Tabish Siddiqui : क़ुरआन की पहली आयत नाज़िल होने के बाद क़रीब बारह (12) साल तक पैग़म्बर मुहम्मद ने लोगों को समझाने का काम किया.. बारह साल तक वो लोगों की गालियां खाते रहे.. पत्थर और लकड़ियों से उन पर हमला होता जहाँ भी वो अपनी बात कहते.. ऊंट के मूत्र भरे हुवे मूत्राशय और मलाशय को उन पर फेंका जाता.. लगभग ये रोज़ की बात हो गयी थी बारह सालों तक.. मुहम्मद घर से निकलते और वापस आते तो खून से लहूलुहान होते थे और पेशाब और मल से लथपथ.. और वापस आने पर उनसे पंद्रह साल बड़ी बीबी ख़दीजा उनको अपने गाउन में छुपा लेती थी.. दिलासा देती थीं और साहारा देती थी और उन्हें सत्य पर चलने की प्रेरणा देती थीं.. अंत में बारह साल तक गाली खाने के बाद थक हार कर वो मक्का से मदीना चले गए.
बुद्ध के विचारों से ब्राहम्मण भयभीत तो थे मगर भारत का परिवेश और परंपरा ऐसी थी कि वो चाह कर भी बुद्ध के लिए हिंसक नहीं हो सकते थे.. बुद्ध का विरोध हुवा और बहुत अधिक हुवा मगर वैसा नहीं जैसा मुहम्मद का अरब में हुवा था. अरब का परिवेश और संस्कृति भारत से बहुत अलग थी.. अरब हिंसक थे जबकि भारतीय अधिकतर शांतिप्रिय.. बुद्ध के ऊपर जान का ख़तरा नहीं था जबकि मुहम्मद को पहले ही दिन से सिर्फ अपनी जान ही बचाने के प्रयास करते रहना पड़ा.. और वो भी तब तक जब तक ज़िंदा रहे.. इसीलिए अंत समय तक पैग़म्बर मुहम्मद सिर्फ लड़ते ही रह गए.
भारत का माहौल ऐसा था जहाँ बुद्ध बैठ के ध्यान लगा सके और शान्ति और अहिंसा की बातें कर सके.. अरब का माहौल इस से अलग था.. अरबों की बर्बरता का अंदाज़ा आप इस छोटी सी बात से लगा सकते हैं कि मुहम्मद से युद्ध के बाद युद्ध जीते हुवे लोगों की स्त्रियां संध्या के समय युद्धक्षेत्र में जा कर वहां मरे हुवे सैनिकों की नाक, घुटने और कान काट के उनकी माला बना के पहनती थीं और खुशियाँ मनाती थी..ऐसे परिवेश में उनको उन्हें शान्ति का पाठ पढ़ाना था.
मुहम्मद अगर भारत में होते तो शायद इस्लाम के इतिहास में लड़ाईयों की जगह शान्ति और प्रेम की बातें अधिक मिलती.. बुद्ध ने अपनी स्त्री और अपने नवजात शिशु को त्यागा, युद्ध कौशल भी सीखा, सैकड़ों स्त्रियों के साथ रहे और आज की भाषा में कहें तो खूब अय्याशी की.. मगर बुद्ध की उन बातों को कोई शायद ही याद करे क्यूंकि उनके अनुयायी ऐसे मार्ग पर चले जिसने सिर्फ और सिर्फ शांति का सन्देश दिया.
मुहम्मद को बदनाम सिर्फ और सिर्फ उनके अनुयायियों ने किया है.. अनुयायियों की गाढ़ी हदीसों ने किया और अनुयायियों के व्यक्तिगत लोभ ने किया.. अगर आप इस्लाम के इतिहास का गहन अध्ययन करेंगे तो आपको पता चलेगा कि दरअसल मुहम्मद ने बुद्ध से अधिक रचनात्मकता दी थी उस सातवीं शताब्दी के परिवेश में.. मगर वो सिर्फ और सिर्फ अरब के बर्बर लोगों के बीच होने से मिट गयी और बदल दी गयी.
