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हिमाचल में भाजपा तख्‍त को ताबूत में बदलने को तैयार

अंततः राजन सुशांत को दल की प्राथमिक सदस्यता और संसदीय दल से निलंबित करने का समाचार आ ही गया. यह कोई आश्चर्य चकित कर देने वाला फैसला नहीं है. हाँ, नेताओं के अहम् और शिकायतों को अवश्य ही समय रहते सुलझाया जा सकता था ताकि इस प्रकार के कठोर निर्णयों से पार्टी को बचाया जा सके. हिमाचल भारतीय जनता पार्टी संगठन के प्रमुख खीमी राम को बदल कर उनके स्थान पर सतपाल सत्ती की नियुक्ति और खीमी राम की वन मंत्री के पद पर पुरस्कार स्वरुप ताजपोशी की चिर प्रतीक्षित घोषणा के साथ ही, छाए धुंधलके के बावजूद यह स्पष्ट होने लगा था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जहाँ एक ओर पूरी तरह से प्रो. प्रेम कुमार धूमल के कार्य-कलाप से संतुष्ट है वहीँ वह उन्‍हें संगठन के मामले में भी पूर्व की भांति फ्री हैण्ड देना चाहता है. इसी लिए उसने पुनः धूमल की पसंद के प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति को हरी झंडी देकर सत्ता और संगठन दोनों पर धूमल पक्ष का एकाधिकार स्थापित कर दिया.

अंततः राजन सुशांत को दल की प्राथमिक सदस्यता और संसदीय दल से निलंबित करने का समाचार आ ही गया. यह कोई आश्चर्य चकित कर देने वाला फैसला नहीं है. हाँ, नेताओं के अहम् और शिकायतों को अवश्य ही समय रहते सुलझाया जा सकता था ताकि इस प्रकार के कठोर निर्णयों से पार्टी को बचाया जा सके. हिमाचल भारतीय जनता पार्टी संगठन के प्रमुख खीमी राम को बदल कर उनके स्थान पर सतपाल सत्ती की नियुक्ति और खीमी राम की वन मंत्री के पद पर पुरस्कार स्वरुप ताजपोशी की चिर प्रतीक्षित घोषणा के साथ ही, छाए धुंधलके के बावजूद यह स्पष्ट होने लगा था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जहाँ एक ओर पूरी तरह से प्रो. प्रेम कुमार धूमल के कार्य-कलाप से संतुष्ट है वहीँ वह उन्‍हें संगठन के मामले में भी पूर्व की भांति फ्री हैण्ड देना चाहता है. इसी लिए उसने पुनः धूमल की पसंद के प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति को हरी झंडी देकर सत्ता और संगठन दोनों पर धूमल पक्ष का एकाधिकार स्थापित कर दिया.

पिछले कई दिनों से आरोप-प्रत्यारोप और बयानबाजी बंद होने के कारण ऐसा लगने लगा था कि हाई कमान ने प्रो. धूमल और डाक्टर सुशांत के मध्य खाई पाटने और समझौता करने का आदेश दिया है, जिसके चलते दोनों परिवीक्षा यानी की प्रोबेशन पर चल रहे हैं. परन्तु ऐसा हुआ नहीं. वैसे भी यह इतना सरल नहीं है क्यूँ कि दोनों ही कद्दावर नेता हैं. एक ओर जहाँ धूमल शांत और बेवजह बयानबाजी न करनेवाले नेता हैं वहीँ सुशांत आपातकाल में विद्यार्थी जीवन की राजनीति से ही संघर्ष और आंदोलनों की आग में पक़ कर प्रदेश की राजनीति में अदम्य साहसी और जुझारू नेता के रूप में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे हैं.

