सूबे के नए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो राजनीति के माहिर खिलाड़ी निकले। इनके पिता मुलायम सिंह यादव जो नहीं कर सके वह धड़ल्ले से अखिलेश कर गए। वाह गुरु, वाह। बहुत आगे जाओगे। मुलायम सिंह यादव पहले शिक्षक बन विद्यार्थियों को पढ़ाते-सिखाते रहे। बाद में पहलवानी। धोबी पाट दांव के शौकीन मुलायम अखाड़ेबाजी में दांव-पेंच करते हुए राजनीति के क्षेत्र में भी दांव-पेंच सीखते-सिखाते ‘गुरु’ बन गए। समाजवाद की पगडंडी से चलकर तीसरा मोर्चा के डामर रोड बनाने में जुटे मुलायम सिंह यादव ने होशियारी दिखाई। भाई-भतीजों के साथ बेटे को भी राजनीति के धंधे में सेटल करा दिया। दुकान चल निकली।
फंडा काम आया। अपने जीते-जी बेटे का राजतिलक करा दिया, यह भी ज्यादा बुरा नहीं रहा। इसलिए कि अब तो यह आमधारणा बन चुकी है कि ‘कोउ नृप होय’ कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। कभी उल्टा प्रदेश तो कभी उत्तम प्रदेश, कभी मुलायम सरकार से आजिज आकर हाथी पर चढ़ जाने वाली सूबे की जनता माया राज से खीझकर दुबारा सपा की शरण में चली जाती है। भइया, ऐसे ही चलने वाला है। यहां के लोग अभ्यस्त होने लगे हैं। खैर यह तो बाद की बात है, इधर एक बड़ा लोचा हो गया। जैसा कि जानते हैं, यूपी में विधानसभा का चुनाव हफ्ते भर में सपा के पक्ष में आया।
‘बेरोजगार नौजवानों को हर महीने रोजगार भत्ता देंगे।’ विधानसभा चुनाव में सपा मुखिया ने जब इस तरह का ऐलान किया तब सूबे के लाखों-लाख नौजवानों को लगा कि सत्ता में आने के बाद और चाहे कुछ न मिले पर सपा की सरकार बनी तो इस त्रासदी वाले दौर में कम से दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाएगा। इसका जमकर प्रचार-प्रसार हुआ। डूबते को तिनके का सहारा वाली कहावत चरितार्थ हुई। लाखों-लाख नौजवान सपा की सरकार बनाने में जुट गए। सपाइयों का सपना साकार हुआ सरकार भी बन गई। सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही फितरत हावी होने लगी। माफिया बर्दाश्त नहीं, अरबों रुपए की बर्बादी की प्रतीक हाथियों की मूर्ति को खत्म करने तथा नौजवानों को हर माह बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा छू-मंतर हो गई। डीपी यादव की इंट्री रोकी पर निर्दलीय विधायक राजाभैया को पहले ही दिन पाले में शामिल कर कैबिनेट मंत्री बना डाला। ऐलान किया मूर्ति-पार्कों से छेड़खानी नहीं होगी।
तीसरा जो महत्वपूर्ण मुद्दा है, वह यह कि पैंतीस साल से ज्यादा उम्र के लोगों को ही बेरोजगारी भत्ता मिलने की बात सुन नौजवानों के चेहरे की खुशी गायब हो चुकी है। सत्ता के अखाड़ेबाजों के फितरत भरे दांव का एक बार फिर शिकार हो गया सूबे का नौजवान। अखिलेशजी, हमारे गांव-जंवार में एक कहावत कही जाती है, ज्यादा चतुर तीन जगह से ‘बूड़ता’ है। पहले पांव से फिर हाथ से, फिर भी बूड़ने का सिलसिला नहीं थमता। अति चतुराई हाथ में लगे मैले को नाक से सूंघने को बाध्य करती है। भाजपा ने राममंदिर मुद्दे में खूब गाल बजाया पर जब मौका आया तो लगे दुनियाभर की बातें छौंकने। जनता जनार्दन तर्कों की लाश नहीं ढोना चाहती। नतीजा सामने। भाजपा रसातल में समा गई। अब गडकरी बनाते रहें चुनाव में पराजय की समीक्षा के लिए अध्ययन समिति। जनता से दांव-पेंच नहीं चलेगा। अखिलेशजी, सीधे-सीधे वही घोषणा करिए जो करना हो। लाख टके का सवाल है कि सूबे के लाखों-लाख नौजवानों के मुरझाए चेहरों पर रौनक आखिर कैसे लौटेगी? किस तरह???
लेखक शिवाशंकर पाण्डेय डेढ़ दशक से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. कई पत्र-पत्रिकाओं में रिपोर्टिंग के अतिरिक्त कई कहानियों व कॉलम का प्रकाशन. दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान में नौकरी के बाद फिलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.


