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डिस्कबरी आफ इटावा : सर्वोत्कृष्ट जैनतीर्थ ‘आसई’

गंगा-यमुना के उद्गम (गंगोत्री-यमुनोत्री) से लेकर संगम (प्रयाग) तक फैले इष्टसाध्य इष्टापथ का केन्द्र इष्टिकापुरी (इटावा) जनपद में सूर्य तनया यमुना के उत्तरी तटस्थ दुर्गम करारों के मध्य विस्तृत राज्य था आसई, जिसे जैनतीर्थ आशानगरी नाम से जाना जाता था। यह जैनतीर्थ निश्चित रूप से अन्य तीर्थो से अति सर्वोत्कृष्ट रहा होगा, जिसका प्रमाण यदा-कदा उत्खनन से मात्र जैन तीर्थंकरों की प्रतिमायें मिलना है। आसई के निकटवर्ती ईश्वरीपुरा में मातादीन राजपूत के खेत में खुदाई में सैकड़ों साल पुरानी खंडित जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ मिली है जिनकी छोटी-बड़ी मिलाकर संख्या लगभग 400 से 500 तक है।

गंगा-यमुना के उद्गम (गंगोत्री-यमुनोत्री) से लेकर संगम (प्रयाग) तक फैले इष्टसाध्य इष्टापथ का केन्द्र इष्टिकापुरी (इटावा) जनपद में सूर्य तनया यमुना के उत्तरी तटस्थ दुर्गम करारों के मध्य विस्तृत राज्य था आसई, जिसे जैनतीर्थ आशानगरी नाम से जाना जाता था। यह जैनतीर्थ निश्चित रूप से अन्य तीर्थो से अति सर्वोत्कृष्ट रहा होगा, जिसका प्रमाण यदा-कदा उत्खनन से मात्र जैन तीर्थंकरों की प्रतिमायें मिलना है। आसई के निकटवर्ती ईश्वरीपुरा में मातादीन राजपूत के खेत में खुदाई में सैकड़ों साल पुरानी खंडित जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ मिली है जिनकी छोटी-बड़ी मिलाकर संख्या लगभग 400 से 500 तक है।

ईश्वरीपुरा निवासी वृजेश कुमार अपने खेत में ट्रेक्टर से जुताई कर रहे थे तभी उसे कुछ मूर्तियाँ खेत में दिखी, मूर्तियाँ निकलने की खबर से आसपास के गाँव के लोगों का आना शुरू हो गया, गाँव वालों की मदद से खेत की खुदाई की गयी तो एक के बाद एक जैन धर्म की सैकड़ों साल पुरानी खंडित मुर्तिया खुदाई में निकलने लगी अनुमान है कि खेत में अभी और मूर्तियाँ हो सकती हैं यह तो और खुदाई से ही पता चल सकेगा। मूर्तियाँ सैकड़ों वर्ष पुरानी हैं जो सफेद पत्थर, काला पत्थर व लाल पत्थर की हैं। कुछ मूर्तियों पर लिखावट भी है जिससे अनुमान है कि मूर्तियाँ हजारों वर्ष पुरानी हैं। ज्ञात हो कि हाल के वर्षों में निकटवर्ती ददोरा गांव में भी जैन तीर्थंकरों की प्रतिमायें निकली थी।

जैन-आगम व इतिहास के अनुसार यह गांव ऐतिहासिक आसई (आषानगरी) राज्य में रहा है, जहां 24वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी ने प्रवास किया था, यह प्रवास वर्षायोग (चातुर्मास) था अथवा सामान्य, कुछ भी हो किन्तु ये सच है कि महावीर स्वामी यहां आये थे। लिहाजा यह पुण्य क्षेत्र है। जब हम जैन तीर्थंकरों से जुड़े तीर्थों का विश्लेषण करें तो पायेंगे कि अवध के सूर्यवंशी चार सम्राट प्रारंभिक चार तीर्थकर आदिनाथ ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दन, सुमतिनाथ अयोध्या में जन्में। जबकि तीन कुरुवंशी शांतिनाथ, कुन्थुनाथ, व अरहनाथ का जन्म स्थान हस्तिनापुर है। चन्द्रवंशी नेमिनाथ ब्रज के सीमान्त शोरिपुर (वटेश्वर) में हुए। सुपाश्र्वनाथ व पाश्र्वनाथ काशी (वाराणसी) में जन्में। सम्भवनाथ श्रावस्ती में, पद्मप्रभु कौशाम्बीमें, चन्द्रप्रभु चंद्रपुरी में, पुष्पदन्त काकन्दी में, शीतलनाथ भद्रिकापुरी में, श्रेयान्सनाथ सिंहपुरी में, वासुपुज्य चम्पापुरी में, विमलनाथ पांचाल राज्य के काम्पिल्य में, अनन्तनाथ विनीता में, धर्मनाथ रत्नपुरी में, मल्लिनाथ मिथिला (जनकपुरी) में तथा महावीर स्वामी वैशाली क कुंडग्राम में जन्में। ये सभी जैनतीर्थ की श्रेणी में आते हैं। इसके साथ ही तीर्थंकरों की तपोभूमि, ज्ञानोदय भूमि व निर्वाण भूमि भी तीर्थ हैं।

