: भू माफियाओं के हवाले पश्चिम बंगाल का यह शहर : सिलीगुड़ी : राजनीति में समाजविरोधी तत्वों का वर्चस्व कोई नयी बात नहीं है। वह दल ही क्या, जिसमें लंपट-लुटेरे न हों। गुंडे-बदमाश न हों। लैंड माफिया न हों। कालाबाजारी न हों। बलात्कारी व हत्यारे न हों। जिस दल में ये तत्व जितने अधिक होंगे, जाहिर है वह दल उतना ही अधिक फले-फूलेगा। लोगों में उसका रुतबा बढ़ेगा। सफेदपोश नेता इस बात को जानते हैं कि दल के सामयिक लाभ व विस्तार के लिए यह ज़रूरी है। समाजविरोधी तत्वों को पार्टी में जगह व अवसर उपलब्ध कराने में भ्रष्ट नेताओं की विशेष भूमिका होती है। माफियाओं से भी उन्हें परहेज नहीं होती। दरअसल उन्हें समस्या अच्छे लोगों को लेकर होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारी लोकसभा व विधान सभाओं में ये तत्व आज अपनी अकड़ नहीं दिखाते। अपने विरोधियों को धमकाने, दबाने व लोगों में आतंक पैदा करने के लिए भ्रष्ट नेताओं को इन तत्वों की ज़रूरत पड़ती है।
दरअसल ये तत्व बड़े काम के होते हैं। पार्टी फंड के लिए ये धन जुटाने से लेकर सारे अवैध कामों को बखूबी अंजाम देते हैं। समय-समय पर आतंक पैदा कर अपनी आसुरी शक्ति का लोगों को एहसास भी कराते रहते। लूटपाट, तोड़फोड़, आगजनी, हत्या-अपहरण व अवैध वसूली जैसी घटनाओं को अंजाम देते रहना इनके रूटीन वर्क में शामिल रहता है। आपने देखा होगा बहुत बार चोर-डाकू भी तो गेरूआ वस्त्र धारण कर अपना हुलिया बदल लेते हैं। थोड़े समय के लिए चोर-डाकू व साधु में एक साधारण आदमी के लिए फ़र्क कर पाना मुश्किल हो जाता है। इतना वक्त मिलना ही उनके लिए पर्याप्त है। अक्सर हम ठगे जाते हैं। समाजविरोधी तत्वों को भी राजनीति व नेताओं की आड़ चाहिए। दरअसल उन्हें भी अपने मुखौटे बदलने पड़ते हैं। उन्हें भी शासन-प्रशासन का सहयोग चाहिए। इसके बगैर उनके लिए एक भी कदम बढ़ा पाना संभव नहीं। एक ओर समाज का डर तो दूसरी ओर कानून के शिकंजे कसने का भय रहता है।
शासन-प्रशासन का संरक्षण व सहयोग मिलने पर फिर तो गीदड़ भी शेर की तरह दहाड़ने लगता है। वह सिर्फ दहाड़ता ही नहीं, बल्कि आम-अवाम को आसानी से अपना शिकार भी बनाता है। यह भी एक अहम वजह है कि थानेदार से लेकर बड़े हुक्मरान तक से उसे संबंध बनाने पड़ते हैं। इनके परस्पर के हित सघन रूप से जुड़े होते हैं। और यही होता है इनके मधुर रिश्ते का आधार भी। गाहे-बगाहे जब कोई ईमानदार व कर्त्तव्यपरायण अधिकारी इनके मार्ग में अड़ जाता है तो फिर उसका वही हश्र होता है जैसा कि मध्यप्रदेश के 3० वर्षीय युवा आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार सिंह का हुआ। भोजपुरी की एक खास कहावत है, चोर-चोर मौसेरा भाई। जाहिर है अपने अनुभव-ज्ञान से श्रमजीवी समाज ने ऐसे मुहावारे रचे होंगे। जीवन से जुड़ा आदमी ही इस बात को समझ सकता है। थानेदार व हुक्मरान भी रिश्ते निभाना खूब जानते हैं। बशर्ते इन्हें बहती गंगा में हाथ साफ करने का अवसर मिलता रहे। इस शहर के कई ऐसे मामलों को हम जानते हैं जिसमें पुलिस ने असली अपराधी की जगह निर्दोष लोगों को जेल की सलाखों के भीतर भेज दिया। ऐसी अनेक घटनाओं का साक्षी हूं।
