जन लोकपाल को को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा यदि किसी बात को लेकर हो रही है तो वह यह कि राजनैतिक दल मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी नियम नहीं चाहते और जब कतिपय जागरूक सिविल सोसायटी के लोग इस देश के उत्थान के लिए एक ऐसा भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून और संस्था लाना चाह रहे हैं जिससे इस देश में भ्रष्ट आचरण करने की गुंजाइश ही समाप्त हो जाए तो नेताओ द्वारा इसमें तमाम व्यवधान डाला जा रहा है. लोकपाल को लेकर ऐसी कल्पना की जा रही है कि यह एक ऐसी संस्था होगी जो भ्रष्टाचार का समूल वध कर देगी और इसके दायरे से कोई नहीं बच सकता चाहे वह प्रधानमंत्री हों या किसी सरकारी दफ्तर का बाबू. इसके साथ ही इस बात को भी हवा दी जा रही है कि चूँकि कई सारे राजनैतिक लोग, उच्च-पदस्थ अधिकारी और उद्योगपति ऐसे कृत्यों में लिप्त हैं अतः वे ऐसे किसी भी मजबूत भ्रष्टाचार-विरोधी क़ानून का विरोध कर रहे हैं. मजेदार बात यह है कि समाचार पत्र और मीडिया भी इन बातों को पूरी तरह सत्य मान कर “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी क़ानून” और उसके विरोध की बात कर रहे हैं. अब मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी नियम क्या हैं यह तो कोई नहीं जानता क्योंकि कानूनों की मजबूती बस सुन कर या पढ़ कर नहीं समझी जा सकती है. फिर ऐसा भी नहीं है कि मजबूत क़ानून के चक्कर में विधि की मूलभूत अवधारणाओं को त्याग दिया जाए. जैसे कि हम्मुरावी का सीधा और सरल कानून था- आँख के बदले आँख और हाथ के बदले हाथ. यह देखने में भी अच्छा लगता है और शायद असरकारक भी होता होगा. लेकिन हमने इसे इसीलिए नहीं स्वीकार किया कि यदि आज किसी पर आरोप लगता, कल सुनवाई होती, परसों फैसला आ जाता और अगले दिन एक आदमी का एक हाथ या एक आँख गायब. यदि उसके अगले दिन यह बात सामने आती कि तथ्य कुछ और थे और यह बेचारा तो निर्दोष है तो फिर हम चाह कर भी उस आदमी के आँख और हाथ तो नहीं लौटा पाते. शायद इस तरह की तमाम बातों को सोच कर ही हम लोगों ने अपने विधि को एक आधुनिक परिदृश्य दिया. इसीलिए जो लोग भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों में “मजबूती” की बात कर रहे हैं, उन्हें सोचना होगा कि यह मजबूती न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों के विपरीत ना चली जाए.
हमारा यह साफ़ मानना है कि यह विचारधारा कि कुछ निहित स्वार्थ और राजनैतिक दल मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी नियम नहीं चाहते क्योंकि वे इससे डरते हैं, पूरी तरह से भ्रामक है एवं गलत दृष्टि पर आधारित है. एक तरह से जोर्ज बुश के ईराक युद्ध के समय के कथित संवाद-“जो हमारे साथ नहीं हैं, वे हमारे विरोध में हैं” को ही दुहराया जा रहा है. पर यदि हम इसकी सच्चाई में जायेंगे तो हम पायेंगे कि इससे बड़ी भ्रान्ति और असत्य कुछ हो ही नहीं सकता. क्योंकि अगर कोई समर्थवान है, ताकतवर है, शक्तिसंपन्न है तो हर जगह के लिए है. यदि किसी के पास पैसा है तो उसके हरे नोटों की चमक और उसके सिक्कों की खनक हर जगह बराबर है. यदि किसी के पास राजनैतिक शक्ति है तो ऐसा नहीं है कि वह एक जगह असरदार होगी और दूसरी जगह नहीं. यदि कोई बड़े पद पर है तो उसका रसूख हर जगह होगा.
