वाराणसी। शेर गालिब का है और दर्द गांधी चौरा का और हो भी क्यों न आजादी के बाद देश में केवल प्रतीक बन कर रहे महात्मा और उनसे जुड़ी चीजों का कोई पुरसाहाल नहीं रहा। बनारस के बेनिया बाग में स्थित गांधी चौरा आजकल गालिब का ये शेर पढ़कर खुद के बदहाल स्थिति पर जार जार आंसू बहाते हुए यही कह रहा है।
हुए जो मर के रूस्वां तो क्यों न हुए गर्के दरिया
न कहीं जनाजा होता न कहीं मजार होता।
सनद रहे कि गांधी जी के निधन के बाद उनका पुनीत अस्थि कलश 12 फरवरी 1948 को रात आठ बजे आम जनता के दर्श के लिए यहां रखा गया
था कहते हैं कि उस समय लाखों लोगों ने इस अस्थि कलश का दर्शन कर अपने नम आखों से बापू को याद करते हुए उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी थी। अस्थि कलश को दूसरे दिन यहां से हरिश्चन्द्र घाट ले जाकर प्रवाहित किया गया था। बापू की याद में दिसम्बर 1948 को स्वाधीन भारत के प्रथम गवर्नर जनरल राज गोपालचारी ने इस चौक का शिलान्यास किया था। लेकिन बिडम्बना है कि मौजूदा हालत में इस चौक का कोई पुरसाहाल नहीं है। इसके चारों ओर लगी रेंलिग क्षतिग्रस्त हो चुकी है। पान की पीक और बकरी की लीद से इसकी शोभा में बदनुमा दाग लगा रहे हैं। दिन में धोबी यहां कपड़े सुखाता है और शाम ढलने के बाद जुआरी यहां बैठकर दांव लगाते हैं।
गांधी चौरा की इस दुर्दशा से स्थानीय लोग खासे आहत हैं। इनका कहना है कि गांधी के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले राजनेता से लेकर वैष्णव जन को तेने कहिए की धुन गाकर साल में एक बार गांधी को याद करने की औपचारिकता पूरी करने वाले लोगों को इस चौक की पीर नजर नहीं आती। रही नगर निगम की बात तो जब उन्हें अपने अपने कार्यालय में टंगी गांधी बाबा की तस्वीर पर से धूल झाड़ने का वक्त नहीं मिलता तो उनका ध्यान इस चौक की तरफ भला कैसे जाएगा। हद तो यह है कि शहर के कई लोगों को यह पता नहीं है कि गांधी जी की स्मृतियों को संजोये कोई ऐसा स्थल उनके शहर में है भी। शहर के बचे पुराने गांधीवादियों का कहना है कि गांधी नाम था स्वावलम्बन और आत्मनिर्भरता का। मगर आज जब सरकार खुद ही स्वावलम्बन और आत्मनिर्भरता का रास्ता छोड़कर बैसाखियों पर देश चला रही है तो फिर गांधी जी की स्मृतियों की ओर देखने की फुरसत भला किसे है। शहर के पुराने गांधीवादी बताते हैं कि सन 57-58 में तो यहां मेला लगता था और मेले में शामिल होने वाले चरखा चलाने के साथ रामधुन गाते थे।
लेकिन वक्त के साथ यहां हालात बदल गए और गांधी जी से जुड़ी स्मृति बदहाली के कगार पर जा पहुंची। कारण जो कुछ भी हो मगर आजादी की लड़ाई में सामान्य आदमी में एक महाचेतना जागृत करने वाले महात्मा की स्मृति में बने इस चौक की उपेक्षा शहर के उन तमाम बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व राजनेताओं की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाती है। कारण साफ है शायद इनके लिए गांधी सिर्फ किताबों और भूले-भटके गोष्ठियों में याद करने भर तक सिमट कर रह गए हैं। यर्थाथ के धरातल पर इन्हें महात्मा के स्मृतियों से कुछ लेना देना नहीं रह गया है। ऐसे में आने वाले समय में ये गांधी चौरा अगर मिट्टी में मिल जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। यूं तो बेनिया बाग के इस ऐतिहासिक मैदान में साल भर चाहे सत्ता पक्ष और विपक्ष के बड़े नेता सभाओं में महात्मा के वसूलों पर चलने की कसम दोहराते रहते हैं। इस बात से बेखबर कि उनके भाषण स्थल से चंद कदम दूर महात्मा की स्मृतियों को संजोये ये चौरा रात दिन यही कहता रहता है ‘’यूं जुबानी जमा खर्च करने से क्या फायदा, इससे बेहतर कि हमें मिटा क्यों नहीं देते।
बनारस से भास्कर गुहा नियोगी एवं रूद्रानंद तिवारी की रिपोर्ट.