पश्चिम बंगाल में वामशासन के दौरान हमने ऐसे कई मामले झेले। कुछ साल पहले की एक घटना है। एक प्रतिभावान युवा सामाजिक कार्यकर्ता को एक पुलिस पदाधिकारी ने राजनैतिक दबाव में आकर राष्ट्रद्रोह के मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। हालांकि बाद में पुलिस उसके खिलाफ़ कोई सबूत नहीं जुटा पायी। हम उस पुलिस अधिकारी को बखूबी जानते हैं। कॉलेज में हम साथ रहे। एक ऐसा भी समय था जब हमने उसकी मदद की थी। हम अच्छे मित्र रहे। वह हमसे अक्सर आदर्श की बात किया करता। भ्रष्टाचार, घूसखोरी व अव्यवस्था पर हमारी घंटों बहसें होतीं। व्यवस्था परिवर्तन का वह दंभ भरता। शुरू से ही उसके प्रति हमारी अच्छी धारणा रही। वह हमसे कहा करता था कि हम पुलिस की नौकरी कभी नहीं करेंगे…। खैर, बाद में उसे पुलिस की नौकरी मिली। हमें खुशी हुई कि कम से कम एक अच्छा इंसान पुलिस में आया। पदाधिकारी बना।
उस व्यक्ति को भी हम पूरी तरह से जानते थे जिसे मेरे मित्र पुलिस अधिकारी ने फर्जी मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। हमें अपने मित्र से ऐसी उम्मीद नहीं थी। हमने फोन पर ही अपनी नाराजगी प्रकट की। एक रोज़ वह गेरुआ चोग़ा पहने हमसे मिलने मेरे मकान पर आया। उसे देखकर हम दंग रह गये। जब उससे पूछा कि तुमने अपनी हुलिया क्यों बदल ली है तो उसने कहा कि दरअसल हम नहीं चाहते कि तुमसे मिलने की ख़बर किसी को हो। उसने लगभग रोते हुए हमसे अपनी सफाई दी। दरअसल हम उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहते थे। हम जानते हैं वह एक अच्छा इंसान है। समाज के लिए वह कुछ करना चाहता है। वह निर्दोष है। दरअसल बात यह है कि कुछ माकपा नेता उससे नाराज हैं। उसे गिरफ्तार करने को लेकर आईजी साहब पर काफी दबाव रहा। तुम नहीं जानते हम सरकार के नौकर हैं। हम वही करते हैं जो सरकार चाहती है। आज से तुम हमें कुत्ता कह कर बुला सकते हो। हमने उसे बचाने की भरसक कोशिश की। लेकिन आईजी व एसपी के अतिरिक्त दबाव के आगे हमने उसे गिरफ्तार किया। …यह कहते-हुए वह इतना भावुक हो गया कि अनायास ही उसके आंसू छलक आये।
जाहिर है शासन-प्रशासन में पहले जो कुछ भी होते रहा है और आज जो हो रहा है उससे हमारी असहमति के कारण हैं। हम कानून के शासन का पक्षधर हैं। सफेदपोश राजनेता, समाजविरोधी व पुलिस-प्रशासन की सांठगांठ की पड़ताल व अनुसंधान में हमने तक़रीबन पचपन बसंत गुजार दिये। समाजविरोधियों व भ्रष्ट नेताओं के संगठित हमले भी हम पर होते रहे हैं। जिन्होंने हम पर हमले किये व करवाये आज उनकी हालत देख कर हमें दया आती है। जाहिर है सफेदपोश राजनेता ऐसे तत्वों को पालते-पोषते व दूध पिलाते हैं जिनसे उन्हें लाभ होता है। जिनसे उन्हें कोई ख़तरा महसूस होता है, उसके खिलाफ़ वे साजिश रचते