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…और बिना धरना-प्रदर्शन के बनते गए ‘तहरीर चौक’

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव बताते हैं कि क्रांति सिर्फ धरना-प्रदर्शनों और हथियारों के बल ही नहीं की जा सकती, जैसी अरब देशों में हुई। मतदान केंद्र भी ‘तहरीर चौक’ बन सकते हैं। बसपा सरकार के भ्रष्टाचार और भेदभाव की नीति के विरोध में प्रदेश की जनता ने इतने ‘तहरीर चौक’ बना दिए कि क्रांति हो गई। जरा याद करें 2007 का चुनाव। समाजवादी पार्टी इसलिए हारी थी, क्योंकि कहा गया था कि प्रदेश में लूटमार और गुंडागर्दी बहुत बढ़ गई है। इसमें दो राय थी भी नहीं। समाजवाद का चोला पहने मुलायम सिंह एंड पार्टी अनिल अंबानियों की गलबहियां करने लगी थी, तो बाबरी मस्जिद गिराने के गुनहागार माने जाने वाले कल्याण सिंह को गले लगाया था। कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब थी। समाजवादी पार्टी की सरकार को अमर सिंह सरीखों ने एक तरह से फिल्मों सितारों की पार्टी बना दिया था। इसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा था। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या मायावती सरकार का कार्यकाल मुलायम सिंह से ज्यादा बदतर साबित हुआ कि एक बार फिर उसी मुलायम सिंह यादव के हाथों में सौंप दी, जो 2007 में जनता को मंजूर नहीं थे?

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव बताते हैं कि क्रांति सिर्फ धरना-प्रदर्शनों और हथियारों के बल ही नहीं की जा सकती, जैसी अरब देशों में हुई। मतदान केंद्र भी ‘तहरीर चौक’ बन सकते हैं। बसपा सरकार के भ्रष्टाचार और भेदभाव की नीति के विरोध में प्रदेश की जनता ने इतने ‘तहरीर चौक’ बना दिए कि क्रांति हो गई। जरा याद करें 2007 का चुनाव। समाजवादी पार्टी इसलिए हारी थी, क्योंकि कहा गया था कि प्रदेश में लूटमार और गुंडागर्दी बहुत बढ़ गई है। इसमें दो राय थी भी नहीं। समाजवाद का चोला पहने मुलायम सिंह एंड पार्टी अनिल अंबानियों की गलबहियां करने लगी थी, तो बाबरी मस्जिद गिराने के गुनहागार माने जाने वाले कल्याण सिंह को गले लगाया था। कानून व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब थी। समाजवादी पार्टी की सरकार को अमर सिंह सरीखों ने एक तरह से फिल्मों सितारों की पार्टी बना दिया था। इसका नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा था। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या मायावती सरकार का कार्यकाल मुलायम सिंह से ज्यादा बदतर साबित हुआ कि एक बार फिर उसी मुलायम सिंह यादव के हाथों में सौंप दी, जो 2007 में जनता को मंजूर नहीं थे?

कहना ही होगा कि मायावती को जो मौका प्रदेश की जनता ने दिया था, वह उसका फायदा नहीं उठा पाईं। वह ऐसी लकीर नहीं खींच पाईं, जो मुलायम को इस बार भी सत्ता से दूर रख सकती। यह पहले भी कहा जा चुका है कि जिस सोशल इंजीनियरिंग के बल पर मायावती सत्ता में आई थीं, सत्ता में आने के बाद उन्होंने उसे दरकिनार करके जमकर दलित एजेंडा चलाया। अरबों रुपये पार्कों और मूर्तियों के नाम पर उड़ा देने की बात छोड़ भी दें, तो उन सभी वर्गों ने अपने आप को ठगा महसूस किया, जिन्होंने किसी उम्मीद से बसपा को पहली बार पूर्ण बहुमत देकर प्रदेश की सत्ता सौंपी थी। हालत यह हुई कि विकास के नाम पर महज कुछ ही दलित बस्तियों का उद्धार किया गया। रही सही कसर पूरी की पूरे पांच साल चले भ्रष्टाचार ने। बसपा का पांच साल का कार्यकाल सिर्फ भ्रष्टाचार के लिए याद किया जाएगा।

