: आदिम अभिव्यक्ति है रोना, आँसू इसकी भाषा : बच्चा जब दुनिया में पहली बार आंखें खोलता है, रोता है। माँ केगर्भ में उसे एक विशाल शून्य का अहसास होता है। एक चमकता हुआ अँधेरा। उसकी नसों में जीवन प्रवाहित होता रहता है, वह प्रतिक्रियाएं भी करता है पर वे शरीर तक सीमित होती हैं। चेहरे पर एक सहज तरलता बनी रहती है। पर बाहर आते ही वह विराट शून्य खो जाता है, वह स्नेहसिक्त तरलता गुम हो जाती है, वह रो पड़ता है। न जाने कहाँ आ गये, शायद उसकेमन में ऐसा कुछ खयाल आता हो। रोना मनुष्य की किसी भी तरह की पहली अभिव्यक्ति है। यूं तो वह गाता भी है, हँसता भी है, चिल्लाता भी है, गुर्राता भी है लेकिन यह सब उसका सीखा हुआ होता है। केवल रोना सहज होता है। वह बिना सिखाये रोता है। रोने के लिए चीखना जरूरी नहीं। दर्द में चीख होती है, दर्द के रोने में आवाज होती है, कभी-कभी चीख भी लेकिन खुशी का रोना सिर्फ आंसुओं की भाषा में होता है। रोने की मूक भाषा है आँसू। मनुष्य खुशी में रोता है, पीड़ा में रोता है, आश्चर्य में भी आंखों में आँसू निकल आते हैं। अगर आँसू न हों तो शायद जीवन मुश्किल हो जाये। कई बार लगातार दर्द से आँसू सूख भी जाते हैं, निकलते ही नहीं। रोने से दर्द कम हो जाता है पर दर्द बेइंतहा हो जाये तो वह रोने नहीं देता।
रोने का हँसने से गहरा रिश्ता है। बल्कि रोने में ही हँसने के बीज छिपे होते हैं। चरम आवेग में दोनों की भाषा एक ही होती है। आंसू। हँसी भी कई तरह की होती है। किसी विचित्रता या बेवकूफी के कारण आप किसी पर हँस सकते हैं। कोई अनचाही अनुकूलता या किसी बहुत करीबी के अचानक बहुत दिनों बाद मिलने पर, किसी अप्रत्याशित सफलता पर भी आप हँस सकते हैं। यह आत्ममुग्धता की हँसी होती है। कभी-कभी बड़ी कुटिलता भी होती है हँसी में। आप का कोई दाँव कामयाब हो रहा हो और जो शिकार हो, उसे समझ में न आ रहा हो तो भी आप हँसते हैं, एक जटिल और कुटिल मुस्कान के साथ पेश आते हैं। मगर मन के भीतर किसी गहरी खुशी या प्रसन्नता के कारण अधर जिस सहजता से फैलते हैं, वह एक अलग तरह की अभिव्यक्ति होती है। वैसी आह्लादमयी हँसी के साथ आंखों में आँसू भी छलक पड़ते हैं। ये आँसू कोरों से ढुलकते हैं। आँखें नम होती हैं, भर आती हैं और समूचा हृदय ही पिघलकर मोती की तरह टपक पड़ता है। दर्द के आँसू इस तरह नहीं टपकते, वे बहते हैं, बढिय़ायी नदी के पानी की तरह। जैसे पूरी आँख ही पिघल रही हो, जैसे सब-कुछ पिघल जाना चाहता हो, समूची देह-सत्ता ही बह जाना चाहती हो आँखों से होकर।
लेकिन खुशी का उत्स तो दर्द ही है न। दर्द न हो तो आदमी खुशी का मतलब ही न समझ पाये। प्रिय इन नयनों का अश्रु नीर, दुख से आविल, सुख से पंकिल…बहता है युग-युग से अधीर। महादेवी ने वही कहा जो आदमी की रचना के मूल में हैं, उसके स्वभाव में है। युगों से सुख में और दुख में नयनों से नीर बहता आया है, बहता रहेगा। लेकिन इसमें दुख का महत्व ज्यादा है। जैसे अँधेरे का महत्व ज्यादा है। अँधेरा न जान सके तो उजाले की अलौकिकता समझ में ही नहीं आयेगी। असत्य भी अपनी