देहरादून। देश का संविधान राज्याधीन सेवाओं में निवास, जन्मस्थान के आधार पर नागरिकों से भेदभाव करने से रोकता है। परन्तु उत्तराखण्ड में अनेकों सरकारी कार्यालय अवैधानिक ढंग से मूल निवासी की शर्त थोपकर संविधान की खुली अवमानना कर रहे हैं। ऐसे ही एक मामले में उत्तराखण्ड सूचना आयोग ने दोषी पर एक माह में कार्रवाई करने का आदेश पारित किया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी रूद्रप्रयाग ने 3 अक्टूबर 2010 को समाचार पत्रों में राष्ट्रीय क्षय नियंत्रण कार्यक्रम के अन्तर्गत 15 हजार नियत मानदेय पर नियुक्ति हेतु विज्ञप्ति प्रकाशित कराई थी, जिससे आवेदक के लिये उत्तराखण्ड के मूल निवासी होने की अनिवार्यता रखी गई थी। आरटीआई मिशन द्वारा इस गैर संवैधानिक शर्त लगाने पर सूचनायें मांगी।
सीएमओ, रूद्रप्रयाग कार्यालय द्वारा अवगत कराया गया कि राज्य क्षय नियंत्रण अधिकारी द्वारा आवेदक के लिये स्थानीय बोली की जानकारी होने की पात्रता रखी गई है, इसी आधार पर मूल निवासी की अनिवार्यता रखी गई है। प्राप्त सूचनाओं से संतुष्ट न होने पर मामला अपील संख्या 7213/2011 पर पंजीकृत होकर राज्य सूचना आयुक्त अनिल शर्मा की अदालत में पहुंचा। आयुक्त ने दोनों पक्षों का तर्क सुनने के बाद फैसला सुनाते हुए माना कि सीएमओ, रूद्रप्रयाग ने अवैधानिक ढंग से मूल निवासी की शर्त लगाई है। आयुक्त ने महानिदेशक, स्वास्थ्य को आदेशित किया है कि एक माह में अवैधानिक शर्त लगाने के दोषी पर कार्रवाई कर आयोग को अवगत कराया जाये तथा अवैधानिक शर्त के आधार पर की गई नियुक्ति पर कानूनी कदम उठाये जाये। मामले की अगली सुनवाई की तिथि 25 अप्रैल तय की गई है।
आरटीआई एक्टिविस्ट सुरेंद अग्रवाल की रिपोर्ट.