हैं। इसके बावजूद राजनीति व शासन-प्रशासन में सभी बुरे नहीं होते हैं। अच्छे लोग भी हैं। इस शहर में पीएन साहा को हमने देखा है। नजरूल इस्लाम को देखा है। डीपीसिंह को भी। और भी कई अधिकारियों को। नगर के वर्तमान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अमित पी जवालगी भी ईमानदारी पूर्वक प्रयास कर रहे हैं। अच्छे लोग हमेशा ही अच्छा करना चाहते हैं और अपने स्तर से इसके लिए भरपूर प्रयास भी करते हैं।
यह बात दीगर है कि हमारे समाज में बेइमानों का वर्चस्व कहीं अधिक है। अगर ऐसा नहीं होता तो महानंदा की जमीन की अवैध खरीद-फरोख्त का धंधा चरम पर नहीं होता। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि सिलीगुड़ी नगर निगम के वार्ड नंबर-5 संतोषी नगर के उस पार पश्चिम में तुलसीनगर नामक एक पूरी बस्ती ही महानंदा की जमीन में सफेदपोश नेताओं, समाजविरोधी तत्वों एवं शासन-प्रशासन की मदद से बसा दी गयी। बेसाहारा व गरीबों को कहीं आसरा मिले, इसे लेकर हम कोई सवाल खड़ा नहीं कर रहे। यह अच्छी बात है, इसके लिए प्रयास होना चाहिए। हमारी सघन चिंता इस बात को लेकर है कि जिस महानंदा को बचाने को ले अर्से से जद्दोजेहद चल रहा है, नगर व प्रदेश की राजनीति में जिस विरासत को बचाने को ले निरंतर विमर्श होता रहा है, छी:, उसी महानंदा के विभिन्न घाटों का सौदा धुरंधर-धोखेबाज नेता, चंद गुंडे, मवाली व बदमाश शासन-प्रशासन की मदद से कर रहे हैं….।
सिलीगुड़ी नगर निगम तथा माटीगाड़ा पंचायत के रहते यह कैसे संभव हुआ कि लंपट-लुटरों ने राजनीति की आड़ में खुलेआम महानंदा की जमीन बेच दी? महकमा शासक को क्या इसकी भनक नहीं है? यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि हमारे रीढ़ विहीन जनप्रतिनिधि टुकुर-टुकुर ताकते रहे…। इस शहर और समाज के साथ इतना बड़ा विश्वासघात? इतना बड़ा अक्षम अपराध? फिर भी आप मौन रहे। स्थानीय शासन-प्रशासन की गैरजिम्मेवार भूमिका को हम नज़रंदाज नहीं कर सकते। राज्य की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी से हम जनहित में यह सवाल पूछना चाहते हैं कि हाल के दिनों में महानंदा नदी की तलहटी में बसी अवैध बस्तियों खासकर तुलसीनगर में किसके प्रयास से विद्युत-संयोग मिला। नरेगा के धन का दुरुपयोग कर वहां अवैध रास्तों का निर्माण कैसे हुआ? टोल टैक्स वसूलने का कार्य शासन-प्रशासन का है अथवा राजनैतिक गुंडों का…? राज्य की माननीया मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी, उत्तर बंगाल विकास मामलों के मंत्री गौतम देव, सिलीगुड़ी के विधायक डा. रूद्रनाथ भट्टाचार्य, माटीगाड़ा के विधायक शंकर मालाकार तथा सिलीगुड़ी नगर निगम की माननीया मेयर सुश्री गंगोत्री दत्ता को मालूम है कि राजनैतिक संरक्षण प्राप्त समाजविरोधी संतोषी नगर से बांस-पुल से होकर तुलसी नगर जाने वाले राहगीरों से व्यक्ति प्रति दो रुपये, प्रति स्कूटर व मोटर साइकिल प्रति पांच रुपये टोल टैक्स वसूल रहे हैं?
