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सोशल नेटवर्किंग : सावधानी हटने से दुर्घटना संभावित

पिछले साल गर्मी के महीने की बात है, जब सेना के जवानों के हाथों कश्‍मीर के कुछ स्थानीय लोगों की हुई मौत ने राजनीतिक रंग ले लिया था। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। जब हालात काबू से बाहर होने लगा तो स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वहां कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई। यह कर्फ्यू सिर्फ लोगों के लिए नहीं बल्कि समाचार पत्रों के लिए भी था। इतना ही नहीं विरोध प्रदर्शन के दौरान भी मीडिया को घटना स्थल से दूर रखा गया। ऐसे समय में वे कश्मीरी जिनके घर में इंटरनेट की सुविधा थी, खास तौर से अठारह से पैंतीस साल के युवाओं ने अपने घर में कम्प्यूटर पर की बोर्ड की मदद से वर्चुअल स्पेस पर एक मोर्चा खोला। सोशल नेटवर्किंग की विभिन्न साइट्स और ब्लाग के माध्यम से इन युवाओं ने विरोध का एक नया तरिका ईजाद किया। ‘ई-प्रोटेस्ट’।

पिछले साल गर्मी के महीने की बात है, जब सेना के जवानों के हाथों कश्‍मीर के कुछ स्थानीय लोगों की हुई मौत ने राजनीतिक रंग ले लिया था। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। जब हालात काबू से बाहर होने लगा तो स्थिति को नियंत्रित करने के लिए वहां कर्फ्यू की घोषणा कर दी गई। यह कर्फ्यू सिर्फ लोगों के लिए नहीं बल्कि समाचार पत्रों के लिए भी था। इतना ही नहीं विरोध प्रदर्शन के दौरान भी मीडिया को घटना स्थल से दूर रखा गया। ऐसे समय में वे कश्मीरी जिनके घर में इंटरनेट की सुविधा थी, खास तौर से अठारह से पैंतीस साल के युवाओं ने अपने घर में कम्प्यूटर पर की बोर्ड की मदद से वर्चुअल स्पेस पर एक मोर्चा खोला। सोशल नेटवर्किंग की विभिन्न साइट्स और ब्लाग के माध्यम से इन युवाओं ने विरोध का एक नया तरिका ईजाद किया। ‘ई-प्रोटेस्ट’।

 

कश्मीर में ई-प्रोटेस्ट करने वाले युवाओं के एक दल ने फेसबुक प्रोफाइल से अपनी तस्वीर हटाकर काले ब्लैक ग्राउंड में सफेद रंग से लिखा, ‘आई प्रोटेस्ट’। कश्मीर के आंदोलनकारी लंबे समय से इस तरीके को अपनाते रहे हैं। बाद में मुल्क दूसरे हिस्सों में भी आंदोलन से जुड़े लोग प्रोफाइल से तस्वीर हटाकर इसी तरह अपना विरोध जताने लगे। मेरी जानकारी में वर्चुअल स्पेस पर ई-प्रोटेस्ट का यह नायाब तरीका पहले कश्मीर के लोगों ने ही अपने आंदोलनों में इस्तेमाल किया। बाद में देश के दूसरे आंदोलनों में भी यह तरीका बहुत लोकप्रिय हुआ। विनायक सेन का मामला हो या फिर इरोम शर्मिला का। हजारों लोगों ने फेसबुक के प्रोफाइल तस्वीरों को बदल कर या खाली छोड़कर अपना ई-प्रोटेस्ट का तरिका अपनाया।

उसी दौरान हुर्रियत कांफ्रेन्स ने एक प्रेस वार्ता में जनता को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें विभिन्न तरिके से अपना विरोध दर्ज कराना चाहिए। इसमें उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भी जिक्र किया था, कि इन साइट्स का कैसे उपयोग अपने पक्ष में किया जा सकता है। वार्ता में जनता से ट्यूटर, फेसबुक और जीमेल बज्ज का बेहतरीन उपयोग करने की मांग की गई थी। कश्मीर के अंदर सरकार के लिए ऐसे लोगों की तलाश कर पाना कम कठिन नहीं था, जो लोग लगातार देश विरोधी नारे और अभियान इंटरनेट पर चला रहे थे। सोशल नेटवर्किंग, जो दोस्तों के बीच गप्पबाजी का अड्डा माना जाता रहा है, वहां आंदोलन से जुड़े लोग सक्रिय हुए। वह गंभीर बातचीत का भी केन्द्र बना। जिस तरह महानगरों में धीरे-धीरे कॉफी हाउस कल्चर कम होता जा रहा है।

