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डीपी यादव ने दबंगई और बेइमानी की नींव पर खड़ी की है शुगर मिल

सोच में विकृति आ जाने के बाद इंसान जीवन पर्यन्त उसी में जकड़ा रहता है। विकृत सोच का इंसान फर्श से अर्श पर पहुंच जाये, तो भी उसकी सोच नहीं बदलती। बाहुबली और धनबली के नाम से कुख्यात डीपी यादव की बात करें, वह आज करोड़ों की संपत्ति के स्वामी हैं, साथ ही उनके पास ऐश्वर्य और वैभव का हर साधन मौजूद है, लेकिन सोच में अंदर तक बेईमानी बैठी होने के कारण दबंगई और चोरी अभी भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। बात चौंकने की अवश्य है, लेकिन है सौ प्रतिशत सच। बाहुबली और धनबली के रूप में कुख्यात होने के कारण देश भर के लोग डीपी यादव को चेहरा व नाम से जानते ही हैं, लेकिन कुछ लोग तर्क देते हैं कि डीपी यादव अब गलत धंधे नहीं करते, क्योंकि उनके पास अब किसी चीज की कमी नहीं है।

सोच में विकृति आ जाने के बाद इंसान जीवन पर्यन्त उसी में जकड़ा रहता है। विकृत सोच का इंसान फर्श से अर्श पर पहुंच जाये, तो भी उसकी सोच नहीं बदलती। बाहुबली और धनबली के नाम से कुख्यात डीपी यादव की बात करें, वह आज करोड़ों की संपत्ति के स्वामी हैं, साथ ही उनके पास ऐश्वर्य और वैभव का हर साधन मौजूद है, लेकिन सोच में अंदर तक बेईमानी बैठी होने के कारण दबंगई और चोरी अभी भी नहीं छोड़ पा रहे हैं। बात चौंकने की अवश्य है, लेकिन है सौ प्रतिशत सच। बाहुबली और धनबली के रूप में कुख्यात होने के कारण देश भर के लोग डीपी यादव को चेहरा व नाम से जानते ही हैं, लेकिन कुछ लोग तर्क देते हैं कि डीपी यादव अब गलत धंधे नहीं करते, क्योंकि उनके पास अब किसी चीज की कमी नहीं है।

समय के साथ सामाजिक सोच भी बदली है या यूं कहें कि समूचे समाज की सोच में ही लगातार विकृति आ रही है, तभी समाज में डीपी यादव के भी चाहने वाले पैदा हो गये हैं। डीपी के चाहने वालों का तर्क है कि डीपी यादव को अपने कारोबारों से ही बहुत बड़ा मुनाफा होता है, ऐसे में उन्हें बेईमानी करने की अब कोई आवश्यकता ही नहीं है और न ही वह अब ऐसा कुछ करते हैं, साथ ही लोग उन्हें बहुत अच्छा इंसान बताते हुए महापुरुषों की श्रेणी में भी खड़ा करने से नहीं चूकते। खैर, डीपी के चाहने वालों के बारे में क्या कहा जा सकता है? उनकी अपनी सोच है, जो उनके नजरिये से सही भी हो सकती है, पर जनपद बदायूं में बिसौली तहसील क्षेत्र के गांव रानेट के पास उनकी हाल ही में स्थापित यदु शुगर मिल की बात करें, तो उसकी स्थापना दबंगई और बेईमानी से ही की गयी है। पिछले 16 दिसंबर को पत्नी उमलेश यादव ने मिल का उदघाटन किया था और मिल के डायरेक्टर छोटे पुत्र कुणाल यादव को बनाया गया है।

सूत्रों का कहना है कि शातिर दिमाग डीपी यादव ने अपने यहां काम करने वाले गुलाम रूपी लोगों के नाम पट्टे जारी करा रखे हैं। कुछ लोगों की जमीनें भी खरीदी हैं, लेकिन जमीन के मालिक अपनी जमीन बेचना ही नहीं चाहते थे, पर बसपा सरकार में शक्ति का दुरुपयोग करते हुए डीपी यादव ने पुलिस से व अपने गुर्गों से धमकी दिलाई एवं कुछ किसानों के पास कृषि ऋण था, उनकी तहसीलदार से कह कर कुर्की जारी करा कर राजस्व की टीम पीछे लगा दीं, तो हार कर भयभीत किसानों ने डीपी यादव की शुगर मिल को जमीन बेच दी। डीपी यादव की मिल के पास मौजूद जमीन के पट्टे वर्षों पहले से कराये जा रहे हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि बसपा सरकार में हुए पट्टों के बारे में तो समझ में आता है, पर सबसे अधिक पट्टे पिछली सपा सरकार में ही कराये गये हैं। सपा का दुश्मन नंबर-वन होने के कारण यह बात किसी के भी गले नहीं उतर रही है कि डीपी ने ऐसा कैसे करा लिया?

डीपी यादव द्वारा हथियाये गये पट्टों के बारे में एसडीएम बिसौली रजनीश राय का कहना है कि उन्हें अधिक जानकारी नहीं है, साथ में यह भी कहा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति एक-दो बार शिकायत लेकर आया था, लेकिन बाद में जानकारी हुई कि उसने डीपी यादव को जमीन बेच दी, तो फिर उन्होंने भी कुछ नहीं किया। विस्तार से जानकारी मांगने के सवाल पर वह बोले अभी बाहर हैं, इसलिए सोमवार को ही कुछ बता पायेंगे। बिसौली के तहसीलदार पंकज सक्सेना ने सब कुछ नकार दिया। उनका कहना है कि सभी पट्टे बिल्सी तहसील से जारी कराये गये हैं, इसलिए वह कुछ नहीं बता सकते। बाद में बोले कि अभी बाहर हैं, इसलिए सोमवार को आकर रिकार्ड देखेंगे। तहसीलदार बिल्सी ने भी यही कहा कि वह बाहर हैं और मंगलवार को आकर ही कुछ बता पायेंगे। अधिकारियों के कन्नी काटने से साफ है कि वह सब सरकार के कम डीपी यादव के वफादार अधिक हैं, इसलिए उच्च स्तरीय जांच की आवश्यकता है, ताकि गरीब और आम आदमी के साथ न्याय हो सके।

कानून के जानकारों का कहना है कि पट्टों के स्वामियों ने अगर स्वेच्छा से डीपी यादव की शुगर मिल को जमीन दी है, तो भी नियम के विरुद्ध ही है, क्योंकि सरकार ने जिस उद्देश्य से पट्टा धारक को जमीन दी थी, वह पट्टा धारक द्वारा पूरा नहीं किया जा रहा है, इसलिए नियमानुसार पट्टा निरस्त होना चाहिए। सूत्रों के अनुसार अधिकांश पट्टा धारक डीपी के अपने कारिंदे ही हैं, जो डीपी के विरुद्ध आवाज नहीं उठायेंगे। इसके अलावा जिन लोगों के बैनामे कराये गये हैं, उनसे भी बड़े अधिकारियों को कानून का साथ देने का विश्वास दिलाते हुए बात करनी चाहिए, ताकि उनके दिल से डीपी का भय निकल जाये और सच बोलने लगें।

लेखक बीपी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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