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भाजपा का ‘खस्सीकरण’

भाजपा के चार वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, शांताकुमार और यशवंत सिंहा ने काफी कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया है। बिहार की हार के लिए उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया है लेकिन उन्होंने पूछा है कि किन लोगों ने साल भर से पार्टी का ‘खस्सीकरण’ किया हुआ है? अंग्रेजी का ‘इमेस्क्यूलेशन’ शब्द काफी कठोर और खतरनाक मालूम पड़ता है। शब्दकोश में इसके एक से एक तीखे अर्थ दिए गए हैं। इसीलिए तीन पुराने पार्टी अध्यक्षों ने जो आजकल नरेंद्र मोदी के मंत्री भी हैं, तुरंत बयान जारी किया। उन्होंने भी वही चतुराई दिखाई, जो चार वरिष्ठ नेताओं ने दिखाई।

भाजपा के चार वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, शांताकुमार और यशवंत सिंहा ने काफी कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया है। बिहार की हार के लिए उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया है लेकिन उन्होंने पूछा है कि किन लोगों ने साल भर से पार्टी का ‘खस्सीकरण’ किया हुआ है? अंग्रेजी का ‘इमेस्क्यूलेशन’ शब्द काफी कठोर और खतरनाक मालूम पड़ता है। शब्दकोश में इसके एक से एक तीखे अर्थ दिए गए हैं। इसीलिए तीन पुराने पार्टी अध्यक्षों ने जो आजकल नरेंद्र मोदी के मंत्री भी हैं, तुरंत बयान जारी किया। उन्होंने भी वही चतुराई दिखाई, जो चार वरिष्ठ नेताओं ने दिखाई।

नाम लिये बिना उन्होंने पूछा कि क्या पार्टी पहले भी नहीं हारी थी? किसी नेता-विशेष या ‘गिरोह’ को आप जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं? उन्होंने कहा पार्टी-हार का विश्लेषण जरुर होना चाहिए लेकिन नितीन गडकरी ने बड़ा चालाकी भरा बयान दे डाला। उन्होंने कहा कि पार्टी को बदनाम करनेवाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। इस बयान का अर्थ यह भी हुआ कि जो बिहारी नेता अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं, यह सिर्फ उन्हीं के लिए है। ये तीनों नेता प्रधानमंत्री पद के वैकल्पिक उम्मीदवार हैं। राजनाथसिंह सबसे चतुर निकले। उन्होंने क्या खूब कहा कि किसी भी नेता के खिलाफ कार्रवाई की जरुरत नहीं है। असहमति का सम्मान होना चाहिए। हार के कारणों का पता चले तो पार्टी में कुछ सुधार किए जाएं।

जाहिर है कि भाजपा निरंतर अधोगति को प्राप्त होती जा रही है लेकिन यह कांग्रेस की तरह अभी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी नहीं बनी है। इसीलिए इसमें थोड़े दिन फुलझडि़यां छूटती रहेंगी लेकिन वह फिर उसी ढर्रे पर चल पड़ेगी, जिस पर वह डेढ़ साल से चल रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लोग फिजूल बदनाम कर रहे हैं। उसका हाल भी ‘मार्गदर्शक मंडल’ जैसा ही है याने अटलजी, आडवाणीजी और जोशीजी जैसा ही हो गया है।

देश की लगभग सभी पार्टियों का हाल, कमोबेश, एक-जैसा है। पार्टियों का आंतरिक लोकतंत्र समाप्तप्रायः है। एक ही नेता या उसका छोटा-सा गिरोह सारे फैसले करता है। भाजपा के नेताओं में इतना तेजस्वी कोई नहीं है, जो तथाकथित ‘खस्सीकरण’ के विरुद्ध खांडा खड़का सके। यदि मोदी और शाह चाहें तो वे अभी भी अपना रास्ता सुधार सकते हैं। वे देश की पार्टी-व्यवस्था का लोकतांत्रीकरण कर सकते हैं। भारतीय राजनीति की आज यह सबसे बड़ी चुनौती है। देश के चारों राष्ट्रीय नेताओं से उम्मीद है कि इन दोनों प्रांतीय नेताओं को वे ज़रा उभरने दें। अभी से उनका ‘खस्सीकरण’ ठीक नहीं है।

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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