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बनारस का पहला दो दिसवसीय फिल्‍म फेस्टिवल 31 मार्च से

वाराणसी। सिनेमा सिर्फ एक मनोरंजन का माध्यम भर है या फिर इसकी अपनी कोई सामाजिक जिम्मेदारी भी है बाजार के दौर में ये सवाल आज और भी मौजूं हो जाता है। ऐसे में जब आज का सिनेमा दर्शकों के लिए एक बाजार तैयार करने के अलावा कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहा है। और दर्शक मूक दर्शक बना बाजार के तमाशे का हिस्सा बनता जा रहा है तो प्रेमचन्द की वो बात याद आ जाती है कि नियंत्रण विहीन सिनेमा समाज के लिए खतरनाक है। कला के चाहने वालों के लिए हमेशा ये सवाल रहा कि कला का सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग का रास्ता क्या हो? दौर चाहे जो भी वो सिनेमा को आम आदमी की चेतना को विस्तार का माध्यम मानने वाले निर्देशकों की कमी नहीं है। सिनेमा लोगों के लिए एक बेहतर कला की उम्मीद को जगाए रखे इसका प्रयास जारी है। 

वाराणसी। सिनेमा सिर्फ एक मनोरंजन का माध्यम भर है या फिर इसकी अपनी कोई सामाजिक जिम्मेदारी भी है बाजार के दौर में ये सवाल आज और भी मौजूं हो जाता है। ऐसे में जब आज का सिनेमा दर्शकों के लिए एक बाजार तैयार करने के अलावा कुछ ज्यादा नहीं कर पा रहा है। और दर्शक मूक दर्शक बना बाजार के तमाशे का हिस्सा बनता जा रहा है तो प्रेमचन्द की वो बात याद आ जाती है कि नियंत्रण विहीन सिनेमा समाज के लिए खतरनाक है। कला के चाहने वालों के लिए हमेशा ये सवाल रहा कि कला का सर्वश्रेष्‍ठ उपयोग का रास्ता क्या हो? दौर चाहे जो भी वो सिनेमा को आम आदमी की चेतना को विस्तार का माध्यम मानने वाले निर्देशकों की कमी नहीं है। सिनेमा लोगों के लिए एक बेहतर कला की उम्मीद को जगाए रखे इसका प्रयास जारी है। 

जन संस्कृति मंच और बनारस फिल्म सोसायटी द्वारा आगामी 31 मार्च से 1 अप्रैल तक दो दिवसीय प्रथम बनारस फिल्म फेस्टिवल का आयोजन अस्सी स्थित छोटा नागपुर वाटिका में किया गया है। फेस्टिवल की शुरुआत जेएनयू के छात्रनेता शहीद चन्द्रषेखर के संघर्ष को सलाम करते हुए अजय भारद्वाज की फिल्म एक मिनट का मौन से की जाएगी। दो दिनी इस फेस्टिवल में देश-विदेश की कुल 16 फिल्में दिखायी जाएगी। इनमें से प्रमुख – विकास बंदूक की नाल से, स्पेनिश फिल्म द मैसेन्जर, लेटस गो टू रेवोल्यूशन, दाएं या बाएं आफ साइड और सत्यजीत राय की मशहूर फिल्म अपराजिता दिखाई जाएगी। इसके अलावा फेस्टिवल में देश-विदेश से आए फिल्मकारों से दर्शकों को बाचतीत का मौका भी मिलेगा। कुल मिलकार यह आयोजन एक कोशिश होगी लम्बे समय से सांस्कृतिक नगरी के ठहरे हुए परिवेश में हलचल लाने की।

वाराणसी से भास्‍कर गुहा नियोगी और रुद्रानंद तिवारी की रिपोर्ट.

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