इंदिरा गांधी ने जिस प्रकार सत्ता पर काबिज रहने के लिए कांग्रेस पार्टी के संगठन को अपने कब्जे में रखना प्रारम्भ किया था, ठीक उसी प्रकार प्रो. धूमल ने भी एक कुशल राजनीतिज्ञ की भांति सत्ता में आने से पूर्व पहले संगठन पर अपना कब्ज़ा जमाना उचित समझा. यह तो सर्व विदित है कि गुजरात के वर्तमान मुख्य मंत्री नरेन्द्र मोदी जब हिमाचल भाजपा के प्रभारी थे, उसी समय प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव लिए ज्वालाजी रेस्ट हॉउस में उपजे विवाद के बाद से ही भाजपा में धूमल पक्ष और शांता पक्ष का नाम चर्चा में आने लगा है. ऐसी चर्चा रही थी ज्वालाजी में उपजे विवाद के पश्चात और नरेन्द्र मोदी की सहायता से ही संगठन में धूमल पक्ष कब्ज़ा हो गया था, जो आज तक चल रहा है.

ऐसा माना जाता है कि संगठन पर प्रो. धूमल के प्रभाव के चलते ही सुशांत की धर्मपत्नी को उनके गृह क्षेत्र से विधानसभा के चुनाव के लिए पार्टी का टिकट नहीं मिल सका था. इस कारण से नाराज सुशांत ने हिमाचल में अपनी ही सरकार पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगाने आरंभ कर दिए, जो अनुशासन तोड़ने का सबब बना. उनके इस कदम पर पहले उन्हें प्रदेश की कार्यकारणी से पूर्व प्रदेशाध्यक्ष खीमी राम ने बाहर का रास्ता दिखाया गया और सारे मामले से हाई कमान को अवगत कराया गया, जिसके चलते हाई कमान ने अब उन्हें संसदीय दल व पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है. अब अन्दर की बात क्या है यह तो वही जाने. परन्तु, जो दो प्रमुख आरोप सामने आ रहे हैं उन पर चर्चा की जा सकती है.

अपनी पत्नी या परिवार के किसी सदस्य के लिए चुनाव का टिकट मांगने की बात में कैसा अपराध, यह समझ से बाहर है. आज भाजपा में उत्तर से दक्षिण तक वंशवाद और परिवारवाद ही तो चल रहा है. यह मीडिया का कथन नहीं बल्कि भाजपा के भीष्म पितामह शांता कुमार का कहना है. जब धूमल अपने पुत्र अनुराग को हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से पार्टी का टिकट दिलवा सकते हैं तो राजन सुशांत द्वारा अपनी पत्नी के लिए टिकट मांगना क्यूँ कुफर ढा गया? जिन वरीयताओं के चलते एक को टिकट मिल सकता है तो दूसरे को क्यूँ नहीं? जहाँ तक अपनी सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप लगा अनुशासन भंग करने का प्रश्न है तो क्या इस प्रकार के विषयों पर सत्ता पक्ष द्वारा छुटभैये नेताओं से बयान दिलवाना कहाँ तक उचित है? उनको इस प्रकार के बयान देने के लिए किसने अधिकृत किया था. भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने समय रहते क्यूँ नहीं इसको रोकने के तुरंत कारगर प्रयत्न किये. गाजीपुर, उत्तर प्रदेश के रहनेवाले प्रदेश भाजपा प्रभारी कलराज मिश्र ने कितनी मर्तबा इस अप्रिय प्रकरण को रोकने का प्रयत्न किया. करते भी कैसे, जाके तन लागे वही जाने. अब उत्तर प्रदेश में गडकरी द्वारा उमा भारती को भावी मुख्यमंत्री घोषित करने पर किस प्रकार मीडिया के सामने अपनी भड़ास निकाली थी कलराज मिश्र ने, यह किसी से छुपा नहीं है. अनुशासन के नाम पर वर्षों की तपस्या पर पानी फिरता देख चुप रहना इतना सरल नहीं होता है. 