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इस्लाम में एक दौर आया जहाँ साइंस की कमी बहुत ज़ोर शोर से महसूस की जाने लगी थी.. लोग मज़हबी पढ़ाई पर अधिक ध्यान दे रहे थे मगर बढ़ता हुवा साइंस उनको आकर्षित करने लगा था.. “इमाम मालिक”, जो इस्लाम के चार इमामों में से एक हैं, ने इस ज़रूरत को भांपा और अपनी किताब में कहा “ये मज़हब (इस्लाम) एक साइंस है, इसलिए जो भी तुम्हे ये (मज़हब) सिखाता है उस पर विशेष ध्यान दो”.
वहीँ से ये साइंस और मज़हब को एक करने की जद्दोजहद शुरू हुई.. ये एक ऐसा सिद्धांत था जिस के द्वारा सिर्फ और सिर्फ आने वाले समय में परेशानी ही खड़ी होनी थी. मज़हब और साइंस का दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है.. दोनों बिलकुल विपरीत ध्रुव होते हैं.. और मज़हब को साइंस बताने की कोशिश ही सही नहीं है.. रूहानियत/आध्यात्म का साइंस से क्या लेना?
मज़हब आस्था और स्वयं के भीतर की यात्रा का नाम है.. साइंस “जानना” और “बाहर” की यात्रा है.. दोनों विपरीत ध्रुव हैं.. इनका कोई मेल नहीं है.. इसलिए मुझ से कोई कहता है कि क्या क़ुरआन में विज्ञान है? मैं कहता हूँ “नहीं”.. क़ुरआन में कोई विज्ञान नहीं है क्यूंकि क़ुरान कोई विज्ञान की किताब नहीं है.. क़ुरआन को समझना है तो उस समय के समाजिक परिवेश और अध्यात्म की दृष्टि से समझिये.. वहां विज्ञान मत ढूंढिए.. भले उसको मानने वाले कितना भी ये दावा करें कि वहां विज्ञान भरा हुवा है.
सबसे पहले मज़हब से साइंस हटाया जाय और लोगों को ये समझ आना शुरू हो कि हमारा धर्म कोई विज्ञान नहीं है.. जब ये समझ आने लगेगा तो फिर लोगों को ये समझ आना शुरू होगा कि धर्म दरअसल है क्या.. क्या बुद्ध का धर्म बिना साइंस से अधूरा है? वहां बिना किसी विज्ञान के और बिना किसी ऐसे दावे के भी लोग अपनी मर्ज़ी से जाते हैं.. भीतरी सुकून और एक ऐसे विषय को समझने के लिए जिन्हें वो समझते हैं कि विज्ञान द्वारा नहीं समझा जा सकता.
जितने भी दूसरे धर्म के लोग आपको इस्लाम की किसी विधा के दीवाने मिलेंगे वो आपके साइंस के दावे पर नहीं दीवाने होते हैं.. वो रूमी की “मसनवी” के दीवाने होते हैं.. वो ग़ज़ाली की बातों के दीवाने होते हैं.. वो मंसूर और सरमद से लेकर बुल्ले शाह के रहस्यवाद के दीवाने होते हैं.. लोग मज़हब में क्या ढूंढते हैं ये समझिये.. जो आप समझते हैं और जो मान बैठे हैं उसे ज़बरदस्ती लोगों को मत समझाइये. मज़हब को ख़लीफाओं की नज़र से नहीं बल्कि उन रहस्यवादियों की नज़र से समझने का प्रयत्न कीजिये जो ख़लीफाओं की नज़र में हमेशा दोषी थे और रहेंगे.. आप अपनी नज़र विकसित कीजिये.. धीरे धीरे ही सही.. कोशिश तो कीजिये..
फेसबुक के चर्चित लेखक ताबिश सिद्दीकी के वॉल से.
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