सुप्रसिद्ध भोजपुरी साहित्यकार मनोज भावुक को पूर्वांचल भोजपुरी महासभा, गाज़ियाबाद द्वारा शनिवार को संस्था के सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड पूर्वांचल गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गार्डेनिया ग्रुप के चेयरमैन मनोज राय ने। मनोज को यह सम्मान भोजपुरी की तमाम संस्थाओं के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने की दिशा में किए गए प्रयास और उल्लेखनीय सेवा के लिए दिया गया है। मनोज भावुक विश्व की सबसे बड़ी भोजपुरी संस्था विश्व भोजपुरी सम्मलेन की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष हैं व इसके पहले इसी संस्था के ग्रेट ब्रिटेन और अफ्रीका इकाई के अध्यक्ष रह चुके हैं।
मनोज ने पूर्वी अफ्रिका के युगांडा में BAU यानी की भोजपुरी एसोसियेशन ऑफ़ युगांडा की स्थापना की और यूके में भोजपुरी समाज को संगठित कर लन्दन के हाइड पार्क में भोजपुरी कार्यक्रमों का आयोजन किया। तस्वीर जिंदगी के (ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी (गीत-संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तकें हैं। मनोज भोजपुरी के जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं और भोजपुरी चैनल हमार टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं।
इसके पहले विश्व पुस्तक मेला, दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय किसान परिषद और नारायणी साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भोजपुरी शख्सियत मनोज भावुक को विश्व हिन्दी समिति के अध्यक्ष श्री दाउजी गुप्त के हाथों सम्मानित किया गया था. संस्था के महासचिव डा. चंद्रमणि ब्रह्मदत ने कहा कि मनोज भावुक को यह सम्मान न केवल भोजपुरी साहित्य हेतु बल्कि वृहत्तर अर्थ मे पूरे हिन्दी साहित्य और भारत के साहित्य को समृध्द करने हेतु प्रदान किया गया है। भोजपुरी जगत में अपने विशिष्ट योगदान के लिए मनोज भावुक भोजपुरी की राष्ट्रीय – अन्तराष्ट्रीय लगभग सभी संस्थाओं द्वारा नवाजे जा चुके है। एक रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित भाऊराव देवरस सेवा न्यास, लखनऊ द्वारा पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान और देश को गौरवान्वित करने वाली एक अजीम शख्सियत के तौर पर भारतीय भाषा परिषद सम्मान से भी भावुक विभूषित हैं।

नारायण साहित्य अकादमी की अध्यक्षा डा. पुष्पा सिंह ने हा कि भावुक की शायरी और उनके लेखन में संवेदनाओं का एक व्यापक संसार उपस्थित है। प्रेम, सौंदर्य, अवसाद, मिलन, बिछोह, रुसवाई और बेवफाई के गहरे अहसासों से भरी हुई उनकी रचनाओं से जब कोई एक तस्वीर बनायी जाए, जिंदगी की मुश्किलों और दुश्वारियों से रू-ब-रू मनोज उसमें एक नया रंग भरते दिखाई देने लगते हैं। उन्हें मालूम है कि जिंदगी के रंग हजार है, इसलिए साहित्य का भी रंग एक नहीं हो सकता। मनोज की शायरी को, उनके साहित्य को, जिंदगी के इन्हीं हजार-हजार रंगों को, उनके खूबसूरत और दर्द भरे लम्हों में पकड़ लेने की कलात्मक कोशिशों के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी कोशिशों के रूप में, जिनमें जिंदगी को बांध लेने का गहरा फलसफा शामिल है। उल्लेखनीय है कि मनोज भावुक का भोजपुरी फिल्मों से भी बतौर फिल्म समीक्षक और अभिनेता गहरा सम्बन्ध है।