बिहार में सम्मेद शिखर में 24 में से 20 तीर्थंकर एवं असंख्य मुनि मोक्ष गए हैं। गया क्षेत्र के कुलुआ पहाड़ में 10वें तीर्थंकर शीतलनाथजी ने तप करके कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। पटना जिले के गुणावा में गौतम स्वामी मोक्ष गए हैं। पावापुरी महावीर स्वामी कार्तिक कृष्ण 30 (दीपावली) को मोक्ष गए हैं। राजगृहीमें विपुलाचल, सोनागिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, वैभारगिरि ये पंच पहाड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। इन पर 23 तीर्थंकरों का समवशरण आया था। चम्पापुर में वासूपूज्य मोक्ष गए हैं। इनके अलावा खण्डगिरि, उड़ीसा के खण्डगिरि और उदयगिरि नाम की दो पहाड़ियाँ हैं। मध्य प्रदेश में श्रमणाचल पर्वत (सोनागिरि), द्रोणगिरि, नैनागिरि, मुक्तागिरि, सिद्धवरकूट, चूलगिरि, रामटेक, खनियाधाना, चंद्रगिरी (डूंगरगढ़), अहिक्षेत्र, महावीरजी, चाँदखेड़ी, पद्मपुरी, गुजरात में गिरिनार, शत्रुंजय, पावागढ़, माँगीतुंगी, गजपन्था, कुंथलगिरि, कर्कला, श्रवणबेलगोला आदि तमाम तीर्थस्थल है। 

इन सब तीर्थों के मुकाबले आसई (आशानगरी) को कम नहीं आंका जा सकता क्योंकि  24वें तीर्थकर भगवान महावीर स्वामी ने प्रवास किया था, यह प्रवास वर्षायोग (चातुर्मास) था अथवा सामान्य, कुछ भी हो किन्तु ये सच है कि महावीर स्वामी यहां आये थे। जहां महावीर स्वामी ने प्रवास किया था वह भूमि उनकी तेजस्विता से इतनी प्रल्लावित थी कि जहां आने वालों के मनोभाव स्वतः जिनस्तेज से प्रभावित हो जाते थे।  अन्ततः वहां अति विकसित तीर्थ स्थापित हुआ। आसई के राजघराने की कई पीढ़ियों ने समूचे राज्य को जैनतीर्थ के रूप में विकसित किया था, दक्षिण भारत के पद्मनाभ और तिरुपति तीर्थ की शैली में अनगिनत जैनालय बनाये गये, जिनमें विविध शैलियों में तीर्थकरों की करोड़ों प्रतिमायें रहीं होंगीं। साथ ही अकूत सम्पदा भी थी। जिसे लूटने के उद्देश्य से मुगल आक्रान्ता गजनवी व मुहम्मद गौरी ने आसई पर क्रमिक आक्रमण कर जैनतीर्थ आसई को जमीदोज कर दिया था। जिसके प्रमाण इसक्षेत्र में खनन के दौरान मिल रही जैन मूर्तियों से निरंतर मिलते रहे हैं।

विगत वर्ष जैनमुनि प्रमुख सागर महाराज जब अपनी जन्मभूमि इटावा आये तो मैंने अपने पूर्व छात्र पर राग-द्वेषादि अन्तश्शत्रु के प्रहार को अनुभव करते हुए शिक्षक धर्म निभाते हुए सलाह दी थी कि ‘‘आप को आचार्य-उपाध्याय के सोपान पार करते हुए परमेष्टि के लक्ष्य तक जाना है, तो आसई के जंगल में कुछ समय अन्तर्मुखी होकर महावीर स्वामी के जिनस्तेज से लाभान्वित हों।’’  महावीर जयन्ती आने वाली है, निश्चित रूप से जैन समाज महावीर जन्मोत्सव में आसई के जंगल में मनाये और फिर जैनतीर्थ आशानगरी को पुनः विकसित करने का अभियान चलाये तो शासन-प्रशासन व समूचा जनपद उत्साह से सहभागी हो सकता है।

देवेश शास्त्री
इटावा

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