तात्पर्य यह कि रसूखदार लोग, ताकतवर व्यक्ति और धनाढ्य लोग व्यवस्था को देख कर चिंतित नहीं होते क्योंकि वे जानते हैं कि व्यवस्था है तो उसमे छेद भी होगा, उन्हें मालूम है कि जहां उनकी चाह है वहाँ उनके लिए राह भी होगा. उन्हें अच्छी तरह् ज्ञात होता है कि किसी भी व्यवस्था में अंत में मनुष्य ही होते हैं, वही मनुष्य जिसकी कुछ समस्याएं होती हैं, कुछ कमजोरियां होती हैं, कुछ जरूरतें होती हैं, और कुछ हसरतें. इसके अलावा भय तो होता ही है. यह सब काफी है इन लोगों के लिए जो साम, दाम, दंड, भेद और नीति की पुरातन भारतीय पद्धति में पूर्ण आस्था रखते हैं और इस तरह से उनके सारे काम सुचारू चलते रहते हैं.
बहुत साफ़ बात है कि आज जो “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों” की बात चल रही है वह अंत में जा कर इन मजबूत और बड़े लोगों के सर पर नहीं गिरेगा, वह सामान्य लोगों पर ही जाएगा. इससे साधारण से दफ्तरों के बाबू, छोटे ओहदेदार और कम हैसियत के लोग ही प्रभावित होंगे. चूँकि भ्रष्टाचार आज एक सर्वव्याप्त रोग की तरह है जिसके कीटाणु हर जगह हैं, अतः अंततोगत्वा वही होगा कि जहां बड़े लोग अपने साधनों-संसाधनों के बल पर अपने लिए निरंतर रास्ते तलाशते रहेंगे, वहीँ वे छोटे लोग इन कथित “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों” के मारे हो जायेंगे क्योंकि जब शक्तियां विधि के मूल सिद्धांतों के विपरीत कतिपय संस्थाओं को दे दी जायेंगी तो स्वतः ही इनका दुरुपयोग करने और इनसे मनमाना आचरण करते हुए न्याय का गला घोंटने की बात सामने आ जायेगी. इस तरह से यह एक प्रकार से मानव अधिकारों का उल्लंघन भी होगा क्योंकि आरोपित व्यक्ति अपनी पूरी बात कहे बगैर ही क़ानून की चपेट में आता रहेगा.
जहां तक वैसे किस्म के बड़े लोगों की बात है तो वे हमेशा की तरह निर्भीक ही रहेंगे क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट जैसी सर्वशक्तिमान संस्थाएं, सीबीआई, इन्फोर्समेंट डाइरेक्टर, इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, कस्टम विभाग जैसे विभाग तथा कोफेपोसा, प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट आदि उसे नहीं डरा पा रहे हैं तो अचानक इस नए क़ानून से उन्हें कौन सा डर व्याप्त हो जाएगा. वे भली-भांति जानते हैं कि बहुत होगा तो वकील का फीस कुछ बढ़ जाएगा क्योंकि क़ानून के बनने के चंद घंटों के अंदर उसका काट खोजने वाले लोग तमाम उपाय भी निकाल लेंगे.
अतः इस तरह की बात कहना कि राजनैतिक शक्तियां और भ्रष्ट लोग “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानून” नहीं चाहते हैं उतना ही बड़ा धोखा है जितना यह कह देना कि अकाल आने की आहट से धनी लोगों में भय व्याप्त हो जाता है. हाँ, यदि विधि के मूलभूत सिद्धांतों की अवहेलना कर के “मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों” के चक्कर में पड़ा जाए तो सामान्य लोगों को बिना अपनी बात कहे परेशान जरूर होना पड़ेगा.
-अमिताभ एवं नूतन ठाकुर का विश्लेषण