सत्ता में है। वह क्यों होना चाहिए, यह प्रश्र महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन असत कभी नहीं रहा, कभी नहीं रहेगा, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। असत का निषेध किया जा सकता है लेकिन उसे मिटाना संभव नहीं है। उसी के नाते सत्य की चमक है। तभी तो हमारे पुरखे कह पाते हैं, असतो मा सद्गमय। यह द्वंद्व ही दुनिया को गतिशील बनाये रखता है। राग-द्वेष, अंधकार-प्रकाश, हर्ष-विषाद, सुख-दुख का द्वंद्व ही मनुष्य को गतिशील रखता है। दुख इसलिए श्लाघ्य है कि उसके बाद ही सुख के महत्व का पता चलता है। दुख केबाद सुख मुग्ध करता है पर सुख के बाद दुख की मारकता असह्य होती है। संत कवि लगातार दुख की कामना इसीलिए करते हैं क्योंकि सुख तो सुला देता है पर दुख जगाये रखता है। यह दुख ही उनका सुख होता है। सुखिया सब संसार है, दुखिया दास कबीर। कबीर के लिए दुख और सुख से तटस्थ हो जाना ही जीवन है।
यह दुख ही, यह पीड़ा ही कहीं न कहीं कविता का भी उत्स है। वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान। गांवों में अब भी महिलाएं सुख के अवसरों पर तो गाती ही हैं, दुख में भी गाते हुए ही रोती हैं। यह अजब है लेकिन यही सच है कि प्रबल भावनात्मक दबाव संगीत को, गान को और कविता को भी जन्म देता है। अब भले ही कविता ने अपने होने की प्रक्रिया बदल ली हो लेकिन यह कोई नहीं कह सकता कि कविता केवल बुद्धि और तर्क से रची जाती है। एक आकुलता, एक बेचैनी, एक तड़प रहती जरूर है, किसी कोने में, जो कवि को बहाती हुई ले जाती है, अपने साथ। इसे आह न कहें तो न कहें, क्या फर्क पड़ता है, पर आह से कविता मुक्ति कैसे पा सकती है। दर्द का और आंसुओं का कविता से बड़ा गहरा रिश्ता रहा है। मस्तिष्क में जब भी घनीभूत पीड़ा छायी रहती है, दुर्दिन में वह बरसे बगैर नहीं रह सकती। जयशंकर प्रसाद और महादेवी के काव्य में आँसू और दर्द को पढ़ा जा सकता है। संत कवियों के विरह में, प्रिय से मिलन की अकाट्य चाह में दर्द की पराकाष्ठा देखी जा सकती है। अपनी ही चेतना की पहचान से दूर खड़े कवि को उसमें स्थित होने की बेचैनी बहुत तड़पाती है। मीरा की दीवानगी हो या कबीर का विरह, जैसे सब कुछ फटता सा लगता है। दर्द का हद से गुजर जाना, दवा हो जाना, यहाँ भी सटीक बैठता है। जब दर्द ही रह जाता है, तब प्रिय से मिलन का क्षण आ जाता है। पर यह भी यूं ही नहीं होता। छटपटाना पड़ता है, रोना पड़ता है, आँसू बहाने पड़ते हैं। श्याम सुंदर के विरह वियोग में मधुकुंज अगर खड़े-खड़े जल नहीं जायें, तो उन पर लानत। विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाढ़े क्यों न जरे। असल में जीवन ही विक्षोभ के एक पल की उपज है, इसलिए यहां दर्द को, दुख को, आँसू को ज्यादा जगह मिली है। जो इन्हें समझता है, वही जीवन को भी समझ सकता है, वहीं दूसरों की पीड़ा को भी समझ सकता है, वही मनुष्य होने
की सामर्थ्य हासिल कर सकता है। जाके पाँव फटी न विवाई, सो क्या जाने पीर पराई।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