आपका तिस्ता-हिमालय ने अपने तहकीकात में पाया कि सिर्फ तुलसीनगर में महानंदा नदी की जमीन की खरीद-फरोख्त से सफेदपोश नेताओं ने तक़रीबन 4-5 करोड़ रुपये की आमद की। इस धंधे में सफेदपोश नेता, लंपट-लुटेरे और कुछ अधिकारियों ने खूब पैसे कमाये। सिर्फ इतना ही नहीं अपनी स्थाई आय के कई स्रोत भी उन्होंने वहां विकसित कर लिए हैं, जिस पर अगर तत्काल विराम नहीं लगा तो इलाके के शांति प्रिय लोगों के सामने एक और बड़ी समस्या उठ खड़ी हो सकती है। स्थानीय निवासियों का मानना है कि वार्ड नं. 5 के कांग्रेस के एक दबंग नेता ने अपने सिंडिकेट के माध्यम से महानंदा की ज़मीन की खरीद-फरोख्त की और वह यह काम अब भी कर रहा है। इलाके के नागरिकों ने बताया कि टोल टैक्स वसूलने समेत अवैध गतिविधियों का संचालन उक्त कांग्रेस नेता के ही दिशा निर्देश में हो रहा है। जब हमने इस संबंध में कांग्रेस नेता राजेश यादव से प्रश्न किया तो उन्होंने कहा, ‘ मेरे बारे में यह पूछने की हिम्मत आपकी कैसे हुयी? मेरे बारे में अगर आपने कुछ भी लिखा तो मैं आपकी हत्या कर दूंगा। आप बताइए अभी आप कहां हैं। मैं अपने लोगों को लेकर आ रहा हूं। मैंने कई रिपोर्टर तथा एडीम तक को ठीक कर दिया है, आपको भी ठीक कर दूंगा। हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है…। हम कांग्रेस के नेता हैं। पुलिस को इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह हम पर हाथ डाले।’
दूसरे रोज़ ही हमने इस घटना की लिखित शिकायत प्रधाननगर थाना को कर दी। शहर व समाज की जानकारी के लिए यह बता दूं कि मामले के आईओ श्री तपन दास ने हमसे कहा, ‘आप निश्चिंत होकर अपना काम कीजिए। अगर आपको कुछ हो गया तो फिर हम उस बदमाश को नहीं छोड़ेंगे।’ जिला-पुलिस की सक्रियता का एक मिसाल है। आप समझ सकते हैं, हमारे एफआईआर पर पुलिस उस वक्त कार्रवाई करेगी जब राजेश यादव द्बारा मेरी
हत्या कर दी जायेगी। ज्ञातव्य है कि राजेश यादव पर अनेक संगीन मामले विभिन्न थानों में दर्ज़ हैं फिर भी शासन-प्रशासन हिल-डोल नहीं रहा। अंत में अपने शहर व महानंदा के जीवन-स्पंदन को बचाने के लिए जो लोग प्रयत्नशील हैं, उनसे भी मेरा एक सवाल है, ‘क्या आप अपनी विरासत को राजनैतिक भेड़ियों के हवाले करना पसंद करेंगे?…’ खुद अपने बारे में भी यह बता देना चाहते हैं कि खूंखार भेड़ियों से लड़ते हुए हमने पचपन बसंत देखे हैं। अपने इस शहर में हमने राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुंडों को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखा है। हम अपने देश, शहर व समाज के लिए आगे भी लड़ते रहेंगे…। लिखते रहेंगे। इसी विश्वास के साथ…।
लेखक आरपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार तथा सिलीगुड़ी से प्रकाशित तिस्ता हिमालय के संपादक हैं.


