Google CEO is one such example of export from India

Amitabh Satyam : When I taught at the US university, I would write my name in Devnagiri on the board – in the first class of the semester – followed by closest transliteration into Roman. And would coach them to pronounce it correctly. I had this thing about my identity. I would also explain how lucky Americans were – they got best German imports as cars, best of Japan as electronics. Wines from France. And from India, the best brains – such as myself. I was not modest. It also gave me a validation why I was there. They didn’t care either way. Google CEO is one such example of export from India.

Indians have the best brains not because of genetics. It is the emphasis on questioning all and analyzing all. It is very hard to contain Indians and force a system on them. Constructively or otherwise, the mind would go everywhere. Figuring out how to do it better, or why must we do it a certain way. Ask a Bengali to do something, she will certainly challenge the purpose, or why do you even want it. Or why not consider a better alternative. Our minds are always active. Other cultures are closed, so they do as they are told. They have books that they follow as religion where they are not allowed to question. Follow what is told… In India, we have challenged all the notions and beliefs, and have evolved.

During my MBA I had proposed an ideal organization where Indians were the top management – for visioning and strategizing. American the middle management for managing execution of a defined strategy. And Germans for precise executions. Americans would buy my crazy ideas, but English-medium Indians would be shocked at my audacity. For not putting Indians at the bottom. We need a few more Pichais and Nadellas. I want to be right on at least one thing.

अमेरिकावासी भारतीय अमिताभ सत्यम के फेसबुक वॉल से.

Nadim S. Akhter : ये सुंदर पिचाई कौन हैं??? कोई जानकारी! ये गूगल, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सऐप आदि-आदि अमेरिका-विदेशों में ही क्यों बनते हैं? आईटी का अगुआ भारत अभी तक ऐसा कुछ क्यों नहीं बना पाया, जो पूरी दुनिया पर राज कर सके. और ये जो सुंदर पचाई हैं, वो अगर IIT Kharagpur से B.Tech करने के बाद अमेरिका नहीं जाते तो क्या आज उनके नाम के चर्चे हो पाते?? सो भारतीय मूल-कंदमूल आदि का रोना बंद कीजिए. सोचिए कि आप जिस देश में रहते हैं, वह दुनिया में कितना पिछड़ा हुआ है. जहां दुनिया 25.3 Mbps की इंटरनेट स्पीड चला रही है, वहां हम सिर्फ 2 mbps की स्पीड वाली इंटरनेट सुविधा चलाते हैं. दुनियाभर की औसत इंटरनेट स्पीड भी हमसे काफी आगे यानी 4.6 Mbps है.

अभी एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि रिसर्च के मामले में भारत, पूरी दुनिया में काफी पीछे है. पश्चिमी देश अगले दो-तीन साल में चांद और मंगल पर बस्ती बसाने का अभियान शुरु करने वाले हैं और हम अभी तक अपने शहर की गंदी बस्तियों से निजात नहीं पा सके हैं. हर देशवासी को मकान-बिजली और पीने का साफ पानी मुहैया नहीं करा सके हैं. अपने अंदर छद्म राष्ट्रवाद का संचार मत करिए. ये समझिए और जानिए कि आप दुनिया में कहीं नहीं टिकते. अपनी कमजोरी जानकर उसे दूर करने के रास्ते ढूंढिए. आपके पड़ोसी चीन ने दुनिया को Alibaba.com दिया है. और आप flipkart पर इतराए जा रहे हैं, जो पश्चिम के Amazon की नकलभर है.

सो नकल करना बंद करिए. जुगाड़ संस्कृति से बाहर निकलिए. Original माल बनाइए. इस देश में मेधा की कोई कमी नहीं. लेकिन उचित माहौल-संसाधन और कार्य संस्कृति के आभाव में हमारा टैलंट बाहर चला जाता है. तो सुंदर पिचाई की कामयाबी का जश्न मत मनाइए. उनकी कामयाबी में वेस्ट का हाथ है, हमारा नहीं. अगर आपने उन्हें IIT के बाद Wharton और Stanford University की सुविधाएं उपलब्ध कराई होतीं, तो वे देश छोड़कर बाहर ना जाते. कौन जाने, तब सुंदर पिचाई भारत में क्या कमाल करते !!! अपनी प्रतिभा को खोने का गम मनाइए, खुश होके उछलिए मत. पैर में खामोख्वाह दर्द हो जाएगा.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : सुंदर पिचाई के गूगल के सीईओ बनने पर नाहक ही हल्ला मचाया जा रहा है। इसके पहले ऐसा ही जश्न सत्य ऩडेला के माइक्रोसॉफ्ट का प्रमुख बनने पर मनाया जा रहा था। इनकी सफलताओं को ऐसे पेश किया जा रहा है मानो भारतीयों का सिलिकॉन वैली पर कब्ज़ा हो गया हो। अरे महाराज ये लोग अंतत अमेरिकी हैं और इन कंपनियों के वफ़ादार अधिकारी हैं। भारतीयता इनके मूल में भी नहीं बची है। ये अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल इन दैत्याकार कार्पोरेट की परिसंपत्ति बढ़ाने के लिए कर रहे हैं न कि हिंदुस्तानी अवाम की बेहतरी के लिए। इसलिए अपने राष्ट्रवादी उफान को ठंडा कीजिए और उन पर ध्यान लगाइए जो सचमुच में देश निर्माण के लिए ख़ून-पसीना बहा रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.