उत्तराखंड की जनता ने किसी भी दल को बहुमत न देकर कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही आईना दिखाया है। चुनाव नतीजों से यह बात साफ हो चुकी है कि राज्य की जनता को अब हवाई वायदों से गुमराह नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर सत्ता हथियाने वाली भाजपा ने पांच वर्षों तक विकास के नाम पर खुद की ही जेबें भरीं। कांग्रेस के 56 घोटालों की जांच के नाम पर आयोग बिठाकर भाजपा खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूब गई। निशंक राज को उत्तराखंड के इतिहास में भ्रष्टाचार के स्वर्णयुग के रूप में याद रखा जाएगा। कमाई के रास्ते में खंडूड़ी को रोड़ा बनते देख ऐसा पत्ता साफ किया कि चुनाव से ऐन पहले दोबारा मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद भी वो भाजपा की नैया पार नहीं लगा पाए।
यही नहीं, ईमानदार छवि के बावजूद खुद अपनी ही सीट नहीं बचा सके। खंडूड़ी की हार को न पचा पाने का ढोंग करने वाले भले ही इसके पीछे भितरघात को जिम्मेदार ठहरा रहे हों, लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकायुक्त कानून लाकर खुद की पीठ थपथपाने वाले जनरल ने इस कानून में जनप्रतिनिधियों को बचाने के लिए जो सुराख छोड़ दिए हैं, उससे क्या यह मैसेज नहीं जाता कि वे जनता को भरमाने का प्रयास कर रहे हैं? एक ओर तो वे भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध होने का झूठा दिखावा करते हैं और दूसरी ओर उस बनिये उमेश अग्रवाल को राष्ट्रीय स्तर के कद्दावर नेताओं के बगलगीर बनाते हैं, जो स्वयं भू-माफिया है। खंडूड़ी का यह लोकायुक्त तो कांग्रेस के उस लोकपाल की भांति ही झूठा मुखौटा ओढ़े है, जो कहने को अन्ना के जन लोकपाल से बेहतर होने का दावा करता है लेकिन हकीकत में संसद के उन प्रतिनिधियों को बचाने के रास्ते मुहैया करवाता है, जो जनता से जुड़े सवाल पूछने के लिए मोटी रकम उदरस्थ करते हैं, गंभीर विषयों पर चर्चा के दौरान अश्लील वीडियो देखते हैं, अपने भत्तों में बढ़ोत्तरी की मांग करते हैं, लेकिन लोकतंत्र के हितैषी होने का सर्टिफिकेट लिए फिरते हैं।
बहरहाल अब जब उत्तराखंड की जनता ने भारी मन से अपना फैसला दे ही दिया है, तो उसका स्वागत करना चाहिए और उम्मीद करनी चाहिए कि कांग्रेस ही सरकार बनाए, क्योंकि ऐसे हालातों में भाजपा को सत्ता में दोबारा काबिज होने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। लेकिन कांग्रेस को भी यह समझना होग कि जनता का यह फैसला उसके पक्ष में नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि राज्य में मतदाता के सामने विकल्पहीनता की स्थिति है, जिसके चलते वे नए पर दांव खेलने की बजाय जाने-पहचाने चेहरों पर ही भरोसा जताने को अभिशप्त हैं। वैसे भी कहावत है कि ‘अपना मारेगा तो क्या, छांव में तो फेंकेगा।’
लेखक मनु मनस्वी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


