कार्ल मार्क्स को सिर्फ उनकी किताबों के जरिए समझने वाले अक्सर दुराग्रही हो जाते हैं

Chandra Bhushan : कार्ल मार्क्स को पढ़ना कठिन जरूर है लेकिन अगर आप लिखने-पढ़ने से कुछ वास्ता रखते हैं तो उन्हें मूल रूप में पढ़ने की कोशिश करें। आप कितने भी ज्ञानी हों, दिमाग का दही हो जाएगा। लेकिन एक बार बात समझ में आने लगी तो सतह पर मौजूद हल्ले के नीचे की गहरी बातें जानने-समझने की आदत पड़ जाएगी। एक दौर था, जब मैंने लंगोट बांधकर उनकी कई सारी किताबें एक के बाद एक पढ़ डाली थीं। इस काम में गणित की पढ़ाई के दौरान हासिल तर्कपद्धति ने मेरी काफी मदद की थी, लेकिन यह कहना होगा कि मार्क्स को सहजबोध का हिस्सा बनाने के लिए इतना काफी नहीं था। मार्क्स दुराग्रही नहीं थे लेकिन उन्हें सिर्फ उनकी किताबों के जरिये समझने वाले अक्सर दुराग्रही हो जाते हैं। इस बीमारी का इलाज खोजने में फिर काफी वक्त लगता है। पता नहीं इतना वक्त मैं दे पाया या नहीं।

मार्क्स का लिखा सारा अंग्रेजी में और एक हिस्सा हिंदी में भी उपलब्ध है, लेकिन हिंदी में उन्हें पढ़ने की सलाह मैं अपने मित्रों को आम तौर पर नहीं देता। जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी, तीनों में ही मार्क्स की बराबर की गति मानी जाती थी। उनकी दार्शनिक और ज्यादातर वैचारिक रचनाएं जर्मन में हैं लेकिन अखबारी लेखन के रूप में उन्होंने अंग्रेजी में भी काफी लिखा है। 1857 के गदर पर उनकी रिपोर्टें अंग्रेजी में ही लिखी गई थीं। वाक्य थोड़े लंबे होने के बावजूद इनकी भाषा सरल है। इसके विपरीत दास कैपिटल, और दर्शन पर उनकी तीनों किताबें जर्मन आइडियोलॉजी, एंटी ड्यूहरिंग और बौद्धिक जीवन की शुरुआत में आई 1847 की पांडुलिपियां जर्मन में लिखी गई थीं। राजनीतिशास्त्र पर उनकी अद्भुत रिपोर्ताज नुमा पुस्तक लुई बोनापार्त की अठारहवीं ब्रूमेर मूलत: फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई थी। इसमें इस्तेमाल किए गए मुहावरे किसी की भी जुबान पर चढ़ सकते हैं।

मार्क्स के अंग्रेजी अनुवादों के बारे में कहा जाता है कि इनमें हेगेल द्वारा तैयार की गई बेहद लंबे वाक्यों वाली भाषा-शैली को विक्टोरियन लहजे में ढालने की कोशिश की गई है, जिसके चलते बात अक्सर लोगों तक पहुंच नहीं पाती है। इस समस्या से बचने के लिए पढ़ाई की शुरुआत रिपोर्टिंग पर केंद्रित हिस्सों से की जा सकती है। खासकर दास कैपिटल के वे हिस्से, जिनमें पूंजी के संकेंद्रण के चलते मजदूरों की बदहाली के ब्यौरे हैं। ये सामान्य ब्यौरे भी एक क्रांतिकारी दार्शनिक की नजर से गुजरकर ऐसी चमक हासिल कर लेते हैं कि आज डेढ़ सौ साल बाद भी इन्हें मार्क्स के साथ जुड़ने का दरवाजा बनाया जा सकता है।

लंबे समय तक वाम आंदोलन से जुड़े रहे और अब नवभारत टाइम्स अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत चंद्रभूषण के फेसबुक वॉल से.

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