ही ढेर सारे रेल गलियारे हो सकते हैं. ऐसा उम्मीद निश्चय ही इन कारिडोरों के निर्माण से बंधी है.
लेखक पंकज झा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं. इन दिनों रायपुर से प्रकाशित छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीप कमल के संपादक के रूप में कार्यरत हैं.


