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उत्‍तराखंड में एडवेंचर बन गया है गंगा को बचाने का नाटक, स्‍थानीय लोग परेशान

सदियों से हिमालय के पर्यावरण की रक्षा करने वालों पर देश की राजधानी दिल्ली के नीति निर्धारकों के चाबुक चल रहे हैं. बची-खुची कसर महानगरों के आलीशान कमरों में बैठे कुछ फ्लाप गैर सरकारी संगठन तथा नेता अपने को चमकाने व पिकनिक मनाने के लिए हिमालय में जाते हैं और पर्यावरण के नाम पर वहां के गरीब लोगों पर चाबुक ठोंककर आ जाते हैं. गत गिनों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के सामने यमुना घाटी का एक किसान इसलिए फूट-फूटकर रो पड़ा क्योंकि उसके परिवार की जीविका का एकमात्र जरिया उसकी दुधारू गाय को घर के पास ही बाघ मार गया था और बेचारा किसान तय सरकारी मुआवजे (जो गाय की वास्तविक कीमत से बेहद कम होता है) के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा था. ऐसे एक नहीं उत्तराखंड के गांवों में हजारों लोग भटक रहे हैं.

सदियों से हिमालय के पर्यावरण की रक्षा करने वालों पर देश की राजधानी दिल्ली के नीति निर्धारकों के चाबुक चल रहे हैं. बची-खुची कसर महानगरों के आलीशान कमरों में बैठे कुछ फ्लाप गैर सरकारी संगठन तथा नेता अपने को चमकाने व पिकनिक मनाने के लिए हिमालय में जाते हैं और पर्यावरण के नाम पर वहां के गरीब लोगों पर चाबुक ठोंककर आ जाते हैं. गत गिनों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के सामने यमुना घाटी का एक किसान इसलिए फूट-फूटकर रो पड़ा क्योंकि उसके परिवार की जीविका का एकमात्र जरिया उसकी दुधारू गाय को घर के पास ही बाघ मार गया था और बेचारा किसान तय सरकारी मुआवजे (जो गाय की वास्तविक कीमत से बेहद कम होता है) के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा था. ऐसे एक नहीं उत्तराखंड के गांवों में हजारों लोग भटक रहे हैं.

बाघ द्वारा बच्चे को मार देने पर भी उसके गरीब मां-बाप से बड़े ही शर्मनाक सवाल किये जाते हैं और उस गरीब को अपने बच्चे का मुआवजा पाने के लिए बाघ को मुजरिम ठहराने के लिए तरह-तरह के पापड बेलने पड़ते हैं. आजादी के पूर्व टेहरी राजशाही में लोग जंगलों को आग से बचाते थे जिसके एवज में लोगों को जंगल से निशुल्क पेड़ दिए जाते थे ताकि वे अपने घर बना सके और उनके घर का चूल्हा जल सके. आजाद भारत की सरकार ने यह सुविधा बंद कर दी जिससे आम ग्रामीण भी जंगलों के प्रति लापरवाह हो गया है, जिससे हर साल खरबों की वन संपदा जलकर नष्ट हो रही है और इससे उठने वाली करोड़ों टन जहरीली कार्बन गैस वातावरण को दूषित कर रहीं हैं. जब भी दिल्ली में गंगा को बचाने की बात होती है तभी कोई न कोई तथाकथित पर्यावरणवेत्ता चाबुक लेकर उत्तराखंड की ओर दौड़ पड़ता है और गंगा को बचाने के नाम पर स्थानीय लोगों पर चाबुक चलाकर आ जाता है.

पिछले दिनों  बीजेपी नेता उमा भारती गंगा को अविरल बहने देने के लिए हरिद्वार में धरने पर बैठ गई. वह गंगा के घाट पर भूखी नहीं बैठी बल्कि ताजे फलों का भोग लेती रही और बच्चों के साथ खेलती रहीं. पर उनके इस अभियान से दिल्ली हिली और उनके कहने पर श्रीनगर में निर्माणाधीन विद्युत प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया. कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने उसे वार्ता के लिए निमंत्रण भेज दिया जिससे यह अखबारों की सुर्खियाँ बनी. इसी दिन उत्तरकाशी जिले के दर्जनों महिला संगठनों तथा स्थानीय गैर सामाजिक संगठनों ने विकासखंड नौगाँव में एक बैठक कर निर्णय लिया कि वे खुद ही न सिर्फ गंगा-यमुना के उदगम स्थलों के जंगलों को आग से बचायेंगे बल्कि काफी कम पैसे में इस क्षेत्र में सफलता से वृक्षों का रोपण भी करेंगे… पर यह खबर यहाँ के अखबारों में सिंगल कालम भी नहीं छपी.

उमा भारती जैसे पर्यावरण के प्रहरियों को हरिद्वार व ऋषिकेश सहित गंगा के किनारे पर बसे सैकड़ों आलीशान आश्रमों की सुध नहीं है, जिनका हजारों टन मलमूत्र बिना ट्रीट किये सीधे गंगा में प्रवाहित हो रहा है. गंगा के नाम पर व्‍यापार करने वाले संतों का ये हाल है तो औरों क्या हाल होगा. दो वर्ष पूर्व डॉ. जीडी अग्रवाल नाम का पर्यावरण का एक खलीफा उत्तरकाशी आया और यहाँ गंगा को स्वच्छ बनाये रखने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ गया. उसने ऐसा हौव्‍वा खडा कर दिया कि वे आरएसएस के बड़े निक्करधारियों में से एक हैं, उसका यह फरेब चल निकला और विशाल मूंछ्धारी मेजर जनरल व मुख्यमंत्री की कुर्सी वाले भुवन चन्द्र खंडूरी भी अग्रवाल के चरणों में नतमस्तक हो गये. उसने विजेता की तरह हरिद्वार होते हुए दिल्ली की ओर अपना अनसनी कूच किया और केंद्र सरकार को भी घुटनों पर ला घेरा.

उनके कारण ६०० मेगावाट की लोहारी- नागपाला जल विद्युत परियोजना बंद कर दी गई, जिस पर सरकारी उपक्रम ऍनटीपीसी ६५० करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च कर चुका था. अब पर्यावरणविदों को भय है कि अब खाली कच्ची सुरंगें पर्यावरण तथा स्थानीय गांवों के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं. इसलिए अब वक्त आ गया है जब स्थानीय लोगों को अपने पर्यावरण के प्रति खुद ही सचेत हो जाना चाहिए तथा जिस प्रकार हमारे पूर्वजों ने जल तथा जंगलों की सुरक्षा की, हमें भी वैसे ही करनी होगी, नहीं तो बाहर से आने वाले तथाकथित पर्यावरणीय आतंकी पर्यावरण के नाम पर हमें तथा हमारे गांवों को बंधक बना लेंगे और तब हमारे पास घर छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा.

लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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