प्राथमिक सदस्यता और संसदीय बोर्ड से मात्र निलंबन के फैसला से लगता है कि आलाकमान को अभी भी किसी हल के निकलने की आशा है, या फिर वह दबाव बना कर भय-दोहन करना चाहता है. इसके ठीक विपरीत यदि बर्खास्त भी कर दिया जाता तो सांसद होने के नाते मिलने वाले लाभ और विशेषधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था और वह अपना शेष कार्यकाल असम्बद्ध सदस्य के रूप में पूरा करते. जो भी हो कुल्लू के बाद प्रदेश के एक बड़े व महत्वपूर्ण जिला कांगड़ा में अनुशासन के नाम पर इस प्रकार के वातावरण के निर्माण से भाजपा को कितनी लाभ-हानि की प्राप्ति होगी, इसका उसने गलत आंकलन किया है. प्रदेश के १२ जिलों में उसका जनाधार बढ़ने की अपेक्षा खिसकता दिखाई देता है. दल के भीतर मतभेद तो हो सकते हैं परन्तु मनभेद का कोई स्थान नहीं होता. भाजपा आला कमान की प्रदेश भाजपा के धूमल पक्ष से हद से बाहर की प्रीत, बढ़ रहे असंतोष की आग में घी का काम कर रहा है. यदि समय रहते भाजपा आलाकमान ने इस बढ़ रहे असंतोष को काबू नहीं किया तो प्रदेश सरकार पर सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर भ्रष्टाचार के बहुत से मामले उजागर होंगे ऐसी आशंका है.  

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पड़ोसी राज्य पंजाब और उत्तराखंड के अभी हाल में हुए चुनावों के नतीजों से कुछ सीख लेने की आवश्यकता है. पंजाब कांग्रेस के कर्मठ और पुराने नेताओं की  अनदेखी के चलते ही वहाँ कांग्रेस की ऐसी दुर्गति हुई है. वहीँ पंजाब भाजपा के जहाँ २००७ के चुनावों में १९ विधायक जीत कर आये थे वहीँ अब केवल १२ का ही विधानसभा में दाखिला संभव हुआ है. दूसरी ओर उत्तराखंड में न केवल भाजपा ने अपनी सरकार गंवायी बल्कि उसके मुख्यमंत्री खंडूरी को भी पराजय का मुहँ देखना पड़ा. वहाँ आज कांग्रेस पार्टी को भी जमीनी नेताओं की अनदेखी करने के कारण हरीश रावत जैसे कर्मठ और समर्पित नेताओं को बगावत करने को मजबूर कर दिया है. चुनावी वर्ष में मिशन रिपीट का स्वप्न देखने वाली धूमल सरकार को बाहर से कांग्रेस व हिमाचल लोकहित पार्टी और भीतर से खफा कार्यकर्ताओं और नेताओं के वार झेलने होंगे. ऐसे में महेश्वर सिंह के बाद राजन सुशांत को बाहर का रास्ता दिखाना किस प्रकार पार्टी के हित में होगा यह समझना कठिन है.

अभी तो भ्रष्टाचार के आरोपों को झेल रहे बिंदल ने ही त्यागपत्र दिया है, इसके बाद कितनों के त्यागपत्र होने वाले हैं. इस वर्षांत तक होनेवाले चुनावों तक कांग्रेस की सर-फुट्टवल भी समाप्त हो जायेगी और हिमाचल लोकहित पार्टी भी और संगठित रूप से धूमल सरकार पर अपने हमले तेज करेगी. ऐसी स्थित में प्रदेश के होने वाले चुनावों के नतीजे क्या होंगे यह पूर्वानुमान बहुत ही सरलता से लगाया जा सकता है. संगठन को व्यक्तियों से अधिक महत्वपूर्ण मानने के सिद्धांत पर कार्य करने वाली भाजपा आज प्रदेश में केवल एक व्यक्ति को महत्व देकर क्या लक्ष्य की प्राप्ति करने में सफल हो सकेगी? प्रदेश के जमीनी नेताओं को एक-एक करके दरकिनार करने के यह आत्मघाती कदम कहीं उसके तख़्त को ताबूत में तो नहीं बदल देंगे? इसका चिंतन उसे अवश्य ही करना होगा.

लेखक विनायक शर्मा हिमाचल से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

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