दिल्ली के एक तिहाई परिवारों ने पिछले साल रिश्वत दी है!

देश के दिल दिल्ली में रिश्वतखोरी का यह जलवा है तो पूरे देश का हाल क्या होगा? एक प्रामाणिक संस्था के सर्वेक्षण से पता चला है कि दिल्ली के कम से कम एक तिहाई परिवारों ने पिछले साल रिश्वत दी है। अंदाज है कि कुल मिलाकर पिछले एक साल में दिल्ली के लोगों ने रिश्वत में 2 अरब 29 करोड़ रु. दिए हैं। हर परिवार ने लगभग 2500 रु. की रिश्वत दी है। यह रिश्वत सबसे ज्यादा पुलिस विभाग और परमिट देनेवाले विभाग को दी जाती है। यह सर्वेक्षण साधारण घरों का है। उन लोगों का नहीं है, जो करोड़ों-अरबों का व्यापार करते हैं या कारखाने चलाते हैं या व्यावसायिक कंपनियां चलाते हैं।

दो-ढाई हजार रु. तो वे टिप्स में दे देते हैं। उनकी रिश्वत का आंकड़ा करोड़ों-अरबों में जाता है। जितनी रिश्वत पूरी दिल्ली देती है, उतनी एक अकेला पूंजीपति दे देता है। जितनी रिश्वत दिल्ली के सारे पुलिसवाले मिलकर नहीं खाते, उतनी एक अकेला नेता खा जाता है। नेताओं के पेट इतने मोटे होते हैं कि अरबों-खरबों की रिश्वत खाकर भी वे डकार तक नहीं लेते। दुखद बात यह है कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने डेढ़ साल होने को आया, लेकिन रिश्वतखोरी को आलम ज्यों का त्यों है। मोदी को लोगों ने इसीलिए आंख मींचकर वोट दिया कि कांग्रेस भ्रष्टाचार का पर्याय बन गई थी लेकिन आम जनता, जिससे त्रस्त है, उस भ्रष्टाचार में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है।

यह ठीक है कि मोदी के डर के मारे सरकार के मंत्री और बड़े अफसर ज़रा सावधान हैं और अभी तक उनका कोई मामला उजागर नहीं हुआ है लेकिन आम आदमी इस सरकार से निराश होता जा रहा है। दिल्ली की प्रादेशिक सरकार के बारे में इस सर्वेक्षण का कहना है कि इस सरकार में भ्रष्टाचार घटा है लेकिन यह फर्क आम आदमी नहीं कर पाता है। उसके लिए सब सरकारी कर्मचारी एक-जैसे हैं। दिल्ली की जनता काफी जागरुक है। वह भी यदि रिश्वत देने के लिए मजबूर है तो छोटे-मोटे शहरों और गांवों की दुर्दशा का अंदाज हम लगा सकते हैं।

सरकार की कमजोरी तो स्पष्ट है लेकिन एक सवाल यह भी है कि लोग रिश्वत देते ही क्यों हैं? क्या हम खुद भ्रष्ट नहीं है? ज्यादातर लोग गलत काम करते हैं, गैरकानूनी काम करते हैं और लाइन तोड़कर अपना काम पहले करवाना चाहते हैं-इसीलिए रिश्वत देते हैं। मैने अपने जीवन में कभी एक पैसा भी रिश्वत नहीं दी और मेरा काम कभी रुका नहीं। जरुरी यह है कि लोग ज़रा लड़ने का माद्दा पैदा करें और ज़रा धीरज रखें तो पुलिसवालों, बाबुओं और नेताओं को रिश्वत देने की जरुरत ही नहीं पड़ेगी। 

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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