ओ, पछुआ हवाओं! खुद ही जमीन पर गिर गयी मरी हुई पत्तियों को जिस तरह तुम आसमान में उड़ा ले जाती हो, जिस तरह बादलों को तुम अपने साथ बहा ले जाती हो, उसी तरह मेरे विचारों को भी ले चलो ऊंचे आसमान में और बरसा दो समूचे मानव जगत पर, हृदय-हृदय तक पहुंचा दो। अभी पतझर है तो क्या, बसंत बिल्कुल पास है, जब पूरी धरती नये रंग-बिरंगे चहकते फूलों से लद जायेगी। बदलाव के ज्वार और सौंदर्य से भरी यह उम्मीद केवल पी बी शैली की रचनाओं का स्वर नहीं है, समय के हर टुकड़े में ऐसी बात करने वाले रचनाकार मौजूद रहे हैं। मुक्तिबोध, निराला, अज्ञेय और ऐसे अनेक बड़े कवि अंधेरे और खतरनाक समय में भी उम्मीद का साथ नहीं छोड़ते। मुक्तिबोध अपने विकट और डरावने कालबोध के बावजूद परम अभिव्यक्ति की संभावना के प्रति आश्वस्त दिखते हैं..इसीलिए मैं हर गली में/ और हर सड़क पर/ झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा/ प्रत्येक गतिविधि/ प्रत्येक चरित्र/ व हर एक आत्मा का इतिहास/हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति/ प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श/ विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति/ खोजता हूँ पठार…पहाड़…समुन्दर/ जहाँ मिल सके मुझे/मेरी वह खोयी हुई/ परम अभिव्यक्ति अनिवार/ आत्म-सम्भवा।
परंतु यह परम अभिव्यक्ति आत्मसंभवा है। यह आत्म केवल बुद्धि या केवल हृदय नहीं हो सकता। अपने आस-पास की चीजों को सामान्य तरीके से देखना बहुत आसान है। अधिकांश लोग इसी तरह से देखते हैं। उनके लिए प्रकृति में, समाज में और राजनीति में होने वाले परिवर्तन कभी मामूली खुशी या कभी मामूली दुख के साथ खत्म हो जाते हैं। जो शब्द के अर्थों से, उनकी व्यंजकता से, उनकी गहराई से अनजान हैं, जो उनके विलक्षण प्रयोगों के बारे में नहीं जानते, वे सब कुछ बिना किसी प्रतिक्रिया के स्वीकार कर लेते हैं। जो बदलते समय के आर-पार देखने की सामर्थ्य नहीं रखते, उनकेलिए कोई भी सकारात्मक या नकारात्मक बदलाव सिर्फ उनकी जड़ निजता के प्रतिकूल या अनुकूल हो सकता है। वे इससे ज्यादा न तो अनुभव कर सकते हैं, न ही सोच सकते हैं। पर एक कवि हर क्षण को संकीर्ण निजता से बाहर खड़ा होकर देखता है। अगर उसकी कोई निजता होती भी है तो वह सामाजिक होती है। पूरे समाज के संदर्भ में वह हर परिस्थिति को, हर परिवर्तन को देखता है। अगर वक्त कहीं ठहरा हुआ सा है तो उसके भीतर, उसके अतल की हलचल को भी वही पहचान सकता है जिसकी कोई निजता न हो। यहां दृष्टि की निजता की बात नहीं की जा रही है, निजता जो किसी लाभालाभ के आग्रह से भरी हो, जो अपनी एक परिधि निर्मित कर चुकी हो, जो आंखों पर एक कुहासे की तरह छायी हुई हो और किसी भी सुंदर-असुंदर दृश्य या घटना को उसकी सचाई में देखने से रोकती हो, वह वाकई खतरनाक ही नहीं होती बल्कि आदमी को बौना भी बना देती है।