मैक-डी, नीरूलाज और बारिस्ता कल्चर के बीच में, वहां फेसबुक और गूगल चैट जैसी सुविधाओं ने जाने-अंजाने में एक बहुत बड़े खालीपन को भरने का भी काम किया है। लेकिन इसी सुविधा का इस्तेमाल देशद्रोही ताकतें भी उसी सुविधा से कर सकती हैं, जिस तरह से हम और आप। यदि पिस्तौल हमें दुश्मन से बचाता है तो वहीं पिस्तौल हमारे दुश्मन के हाथ लगकर उसका काम आसान भी बनाता है। कुछ-कुछ कश्मीर में यही सब फेसबुक के साथ भी हुआ। कश्मीर के एक बड़े दैनिक अखबार ने उन दिनों खबर छापी थी कि एक फेसबुक ग्रुप को पुलिस ने तलब किया है क्योंकि उन्होंने कश्मीर में हुए दंगों से संबंधित एक रिपोर्ट और वीडियो फुटेज अपने एकाउंट पर अपलोड किया था। वैसे इस घटना की विभिन्न संगठनों द्वारा कठोर शब्दों में निन्दा की गई लेकिन इस घटना से माध्यम के ताकत का थोड़ा अंदाजा जरूर लग जाता है।

फेसबुक पर रिहाना के नाम से एक पेज है, जिसके लगभग साढ़े तीन करोड़ सदस्य हैं और प्रति दिन दो लाख नए लोग इस पृष्ठ के साथ जुड़ रहे हैं। अपने पूरे देश में साढ़े तीन करोड़ पाठक संख्या वाले अखबारों और पत्रिकाओं को आप उंगलियों पर गिन सकते हैं। इसी तरह कोका कोला, साउथ पाक, शकीरा, फेसबुक, यू ट्यूब, क्रिस्टिनो रिनाल्डो, डिज्नी जैसे पृष्ठों पर पर भी सदस्यों की संख्या लाखों में है। एक फेसबुक इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति ने अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी का एक वीडियो अपने फेसबुक दोस्तों के साथ शेयर किया, वीडियो अपलोड होने के चौबीस घंटे के अंदर, उस वीडियो पर तीन सौ लोगों के कमेन्ट थे।

फेसबुक पर गंभीर बातों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए कुछ दिनों पहले एक मॉडल पर बातचीत तेज हुई, अधिक से अधिक फेसबुक कमेन्ट को शेयर करने के मॉडल की बात। यदि एक कमेन्ट को सौ लोग शेयर करते हैं और सभी के फ्रेन्ड लिस्ट में हजार-हजार दोस्त भी हुए तो एक अनुमान से एक जगह कही हुई बात एक लाख लोगों तक पहुंच जाएगी। फेसबुक पर कई लोग इस समय सक्रिय हैं, जिन्होंने अपने फेसबुक वॉल को फालतू की बातचीत का नहीं बल्कि वैचारिक बहस का केन्द्र बनाया है। इसी तरह फेसबुक पर पंकज झा, अविनाश दास, मुसाफिर बैठा, सुरेश चिपलूनकर, सुनील कुमार सुमन, समय अनार्य, हिमांशु पांड्या जैसे फेसबुक पर सक्रिय लोग भी हैं, जिन्होंने अपने-अपने वॉल को वैचारिक बहस से जोड़ा है।

