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औलाद वालों को बेइज्जत मत कीजिये ‘साहेब’!

देश के प्रधानमंत्री धुआंधार बोलते हैं। देश से लेकर विदेश तक उनके भाषणों का डंका पिट रहा है। लेकिन अब वे हदें पार करते जा रहे हैं। सिर्फ तालियां पिटवाने के फेर में वे अब ऐसा भी बोलने लगे हैं जो प्रधानमंत्री के ओहदे को शोभा नहीं देता। राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ बोलते-बोलते अब वे ’’परिवार’’ नाम की संस्था का अपमान करने लगे हैं।  बिहार का चुनाव जीतने की तड़प में साहेब के निशाने पर लालू यादव और उनका कुनबा था। साहेब ने कहा कि – लालू जी पिछली बार बिहार में अपनी बेटी को ’’सेट’’ करना चाहते थे और इस बार बेटों को ’’सेट’’ करना चाहते हैं। यह पहली बार नहीं है कि साहेब ने परिवारवाद पर निशाना साधा है। जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में वे पिता-पुत्र और पिता-पुत्री को गरिया रहे थे। बाद में उन्ही में से एक पिता-पुत्री का बगल बच्चा बन कर साहेब की पार्टी वहां सरकार चला रही है। लोक सभा चुनाव में तो साहेब ने बहुत जोर जोर से कहा था कि उनके आगे पीछे कोई नहीं है, वे किसके लिए भ्रष्टाचार करेंगे?

देश के प्रधानमंत्री धुआंधार बोलते हैं। देश से लेकर विदेश तक उनके भाषणों का डंका पिट रहा है। लेकिन अब वे हदें पार करते जा रहे हैं। सिर्फ तालियां पिटवाने के फेर में वे अब ऐसा भी बोलने लगे हैं जो प्रधानमंत्री के ओहदे को शोभा नहीं देता। राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ बोलते-बोलते अब वे ’’परिवार’’ नाम की संस्था का अपमान करने लगे हैं।  बिहार का चुनाव जीतने की तड़प में साहेब के निशाने पर लालू यादव और उनका कुनबा था। साहेब ने कहा कि – लालू जी पिछली बार बिहार में अपनी बेटी को ’’सेट’’ करना चाहते थे और इस बार बेटों को ’’सेट’’ करना चाहते हैं। यह पहली बार नहीं है कि साहेब ने परिवारवाद पर निशाना साधा है। जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में वे पिता-पुत्र और पिता-पुत्री को गरिया रहे थे। बाद में उन्ही में से एक पिता-पुत्री का बगल बच्चा बन कर साहेब की पार्टी वहां सरकार चला रही है। लोक सभा चुनाव में तो साहेब ने बहुत जोर जोर से कहा था कि उनके आगे पीछे कोई नहीं है, वे किसके लिए भ्रष्टाचार करेंगे?

साहेब से कुछ सवाल पूछने हैं। वैसे वे किसी जरूरी सवाल का जवाब नहीं देते। सिर्फ अपने मन की बात इक तरफा करते हैं। जैसे उन्हें लालू का माइक वाले को डपट देना ’’जुल्म’’ दिखाई दे जाता है, लेकिन फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में मासूम बच्चों का जला कर मार दिया जाना दीखता भी नहीं है। खैर सवाल तो पूछना ही है। साहेब, क्या परिवार नाम की संस्था से जुड़ा होना अपराध है? क्या पति-पत्नी, बाल बच्चे होना गुनाह है? क्या जो अविवाहित या बिना बच्चों वाले हैं, उनका ईमानदार होना शर्तिया गारंटीशुदा है? क्या भारतीयता और हिंदुत्व की किसी व्याख्या में पत्नी को छोड़ देने वाले को ’’महानतम’’ मान लेने का सार छुपा है?

आप विवाहित होकर भी गृहस्थी से दूर रहे, ये आपका निजी फैसला है। हम सबको इसका सम्मान करना चाहिए, करते भी हैं, लेकिन आपको ये हक़ कैसे मिल गया कि आप परिवार जैसी संस्था का ही अपमान करने लगें? आप घर छोड़कर ’’महान’’ हैं तो क्या हम सब भी अपने अपने परिवार से मुंह मोड़ लें? क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप किसी की बेटी या बेटे को कोसते हैं तो औलाद वालों के दिल पर क्या गुज़रती है?

राजकुमार सिद्धार्थ ने भी गृहस्थी छोड़ी और महात्मा गौतम बुद्ध हुए, लेकिन क्या कभी बुद्ध ने परिवार नामक इकाई को इस तरह अपमानित किया? राजकुमार वर्धमान भी घर-गृहस्थी छोड़कर भगवान महावीर बने लेकिन उनके किसी भी उपदेश में परिवार का निषेध नहीं बताया गया।  ज्यादा दूर क्यूं जाते हैं.. अटलबिहारी बाजपेयी को ही देख लीजिये। जब कंधार विमान अपहरण कांड हुआ तब यात्रियों के परिजनों ने नारा लगा दिया था-निपूते {बिना औलाद वाले} क्या जानें औलाद वालों का दर्द? तब अटल जी की आत्मा रो पड़ी थी, वे कई दिन सो नहीं सके थे! अटलजी अविवाहित हैं, लेकिन कभी इस तरह एक शब्द नहीं बोले।

आप अपने विरोधियों के परिवारवाद को निशाने पर लेते हैं, ठीक ही करते हैं, लेकिन क्या कभी अपनी पार्टी के परिवारवाद पर आपकी नज़र नहीं जाती? विजयाराजे सिंधिया की बेटियों वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे, प्रमोद महाजन की बेटी पूनम और गोपीनाथ मुंडे की बेटी पंकजा के लिए तो ‘सेट’ करने जैसा शब्द नहीं ना बोलेंगे आप? बोलना भी नहीं चाहिए। राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, यशवंत सिन्हा, सुन्दरलाल पटवा, कैलाश जोशी, कैलाश सारंग आदि ने अपने कुनबों को कैसे राजनीति में सेट किया है, यह शायद आपको मालूम भी नहीं होगा! अकाली दाल, शिवसेना और पी डी एफ के साथ सरकारें चलाते वक्त आपको ये पता भी नहीं चला कि सुखबीर बादल, उद्धव ठाकरे और महबूबा मुफ़ती आखिर हैं कौन?

हे महामानव, आप कांग्रेस सहित देश की राजनीति से परिवारवाद को मिटा डालिये, हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं, लेकिन मेहरबानी करके परिवार नाम की संस्था में हम सबका विश्वास बना और बचा रहने दीजिये। कम से कम हम साधारण भारतीय तो आज भी अपनी माँ, पत्नी, बेटी, बेटे से प्रेम करते हैं। हमें औलाद वाला होने पर बेइज्जत मत कीजिये साहेब।

लेखक डॉ राकेश पाठक डेटलाइन इंडिया मैग्जीन के प्रधान संपादक हैं.

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