हालांकि मायावती ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में भ्रष्टाचार के ‘बुतों’ को बाहर करके यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वह भ्रष्टाचारियों को किसी सूरत बर्दाश्त नहीं करेंगी, लेकिन सवाल उछाले गए थे कि क्या साढ़े चार साल तक मायावती को यह नहीं दिखा कि उनके बनाए बुत किसकी ‘बाड़’ खा रहे हैं? जिस सरकार के दो दजर्न से ज्यादा मंत्रियों को खुद मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार के आरोप में बाहर का रास्ता दिखाया हो, सोचा जा सकता है कि उसका शासन कैसा था? एनआरएचएम घोटाले ने साबित किया कि सर्वजन की बात करने वाली सरकार ने गरीबों का पैसा डकारने में भी संकोच नहीं किया। इसी घोटाले ने बसपा के पतन की नींव रखी। सिर्फ उसके कुछ मंत्री और विधायक ही नहीं, बल्कि सबसे ताकतवर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी और खुद उन पर भी भ्रष्टाचार की काली छाया सत्ता के अंतिम दिनों में मंडराने लगी थी।

इस प्रकार मायावती के पूरे कार्यकाल को देखें, तो विधानसभा चुनाव परिणाम अप्रत्याशित नहीं कहे जा सकते। यह तो चुनाव घोषित होने से पहले तय हो गया था कि मायावती सरकार की विदाई हो रही है। देखना बस इतना था कि विदाई कितनी सम्मानजनक होगी? चुनाव हुए और बढ़े मत प्रतिशत के बारे में राजनीतिक पंडित यह पता लगाने में असमर्थ रहे कि यह कहां जा रहा है। खासकर युवा वोटरों के बारे में कुछ निश्चित नहीं कहा जा रहा था। नतीजे आने के बाद वह भी क्लियर हो गया। दरअसल, समाजवादी पार्टी ने अपने पिछले कार्यकाल में इंटर पास करने वाली लड़कियों को बीस हजार रुपये देने का जो वादा किया था, वह उसने पूरा किया। 1993 में में उसने व्यापारियों से चुंगी खत्म करने का वादा किया था, जो पूरा किया गया था। इस बार युवाओं को टेबलेट देने का वादा किया है। युवाओं को उम्मीद है कि मुलायम सिंह यादव इस वादे को भी पूरा करेंगे। इसलिए युवाओं की पसंद भी सपा ही बनी। मुसलमानों का रुख शुरू से ही सपा की ओर था, लेकिन नतीजे बताते हैं कि उन्हें हर वर्ग को वोट मिला है। वह दलित वोट बैंक में भी सेंधमारी करने में कामयाब रहे।

एग्जिट पोल विधानसभा को त्रिशंकु रहने की भविष्यवाणी कर रहे थे। त्रिशंकु की सूरत में प्रदेश में राजनीतिक संकट के आसार भी दिख रहे थे। संकट इसलिए ज्यादा था, क्योंकि कांग्रेस बहुमत नहीं आने की सूरत में राष्ट्रपति शासन की बात कर रही थी। अब जो तस्वीर सामने आई है, वह पूर्ण बहुमत से भी आगे की है। भाजपा के दावे धराशायी हुए हैं। वह पिछली स्थिति से भी नीचे आई है। कांग्रेस के पास कुछ खोने के लिए भले ही नहीं था, लेकिन राहुल गांधी का करिश्मा 22 साल से प्रदेश में हाशिए पर पड़ी कांग्रेस को बाहर निकालने में नाकाम रहा। दो युवराजों की जंग में बाजी अखिलेश के हाथ रही है। जनता ने कई बाहुबलियों को नकार भी जागरूकता का परिचय दिया है। चुनाव परिणाम राजनीतिक दलों के लिए सबक हैं। सबक यह कि किसी खास समुदाय, वर्ग या जाति की राजनीति के लिए अब जगह नहीं बची है। सरकार को प्रदेश के सभी वर्गों के लिए काम करना होगा। मायावती को सबक मिल गया है। मुलायम सिंह भी इस सबक को याद रखेंगे, तो सही होगा, क्योंकि मतदान केंद्रों को ‘तहरीर चौक’ बनने में देर नहीं लगती।

लेखक सलीम अख्‍तर सिद्दीकी मेरठ के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा सक्रिय ब्‍लॉगर हैं. इन दिनों वे जनवाणी के साथ जुड़े हुए हैं.

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