दिलीप मंडल अपने पुराने फेस बुक वॉल के एक पोस्ट (जो किसी कारणों से इन दिनों निष्क्रिय हैं, श्री मंडल को दिलीप सी मंडल के नए फेसबुक अकाउंट पर तलाशा जा सकता है) पर लिखते हैं – ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के पेज पर हर दिन बताया जाता है आज यहां 95 प्रतिशत लोगों ने जनलोकपाल नहीं तो वोट नहीं कहा … कल 98 प्रतिशत लोगों ने जनलोकपाल नहीं तो वोट नहीं कहा… लेकिन 3.39 लाख लोगों से जुड़े इस आंदोलनकारी पेज (यह हम और आप जैसा निजी अकाउंट नहीं है) में शायद ही कभी किसी पोस्ट को 2000 लोगों ने लाइक किया हो। यानी आपके 99.42 प्रतिशत समर्थक आपके लिए एक क्लिक तक करने को तैयार नहीं है। और आपका दावा है कि पूरा देश आपके साथ है। … केजरीवाल गैंग का जनमत संग्रह और मेरा गणित, दोनों ही गलत तरीके हैं और इस तरह नतीजे नहीं निकाले जाने चाहिए।’

बात सिर्फ भारत की क्यों करें, म्यांमार, तिब्बत से लेकर ईरान तक के आंदोलन में तकनीक का बेहतरीन उपयोग किया गया। भारत में श्रीराम सेना के खिलाफ तहलका की निशा सूसन के आंदोलन से लेकर जनलोकपाल के लिए खड़े हुए अन्ना के आंदोलन तक तकनीक ने ही बड़ी भूमिका निभाई है। ग्राउंड रिपोर्ट के सीईओ रेशेल स्टर्ने के अनुसार आंदोलन की पृष्ठभूमि से जुड़े लोगों की ट्विटर और फेसबुक ने अपनी बात कम समय, कम खर्च में अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने में बड़ी मदद की है। इसने मीडिया पर निर्भरता कम की है और आपको अपने हाथ में आपकी अपनी मीडिया दे दी है। रेशेल की बात को सही होते हम अपने आस-पास देख ही रहे हैं। आज अपने पक्ष में किसी राजनेता, खिलाड़ी या मॉडल को कुछ कहना होता है तो वह प्रेस कांफ्रेन्स की जगह ट्विटर को अधिक महत्व देता है। शशि थरूर जैसे कद्दावर नेता को अपनी कुर्सी ट्विट की वजह से गंवानी पड़ी।

एक मॉडल की वेबसाइट पर किसी ने रातों रात उसकी न्यूड फोटो चिपका दी। चिपकाने वाले का इरादा रहा होगा कि इससे मॉडल की वेबसाइट पर लोगों की भीड़ जुटे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बाद में उस मॉडल को खुद ट्विटर पर लिखना पड़ा कि उसके साथ किसी ने यह छेड़छाड़ की है और उसकी न्यूड फोटो उसकी वेबसाइट पर डाल दी है। इतनी बात लिखने की देरी थी। लोगों की भीड़ उस वेबसाइट पर टूट पड़ी। वैसे मॉडल ने इस काम को अंजाम देने वाले के खिलाफ थाने में कोई एफआईआर तक दर्ज नहीं कराया और खास बात यह कि अपना कमेन्ट लिखने तक उनकी तस्वीर वेवसाइट पर बनी हुई थी। दिसम्बर 2004 में बाजी डॉट कॉम के सीईओ अविनाश बजाज की गिरफ्तारी हुई थी, उनपर आरोप था कि उनकी वेबसाइट के जरिए दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल के एक सोलह वर्षीय छात्रा और सत्रह वर्षीय छात्र की कुछ आपत्तिजनक क्लिप बेची जा रही है। इन उदाहरणों का जिक्र सिर्फ इसलिए आया क्योंकि हम समझे कि माध्यम हमारे सामने है और हम इसका गलत और सही दोनों तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं।