दृष्टि की निजता तो बहुत जरूरी है। यही एक आदमी को दूसरे से अलग करती है। यही किसी को मुक्तिबोध बनाती है तो किसी को निराला। हर आँख अपनी अलग भेदक शक्ति से लैस होती है। घटनाएं बिल्कुल ठोस पथरीले तरीके से सामने आती हैं और गुम हो जाती हैं। अक्सर बड़ी-बड़ी घटनाओं-दुर्घटनाओं पर भी हमारा समाज या हममें से ज्यादातर लोग कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते। कई बार शोर सुनायी पड़ता है लेकिन वह कहीं और लक्षित होता है, उसका उस समाज से कोई मतलब नहीं होता जो उन घटनाओं-दुर्घटनाओं से प्रभावित हो रहा है। ऐसे हो-हल्लावादियों की प्रतिबद्धता स्वार्थ के अलावा कोई और नहीं होती। आजकल हमारी राजनीति में ये दृश्य आम हो चले हैं। कलावती पर खूब हल्ला होता है लेकिन उसकी तकदीर नहीं बदलती। महंगाई, रोटी, भुखमरी, अभाव, अराजकता, अपराध और भ्रष्टाचार पर पर करोड़ों रुपये की बहस होती है, पर जो भूखे हैं, उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता, जो अभावग्रस्त हैं, उनकी वैसे ही जीने को मजबूरी खत्म नहीं होती, जिनके पास रोटी का इंतजाम नहीं है, वे फुटपाथों पर दम तोड़ते रहते हैं, भ्रष्टाचारी अपने कुत्ते-बिल्लियों के नाम बैंकों में धन जमा करते रहते हैं। कभी-कभी कुछ प्रतिगामी, उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी ताकतें बहुत ही नियोजित ढंग से चेहरे बदलकर हमारे मन में चुपचाप दाखिल हो जाती हैं, इतने आहिस्ते से कि हमें पता ही नहीं चलता। रचनाकार हल्ला नहीं मचाता, वह सब कुछ देखता है और जब अकेले अपने भीतर की चिंतन गुफा में झांकता है तो समाज को प्रभावित करने वाली उन घटनाओं, खामोश हमलों और उनसे पीडि़त होने वालों के दर्द को बहुत साफ देख लेता है, उनके कारणों और उनके भविष्य तक पहुंचने में उसे मुश्किल नहीं होती। यह उसकी भेदक और समर्थ दृष्टि के कारण ही संभव हो पाता है।
यह दृष्टि अनात्म नहीं होती। इसका उत्स वही आत्म है, जो रचनाकार को उसकी वैयक्तिक चेतना के वैराट्य तक ले जाता है। वह वैराट्य स्वयं प्रकृति ही है। समूची प्रकृति में निरंतर विनाश और रचना का क्रम चलता रहता है। तोडऩे और रचने का क्रम जारी रहता है। कह सकते हैं कि समूची प्रकृति एक अनंत गर्भ की तरह है, जिसमें असंख्य अनगिन बीज उड़ते रहते हैं, अपनी समूची सत्ता के साथ। जंगल, नदी, पहाड़, झरने, फूल अपनी अचिंत्य ऊर्जा से भरपूर, कहीं से भी फूट पड़ते हैं, धरती को चीरकर कहीं भी झरझरझर बह उठते हैं, उभरते हैं और आसमान छू लेने के लिए बढ़ जाते हैं, जमीन पर गिरते हैं और धूप-हवा मिलते ही खूबसूरत कोंपल के रूप में सतह के ऊपर निकल आते हैं, कहीं भी सगंध खिल जाते हैं। बहुरंग, बह्वाकार, अबाध। यह प्रकृति किसके लिए प्रेरणास्पद नहीं होगी, कौन इसकी अनाविल असीम सत्ता को, इसके अजस्र स्नेह को महसूस नहीं करता होगा। शायद रचनाकार को रचते समय अपने वैराट्य का अनुभव न होता हो, उसे पता न चल पाता हो कि वह प्रकृति की तरह ही एक गर्भ में बदल गया है, एक ऐसा गर्भ, जहां वर्तमान का बीज है, अतीत के संश्लेष से उपजा समकाल है और भविष्य पर पडऩे वाली उसकी अज्ञात छाया है। यहां तक कवि बीज के खोल में बंद विराट संभावना के बावजूद अंधेरे में रहता है, झिलमिलाती छाया धुंधली और अस्पष्ट रहती है। इसीलिए रचना को किसी दिशा में ले जाना रचनाकार के वश में नहीं होता, वह खुद अपनी दिशा बनाती है। रचना आगे वढ़ती है तो भविष्य के भीतर छिपी वह प्रेत छाया भी अंधेरे से बाहर आती है, उसे आना पड़ता है।
यह वही आत्मसंभवा है, जो किसी भी रचनाकार को समर्थ बनाती है, युगांतरकारी बनाती है। पर सच है कि यह सबके लिए संभव नहीं हो सकता।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


