हुजूर अब तो मंदिर बनाने की तारीख बता दो!

विश्व हिन्दू परिषद् के वरिष्ठ नेता अशोक सिंघल नहीं रहे… गुडग़ांव के मेदांता अस्पताल में पिछले दिनों भर्ती 89 साल के श्री सिंघल का कल यानि 17 नवंबर को निधन हो गया। यह तो जगजाहिर है कि श्री सिंघल अयोध्या के राम मंदिर आंदोलन से ना सिर्फ जुड़े रहे, बल्कि उनका अंतिम सपना भी यही था कि मंदिर बन जाए। अभी जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह उनसे अस्पताल में मिलने पहुंचे थे तब भी आईसीयू में भर्ती श्री सिंघल ने दो टूक कहा था कि मैं ठीक हूं और जल्दी ही भला-चंगा हो जाऊंगा, क्योंकि अभी मुझे राम मंदिर बनाना है और उसके बिना मैं मरूंगा नहीं… हालांकि नियति को कुछ और मंजूर था और वे राम मंदिर का सपना लिए ही गुजर गए।

प्रधानमंत्री से लेकर तमाम भाजपा, संघ, विहिप और अन्य संगठनों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी और इसके साथ ही राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर सामने आ खड़ा हुआ है। भाजपा के ही राष्ट्रीय महासचिव और मध्यप्रदेश सरकार में लम्बे समय तक काबिना मंत्री रहे कैलाश विजयवर्गीय ने भी फेसबुक पर श्री सिंघल को श्रद्धांजलि देते हुए राम मंदिर निर्माण की बात कही है। अब सवाल यह है कि भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता पाने के लिए राम मंदिर का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। इसके साथ ही कश्मीर से धारा 370 हटाने और समान नागरिक संहिता की बात भी कही थी, लेकिन अब केन्द्र में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना लेने के बावजूद भाजपा राम मंदिर सहित इन तीनों अपने मूलभूत मुद्दों पर बात करने से ही कतराती रही है। बीच-बीच में जब उसके सहयोगी संगठन इन मुद्दों को छेड़ते हैं तो भाजपा के तमाम मंत्रियों से लेकर पदाधिकारी सिर्फ यही कहते हैं कि संविधान के मुताबिक ही निर्णय लिया जाएगा।

कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात तो लगभग भाजपा भूल ही चुकी है और वहां पर अपनी साझेदारी में सरकार जरूर बना ली। कल तक तो धारा 370 हर हाल में हटाने की बात भाजपा और उसके सहयोगी दल करते रहे, मगर अब सत्ता में आते ही संविधान और कायदे-कानूनों की दुहाई देने लगे। यही स्थिति राम मंदिर निर्माण की भी है। हर चुनाव में भाजपा का यह प्रमुख मुद्दा और नारा रहा है और इस बार तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने केन्द्र में स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई। देश की जनता को भाजपा और अन्य संगठनों के वे नारे अभी भी बखूबी याद हैं जो लगातार गुंजाय जाते रहे कि कसम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे… उस वक्त यह भी डंके की चोट पर कहा जाता रहा कि कोई भी अदालत यह तय नहीं कर सकती कि भगवान राम का जन्म कहां हुआ? यह तो करोड़ों करोड़ हिन्दुओं की आस्था का मामला है और भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या में ही भव्य राम मंदिर बनेगा और इसके लिए एक बार नहीं हजार बार भी सरकार की कुर्बानी देना पड़े तो भी कम है।

मुझे एक भी भाजपा या उससे जुड़े संगठनों के नेताओं-कार्यकर्ताओं का बयान याद नहीं है जो सत्ता में आने के पहले इस तरह से दिया गया हो कि अदालत का आदेश आने दीजिए और संविधान के मुताबिक ही मंदिर का निर्माण किया जाएगा। जब इलाहाबाद हाईकोर्ट से फैसला आया तब भी उसे इन राम भक्तों ने स्वीकार नहीं किया था और फिर उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में ही लम्बित है, लेकिन जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी शहाबानों के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संसद के जरिए पलट सकते हैं तो फिर आज भाजपा राम मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट आदेश की प्रतिक्षा किस आधार पर कर रही है, जबकि वह कल तक इसे अदालती नहीं बल्कि आस्था का मामला मानती रही। क्यों भाजपा बहुमत के आधार पर राम मंदिर निर्माण का निर्णय अब नहीं लेती..?

जब वह भूमि अधिग्रहण या जीएसटी जैसे कानूनों को राज्यसभा में बहुमत ना होने के बावजूद लोकसभा के जरिए मंजूर करती है ठीक उसी तरह राम मंदिर को लेकर अध्यादेश क्यों नहीं लाती..? कम से कम अब अशोक सिंघल का सपना भाजपा और उससे जुड़े संगठन पूरा करें यही उन्हें असली और सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी… या फिर कह दे कि राम मंदिर निर्माण की बात भी चुनावी जुमला थी… श्री सिंघल को मुखाग्नि दिए जाने के वक्त भी जय श्री राम के नारे लगाए गए और विहिप के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि उनकी याद में अयोध्या में विशाल राम मंदिर बनना चाहिए और यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। विहिप के नेता प्रवीण तोगडिय़ा का भी यही कहना है कि हिन्दू हृदय सम्राट और राम मंदिर आंदोलन के महानायक ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर के दर्शन के बिना ही शरीर छोड़ दिया।

कुल मिलाकर श्री सिंघल तो राम मंदिर का सपना लिए ही चले गए, अब यह सत्ता में बैठी भाजपा की जिम्मेदारी है कि वह अपने वायदे को पूरा करे और राम मंदिर निर्माण को लेकर एक विशेष अध्यादेश लेकर आए। अभी कई भाजपाइयों की ये सफाई होती है कि चूंकि राज्यसभा में उनके पास बहुमत नहीं है लिहाजा वे संसद के दोनों सदनों से अध्यादेश को मंजूर नहीं करवा सकते, मगर यहां पर सवाल यह है कि भूमि अधिग्रहण सहित कई कानून जब भाजपा बिना राज्यसभा में बहुमत हुए ला रही है और उस पर देशव्यापी बहस भी करवा रही है तो राम मंदिर के मुद्दे पर वह इस तरह के तर्क क्यों देती है? उसे कम से कम अपने वायदे के मुताबिक आगे बढऩा चाहिए, भले ही विरोध कितना भी क्यों ना हो। अब देखना यह है कि विहिप सहित तमाम अन्य संगठन श्री सिंघल के निधन के बाद अब राम मंदिर मुद्दे को किस तरह जीवित रख पाते हैं और भाजपा सरकार पर मंदिर निर्माण के लिए कितना दबाव डाल सकेंगे?

लेखक राजेश ज्वेल पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं. सम्पर्क – 098270-20830 Email : jwellrajesh@yahoo.co.in, jwellrajesh66@gmail.com