एक तरफ जहां दिल्ली ट्रैफिक पुलिस लोगों को बता रही है कि वे किसी भी तरह की गड़बड़ी यदि सड़क पर देखते हैं तो उसकी तस्वीर या वीडियो बनाकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के फेसबुक पेज पर अपलोड कर दें। दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होगी। दूसरी तरफ हमारे देश की सुरक्षा में लगी एजेन्सियों को अब इस बात की इजाजत सरकार से चाहिए कि वह जब जिसका ई-मेल, फेस बुक, ट्विटर अकाउंट खोलकर देखना चाहें, देख पाएं। मतलब इसके लिए उन्हें किसी पासवर्ड की जरूरत ना हो। जिस प्रकार आज उनके पास टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड करने का अधिकार है, उसी तरह का अधिकार वे ई-मेल और दूसरे तरह के अधिकार वे सोशल नेटवर्किंग साइट के साथ भी चाहते हैं। सुरक्षा एजेन्सियों का दावा है कि इससे साइबर अपराधों के साथ-साथ दूसरे अपराधों पर भी वे लगाम लगा पाएंगे।

डाइरेक्टर ऑफ सोशल इंटेलिजेन्स की ‘ओवरव्यू ऑफ लीडिंग इंडियन सोशल मीडिया’ के नाम से आई एक रिपोर्ट कहती है कि देश में सोशल मीडिया तेजी से फैल रहा है और यह लोगों के मत को प्रभावित भी कर रहा है। देश के कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं में साठ फीसदी उपभोक्ता सक्रियता के साथ सोशल मीडिया के साथ जुड़े है। टेलीकॉम रेगुलेटरी ऑथोरिटी ऑफ इंडिया के अनुसार देश में लगभगर आठ करोड़ तीस लाख इंटरनेट उपभोक्ता हैं और इनमें 56 प्रतिशत उपभोक्ता ब्रॉडबैन्ड इस्तेमाल करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2014 तक देश में मोबाइल पर इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की आबादी साढ़े सात करोड़ लोगों की हो जाएगी। इस वक्त पूरी दुनिया में अस्सी करोड़ फेसबुक अकाउंट हैं। इन सारे आंकड़ों से इंटरनेट और सोशल साइट्स की बढ़ती ताकत का अंदाजा आप लगा सकते हैं। 

अब जब इसी तरह देश में धीरे-धीरे सोशल नेटवर्किंग साइट की शक्ति बढ़ती जाएगी तो वह कई लोगों के लिए चिन्ता का सबब भी बन सकती है। चूंकि इसे अच्छे इरादे से इस्तेमाल करने वाले लोग हैं तो यहां कसाब और गिलानी के समर्थक भी बड़ी संख्या में मौजूद होंगे। सोशल नेटवर्किंग साइट और इसपर लिखी जा रही बातों को लेकर सरकार कितनी गंभीर है, इसको इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है। सोशल नेटवर्किंग साइट पर दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुटकुलेबाजी करने वाले लगभग दो दर्जन लोगों पर मुकदमा हुआ। दूसरी घटना, उन आपत्तिजनक वेवसाइट्स को ब्लॉक करने से जुड़ा है, जिसपर आपत्तिजनक सामग्री थी। यह दो घटनाएं अपने आप में नई तरह की घटनाएं हैं। इसी तरह ‘आई हेट अंबेडकर’ के नाम से चलने वाले एक फेसबुक पृष्ठ को सरकार को ब्लॉक करना पड़ा। इस बात की जानकारी एक आरटीआई के माध्यम से सामने आई।

इंटरनेट से जब नया-नया परिचय हुआ था, उस वक्त यह सिर्फ ई-मेल लाने और ले जाने का काम करता था। उन दिनों इंटरनेट पर याहू का ही कब्जा था। याहू के सर्च इंजन से बाद में परिचय हुआ। आज यह ज्ञान और अज्ञान दोनों का अथाह सागर है, यहां मोती भी है और कीचड़ भी। उतरने से पहले हमें ही तय करना होगा, हमारी तलाश क्या है? सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए झूठ, बेइमानी और अपराध के दर्जनों किस्से हैं तो यहां बनी और निभती दोस्तियों की भी अनगिनत कहानियां हैं। सभी माध्यमों की अपनी कुछ विशेषता और कमियां होती हैं। निश्चित तौर पर इसकी भी हैं। इसलिए बरतिए मगर ध्यान से, क्योंकि सावधानी जाने से ही दुर्घटनाएं होती हैं।

लेखक आशीष कुमार अंशु युवा पत्रकार हैं और ग्रामीण विकास की मासिक पत्रिका  सोपान स्टेप के साथ सम्बद्ध हैं.

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